साम्प्रदायिक हिंसा रोकने में कहाँ चुक रही है सरकार ?: डॉ.श्वेता दीप्ति

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक अगस्त । देश जल रहा है और यह पहली बार नहीं हुआ है । जनता सड़क पर उतरती है । सत्ता का दमन होता है । कुछ मौतें होती हैं फिर छानबीन हेतु समिति का गठन होता है और मृतकों को शहीद घोषित कर कुछ मुआवजा की घोषणा की जाती है और सब शांत हो जाते हैं । एक बार फिर सुनसरी जिले के देवानगंज ग्रामीण पालिका (कप्तानगंज बाजार) में जुलाई २०२६ के आखिरी हफ्ते में दो समुदायों के बीच हिंसक झड़प हुई और पुलिस फायरिंग से सांप्रदायिक तनाव भड़क उठा । कहा यह गया कि कप्तानगंज नए हाट बाजार क्षेत्र में धार्मिक यात्रा÷उत्सव के दौरान डीजे बजाने की तेज आवाज और दो समूहों के आमने–सामने आने से हिंसक झड़प शुरू हुई । आखिर हर बार हिन्दुओं के पर्व त्योहार पर ही हिंसक घटना क्यों घटती है ? हाल के दिनों में नेपाल के तराई–मधेश क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं । यह पहली बार नहीं है जब ऐसी स्थिति बनी हो । इससे पहले पर्सा, रौतहट और धनुषा सहित कई जिलों में भी इसी प्रकार के तनाव देखे गए थे । गौरतलब यह है कि प्रत्यक्ष प्रमाण के बाद भी सत्ता क ीओर से अनदेखी की गई । स्वाभाविक है कि मनोबल तो बढेगा । इन घटनाओं के बाद एक शब्द बार बार सामने आया कि यह आयातित समस्या है । परन्तु सच तो यह है कि यह कट्टरपंथी की यह मानसिकता सदैव बनी रही है बस धर्मनिरपेक्षता ने इसे हवा दे दी है ।
सुनसरी में कैसे शुरू हुआ विवाद ?
जानकारी के अनुसार, सुनसरी जिले में सोमवार को होने वाली बोलबम यात्रा की तैयारी के दौरान एक पक्ष ने दूसरे समुदाय की बस्ती के समीप बिजली के खंभे पर झंडा लगाया और तेज आवाज में डीजे बजाया । इसी के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ गया ।
सुनसरी के सहायक प्रमुख जिला अधिकारी पोषण लामिछाने ने बताया कि विवाद शिवालय के निकट हुआ और झंडा लगाने तथा तेज आवाज में डीजे बजाने को लेकर तनाव उत्पन्न हुआ ।
हालाँकि स्थानीय स्तर पर घटनाक्रम को लेकर अलग–अलग दावे किए जा रहे हैं । देवानगंज गाँवपालिका के अध्यक्ष बेचन मेहता का कहना है कि युवाओं द्वारा डीजे बजाना अब सामान्य बात हो गई है, जबकि घटनास्थल के निकट रहने वाले कैजुम मियाँ का कहना है कि विवाद की शुरुआत पहले झंडे के मुद्दे से हुई थी ।
अगर तेज आवाज से दिक्कत थी तो नजदीकी प्रशासन की मदद लेनी चाहिए थी खुद प्रतिरोध करने के बजाय । दुखद तो यह भी है कि पुलिस प्रशासन में हर बार गोली चलाने की जल्दी रहती है । आखिर उनके सामने देश की जनता है फिर यह व्यवहार क्यों ? क्या आम जनता की जिन्दगी इतनी सस्ती है ?
सुनसरी जिले की देवानगंज गाँवपालिका में हुई हिंसा ने नेपाल की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं । आरोप है कि सुरक्षा एजेंसियाँ समय रहते खुफिया जानकारी जुटाने और संबंधित पक्षों के साथ समन्वय स्थापित करने के बजाय हिंसा भड़कने के बाद बल प्रयोग पर अधिक केंद्रित रहीं ।
इसका परिणाम यह हुआ कि पुलिस की गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई, पुलिस की गोली से नौ स्थानीय नागरिक घायल हुए, जबकि झड़पों में १३ पुलिसकर्मी भी घायल हुए । इस घटना ने सुरक्षा तंत्र की तैयारी, रणनीतिऔरप्राथमिकताओंपरएकबारफिरगंभीरबहसछेड़दीहै।गोलबाजारमेंभीयहीदृश्यसामनेआयाजहाँपुलिसकीगोलीसेएकनिर्दोषयुवाकीजानचलीगई।
समस्या की जड़ तलाशने की आवश्यकता
तराई–मधेश में इस तरह की घटनाएँ बार–बार होने के कारण सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल तत्काल शांति स्थापित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके मूल कारणों की पहचान कर स्थायी समाधान निकालना होगा । यदि समस्या की जड़ तक नहीं पहुँचा गया, तो आज एक स्थान पर तनाव शांत होगा और कल किसी दूसरे स्थान पर फिर किसी नए रूप में सामने आ जाएगा ।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
विश्लेषकों का आरोप है कि एक जैसी घटनाएँ बार–बार होने के बावजूद प्रशासन पर्याप्त सतर्कता नहीं बरत रहा है । हर घटना के बाद दोनों समुदायों के बीच समझौता करा दिया जाता है, लेकिन अगले वर्ष वही स्थिति फिर दोहराई जाती है । आखिर ऐसी घटनाओं को होने से पहले रोकने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए जाते ।
ये और बात है कि प्रशासन का दावा यह होता है कि संभावित घटनाओं को रोकने के लिए खुफिया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियों के माध्यम से लगातार निगरानी की जाती है । फिर ऐसी घटनाएँ होती कैसे हैं ? होना तो यह चाहिए कि स्थानीय प्रशासन को उन क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहाँ बार–बार सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न होता है । संवेदनशील क्षेत्रों का अध्ययन करना चाहिए, वहाँ की सामाजिक एवं जनसांख्यिकीय स्थिति का विश्लेषण करना चाहिए, धार्मिक जुलूसों और सार्वजनिक आयोजनों के लिए स्पष्ट आचार संहिता बनानी चाहिए, तथा विभिन्न समुदायों के बीच आपसी समझ और संवाद को मजबूत करना चाहिए ।
क्यों एक घटना से सीख लेकर दूसरी जगह उसे दोहराने से रोकने की संस्कृति विकसित नहीं हो पाई है । विशेषज्ञों का मानना है कि तराई–मधेश में बार–बार उभर रहे सांप्रदायिक तनाव के पीछे केवल धार्मिक जुलूस या डीजे जैसे तात्कालिक कारण नहीं हैं । इसके पीछे राजनीतिक माहौल, सामाजिक प्रतिस्पर्धा, प्रशासनिक कमजोरियाँ, आर्थिक असमानता, अशिक्षा, सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहें तथा समय रहते संवाद और विश्वास निर्माण की कमी जैसी कई जटिल वजहें भी जुड़ी हुई हैं । स्थायी समाधान के लिए सरकार, प्रशासन, स्थानीय समुदायों और नागरिक समाज–सभी को मिलकर आपसी विश्वास, संवाद और कानून के निष्पक्ष पालन को प्राथमिकता देनी होगी ।
सुनसरी की घटना पर सुरक्षा विशेषज्ञों से लेकर स्वयं गृहमंत्री सुधन गुरुङ ने भी सुरक्षा एजेंसियों की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं । इस घटना ने हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन लाए गए राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग (नेशनल इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट) की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है ।
विभाग को स्वतंत्र रूप से खुफिया जानकारी एकत्र करने और संभावित परिस्थितियों का आकलन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है । ऐसे में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या सुनसरी की स्थिति का समय रहते पर्याप्त मूल्यांकन किया गया था और यदि किया गया था, तो उसके अनुरूप आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए गए ।
विशेषज्ञों का मानना है कि शांति और कानून–व्यवस्था बनाए रखने में स्थानीय सरकार, प्रदेश सरकार और संघीय सरकार की भूमिकाओं की अनदेखी, सुरक्षा तंत्र की तैनाती, तबादलों और पदोन्नतियों से जुड़ी संरचनात्मक समस्याओं के कारण इस प्रकार की घटनाओं का प्रभावी प्रबंधन कठिन होता जा रहा है ।
उनका कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में सभी सुरक्षा एजेंसियों को पहले स्थिति का प्रबंधन (मैनेजमेंट) और उसके बाद आवश्यकता पड़ने पर नियंत्रण (कंट्रोल) की रणनीति अपनानी चाहिए । तनाव को हिंसा में बदलने से पहले स्थानीय निकायों, प्रदेश सरकार, संघीय एजेंसियों, नागरिक समाज तथा विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों को साथ लेकर संवाद और समन्वय स्थापित करना आवश्यक होता है ।
इसके लिए संभावित तनावग्रस्त क्षेत्रों की समय रहते पहचान करना, पूर्वसूचना तंत्र को मजबूत बनाना तथा संवाद और विश्वास निर्माण की प्रभावी व्यवस्था विकसित करना बेहद जरूरी माना जा रहा है ।
नेपाल पुलिस के पूर्व अतिरिक्त महानिरीक्षक (एआईजी) प्रद्युम्न कार्की का कहना है कि सुनसरी सहित अतीत में विभिन्न स्थानों पर हुई ऐसी घटनाओं से स्पष्ट होता है कि भीड़ प्रबंधन और भीड़ नियंत्रण में मौजूद कमजोरियों के कारण बार–बार जन–धन की हानि होती रही है और सामाजिक सद्भाव भी प्रभावित हुआ है ।
उन्होंने कहा कि विभिन्न धार्मिक समुदायों की अपनी–अपनी जीवनशैली, परंपराएँ और धार्मिक मान्यताएँ होती हैं तथा वे सामान्यतः आपसी सद्भाव के साथ रहते हैं । लेकिन ऐसे तत्व हमेशा सक्रिय रहते हैं जो समुदायों के बीच तनाव पैदा करने का प्रयास करते हैं । उनके अनुसार सुरक्षा तंत्र और प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी ऐसे तत्वों की समय रहते पहचान कर उन्हें प्रभावी ढंग से रोकना है, ताकि सामाजिक सौहार्द और कानून–व्यवस्था दोनों सुरक्षित रह सकें ।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते जोखिम का आकलन कर प्रशासन, स्थानीय सरकार, नागरिक समाज और संबंधित पक्षों के बीच समन्वय स्थापित किया गया होता, तो स्थिति हिंसक नहीं बनती ।
नेपाल पुलिस के पूर्व अतिरिक्त महानिरीक्षक (एआईजी) प्रद्युम्न कार्की का कहना है कि किसी भी संवेदनशील मुद्दे में पूर्व जोखिम मूल्यांकन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है । उनके अनुसार यदि प्रशासन, स्थानीय सरकार, राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और अन्य हितधारकों ने पहले ही स्थिति की संवेदनशीलता का आकलन कर आवश्यक कदम उठाए होते, तो हिंसा को टाला जा सकता था ।
हिंसा के समय कई प्रमुख पद खाली
घटना के समय सुरक्षा व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी यह भी रही कि कोशी प्रदेश पुलिस कार्यालय, सुनसरी जिला पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल–तीनों के प्रमुख पद प्रभावी नेतृत्व से वंचित थे । सुनसरी के पुलिस अधीक्षक (एसपी) केशवकुमार थेबे अवकाश पर थे और उनकी जगह डीएसपी चन्द्र खड़्का कार्यवाहक प्रमुख थे ।
सशस्त्र पुलिस बल के जिला प्रमुख श्याम कार्की को तस्करी नियंत्रण में कमजोरी के आरोप में दो सप्ताह पहले ही काठमांडू बुला लिया गया था । कोशी प्रदेश पुलिस प्रमुख डीआईजी विनोद घिमिरे भी अवकाश पर थे, जिसके कारण प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था कार्यवाहक अधिकारियों के भरोसे संचालित हो रही थी ।
घटना के बाद कोशी प्रदेश पुलिस कार्यालय से एसपी नारायण चिमरिया और एसपी सुमन तिम्सिना को समन्वय के लिए सुनसरी भेजा गया, जबकि घटनास्थल पर पुलिस कार्रवाई का नेतृत्व इटहरी क्षेत्रीय पुलिस कार्यालय के डीएसपी सुवास हमाल ने किया ।
खुफिया विभाग की भूमिका पर भी प्रश्न
सुनसरी की घटना ने राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग (नेशनल इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट) की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं । कोशी प्रदेश में विभाग के प्रमुख अनुसंधान निदेशक इन्द्र लामा तथा सुनसरी में उपअनुसंधान निदेशक विमल घिमिरे तैनात हैं । घटना के बाद अन्य सुरक्षा अधिकारियों और प्रमुख जिला अधिकारी के तबादले या वापसी की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन खुफिया विभाग के अधिकारी अपने पदों पर बने रहे ।
राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के पूर्व अतिरिक्त मुख्य अनुसंधान निदेशक देवराज भट्ट का कहना है कि हिंसा से पहले ही तनाव के संकेत दिखाई दे रहे थे, लेकिन स्थानीय प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया तंत्र ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया । उनके अनुसार, यदि पहले भी इस प्रकार की घटनाएँ हो चुकी थीं, तो भविष्य के लिए प्रभावी रणनीति और एहतियाती व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई–यही सबसे बड़ा प्रश्न है ।
संघीय ढाँचे की संरचनात्मक कमजोरी
विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल की संघीय व्यवस्था में सुरक्षा प्रशासन से जुड़ी कानूनी अस्पष्टता भी ऐसी घटनाओं के प्रभावी नियंत्रण में बाधा बन रही है ।
संविधान के अनुसार प्रदेश पुलिस प्रमुख कानूनी रूप से प्रदेश सरकार के अधीन होते हैं और प्रदेश की सुरक्षा नीति के लिए प्रदेश गृह मंत्री की अध्यक्षता में सुरक्षा समिति का प्रावधान है । लेकिन संघीय पुलिस कानून लागू न होने के कारण पुलिस का संचालन, तबादला और नियंत्रण अब भी मुख्य रूप से केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है ।
एक सुरक्षा अधिकारी के अनुसार, सुनसरी घटना के बाद कोशी प्रदेश पुलिस प्रमुख का तबादला भी प्रदेश सरकार से परामर्श किए बिना कर दिया गया । उनके अनुसार यह नेपाल की संघीय व्यवस्था की एक बड़ी संस्थागत कमजोरी को दर्शाता है ।
समन्वय का अभाव
जिला प्रशासन कार्यालय सीधे संघीय सरकार के नियंत्रण में है । प्रमुख जिला अधिकारी (सीडीओ) गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करते हैं और सुरक्षा घटनाओं के समय वे प्रदेश सरकार की बजाय सीधे काठमांडू को रिपोर्ट करते हैं ।
इसके कारण प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन के बीच संस्थागत समन्वय पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है । अधिकारियों का मानना है कि यही कारण है कि संवेदनशील परिस्थितियों में स्थानीय, प्रदेश और संघीय स्तर पर एकीकृत प्रतिक्रिया विकसित नहीं हो पाती ।
हिंसा के बाद ही सक्रिय होता है तंत्र
विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल में धार्मिक और सांप्रदायिक तनाव की घटनाएँ नई नहीं हैं, लेकिन लगभग हर बार सुरक्षा बलों की सक्रियता हिंसा भड़कने के बाद ही दिखाई देती है । घटना के बाद सुरक्षा समितियों में समीक्षा तो होती है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान शायद ही निकल पाता है ।
सुनसरी की घटना ने केवल कानून–व्यवस्था की चुनौती ही नहीं, बल्कि नेपाल की सुरक्षा और संघीय प्रशासनिक व्यवस्था की कई संस्थागत कमजोरियों को भी उजागर किया है । विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम केवल पुलिस बल की तैनाती से संभव नहीं है । इसके लिए मजबूत खुफिया तंत्र, समय पर जोखिम का आकलन, स्थानीय समुदायों के साथ सतत संवाद, विभिन्न सरकारी स्तरों के बीच प्रभावी समन्वय और स्पष्ट कानूनी ढाँचे की आवश्यकता है । तभी भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को समय रहते रोका जा सकेगा ।

सम्पादक, हिमालिनी।

