छोटी बच्ची भी सुरक्षित नहीं: आखिर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? : श्वेता दीप्ति
काठमान्डू 
तीन वर्ष की मासूम गरिमा चौधरी के साथ कथित बलात्कार के बाद उसकी हत्या की घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे समाज की अंतरात्मा को झकझोर देने वाली घटना है। जिस उम्र में एक बच्ची को दुनिया की क्रूरता का अर्थ भी नहीं पता होता, उसी उम्र में उसके साथ ऐसी जघन्य घटना होना यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। यह घटना केवल अपराध नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनहीनता, नैतिक पतन और सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलता का आईना है।
बच्चियाँ किसी भी समाज की सबसे कोमल और सबसे सुरक्षित रखी जाने वाली धरोहर मानी जाती हैं। माता-पिता उन्हें विश्वास के साथ घर से बाहर खेलने भेजते हैं, स्कूल भेजते हैं और समाज पर भरोसा करते हैं। लेकिन जब तीन वर्ष की बच्ची भी यौन हिंसा का शिकार बन जाती है, तब यह भरोसा टूट जाता है। आज हर माता-पिता के मन में यह भय घर कर गया है कि क्या उनकी बेटी सचमुच सुरक्षित है?
यह केवल एक घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में बच्चों के साथ यौन हिंसा और हत्या की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। हर घटना के बाद समाज में आक्रोश उठता है, प्रदर्शन होते हैं, न्याय की माँग होती है, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य होता दिखाई देता है। प्रश्न यह है कि क्या केवल आक्रोश से बेटियाँ सुरक्षित हो जाएँगी?
यह पीड़ा केवल गरिमा की नहीं है। यह हर उस लड़की और हर उस महिला की पीड़ा है जो किसी न किसी रूप में हिंसा, उत्पीड़न या असुरक्षा का सामना करती है। कभी घर के भीतर, कभी सड़क पर, कभी विद्यालय में और कभी कार्यस्थल पर—नारी के प्रति हिंसा के रूप बदलते रहते हैं, लेकिन उसका दर्द वही रहता है।
सभ्यता और आधुनिकता की बातें करने वाला समाज यदि अपनी बेटियों की रक्षा नहीं कर सकता, तो विकास के दावों का क्या अर्थ रह जाता है? महिलाओं के सम्मान की बातें केवल भाषणों और नारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक कानून भी अकेले पर्याप्त नहीं होंगे।
महिला अधिकारकर्मियों ने निष्पक्ष और शीघ्र जाँच, दोषियों को कठोर दंड, पीड़ित परिवार को सुरक्षा और बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत व्यवस्था की माँग उठाई है। यह माँग केवल एक मामले के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा के लिए है।
कठोर कानून आवश्यक हैं, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि उनका निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन हो। अपराधी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे किसी राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक दबाव के कारण बचने का अवसर नहीं मिलना चाहिए। साथ ही परिवार, विद्यालय और समाज को बच्चों को सुरक्षित वातावरण देने तथा यौन हिंसा के प्रति जागरूक बनाने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी।
समाज को आत्ममंथन करना होगा
आज आवश्यकता केवल दोषी को सजा दिलाने की नहीं, बल्कि यह सोचने की है कि हम अपने बच्चों के लिए कैसा समाज बना रहे हैं। यदि मासूम बचपन भी सुरक्षित नहीं है, तो यह पूरे समाज की सामूहिक विफलता है। हमें अपनी संवेदनाओं को जीवित रखना होगा, बेटियों के सम्मान और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी और ऐसी घटनाओं के प्रति शून्य सहिष्णुता अपनानी होगी।
गरिमा जैसी मासूम बच्ची की मौत हमें एक कठोर संदेश देती है—अब मौन रहने का समय नहीं है। हर बेटी का सुरक्षित बचपन उसका अधिकार है, किसी का उपकार नहीं। जब तक समाज, सरकार, कानून और नागरिक मिलकर महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक ऐसे प्रश्न बार-बार उठते रहेंगे—आखिर नारी पर यह अत्याचार कब तक होता रहेगा?
गरिमा को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब न्याय केवल एक मामले तक सीमित न रहे, बल्कि ऐसा समाज बने जहाँ हर बच्ची बिना भय के मुस्कुरा सके और हर माता-पिता निश्चिंत होकर कह सकें—हमारी बेटियाँ सुरक्षित हैं।

