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जितिया व्रत : मातृत्व, लोकविश्वास और संतान-मंगल की जीवंत परंपरा : श्वेता दीप्ति

 

काठमान्डू

जितिया व्रत जिसकी शुरुआत आज नहाय खाय से हो चुकी है । हमारे लोकजीवन में व्रत और पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों, पारिवारिक संबंधों और लोकविश्वासों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने वाले माध्यम भी हैं। इन्हीं लोकपर्वों में जितिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत या जिउतिया भी कहा जाता है, विशेष महत्त्व रखता है। मुख्यतः बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल तथा नेपाल के तराई-मधेश क्षेत्र में प्रचलित यह व्रत मातृत्व की ममता, संतान के प्रति चिंता और उसके दीर्घ एवं सुखी जीवन की कामना का प्रतीक है।

जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस अवसर पर माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सुख-समृद्धि और सुरक्षित जीवन की कामना करती हैं। इस व्रत की सबसे विशिष्ट बात यह है कि व्रती महिलाएँ कठोर उपवास करती हैं और अनेक परंपराओं में निर्जला व्रत का पालन भी किया जाता है। यह तपस्या केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि संतान के प्रति माँ के गहरे भावनात्मक लगाव और त्याग का लोकाभिव्यक्त रूप है।

जितिया नाम की सार्थकता

‘जितिया’ शब्द का संबंध ‘जीवित्पुत्रिका’ से माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार यह व्रत संतान को जीवन और दीर्घायु प्रदान करने की कामना से जुड़ा है। व्रत के अवसर पर महिलाएँ जिउतिया नामक धागे या आभूषण को धारण करती हैं। यह उनके लिए केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं होता, बल्कि संतान के जीवन की मंगलकामना का प्रतीक बन जाता है।

लोक परंपरा में व्रत के साथ अनेक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। इनमें राजा जीमूतवाहन की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने एक नागपुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया। उनके त्याग और करुणा से प्रभावित होकर नागपुत्र का जीवन बच गया। इसी कथा को त्याग, करुणा और जीवन की रक्षा के आदर्श से जोड़ा जाता है।

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मातृत्व के त्याग का पर्व

जितिया व्रत का सबसे भावपूर्ण पक्ष माँ का त्याग है। माँ स्वयं भूखी-प्यासी रहकर अपने बच्चे के जीवन की मंगलकामना करती है। इस दृष्टि से यह व्रत भारतीय समाज में मातृत्व की उस अवधारणा को सामने लाता है, जिसमें माँ अपने सुख से पहले संतान के सुख को रखती है।

हालाँकि आधुनिक दृष्टि से इस परंपरा को केवल त्याग या सहनशीलता तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। जितिया महिलाओं की सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक सहभागिता का भी पर्व है। व्रत के दौरान महिलाएँ एक-दूसरे से मिलती हैं, पूजा करती हैं, लोकगीत गाती हैं, व्रत-कथाएँ सुनती हैं और अपने अनुभव साझा करती हैं। इस प्रकार यह पर्व महिलाओं के बीच सामाजिक और भावनात्मक संबंधों को भी मजबूत करता है।

लोकगीतों में जीवित है जितिया

जितिया की आत्मा उसके लोकगीतों में बसती है। गाँवों और कस्बों में इस अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में माँ की ममता, पुत्र-पुत्री के प्रति स्नेह, पारिवारिक संबंधों, सुख-दुःख और लोकजीवन की अनेक छवियाँ दिखाई देती हैं। इन गीतों में कहीं संतान के लिए आशीर्वाद है, कहीं माँ की चिंता, कहीं परिवार की स्मृतियाँ और कहीं जीवन के संघर्षों की अभिव्यक्ति।

लोकगीतों की यही परंपरा जितिया को केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहने देकर लोकसंस्कृति का जीवंत दस्तावेज बना देती है। इन गीतों में स्थानीय भाषा, बोली और जीवन-पद्धति सुरक्षित रहती है। विशेषकर मैथिली, भोजपुरी, मगही और बज्जिका सहित विभिन्न लोकभाषायी क्षेत्रों में जितिया की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं।

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नेपाल में जितिया की सांस्कृतिक उपस्थिति

नेपाल के तराई और मधेश क्षेत्र में भी जितिया का विशेष महत्त्व है। यहाँ यह पर्व भारत और नेपाल के सीमावर्ती सांस्कृतिक जीवन के बीच मौजूद गहरे संबंधों को दर्शाता है। भौगोलिक सीमा भले ही अलग हो, लेकिन लोकजीवन, भाषा, पारिवारिक परंपराएँ और धार्मिक-सांस्कृतिक विश्वास दोनों ओर अनेक समानताएँ निर्मित करते हैं।

नेपाल के तराई-मधेश में महिलाएँ पारंपरिक विधि से व्रत रखती हैं, पूजा-अर्चना करती हैं और व्रत-कथा सुनती हैं। इस अवसर पर मायके और ससुराल के संबंध भी विशेष रूप से स्मरण किए जाते हैं। कई स्थानों पर यह पर्व महिलाओं के सामूहिक मिलन और लोकसंस्कृति के प्रदर्शन का अवसर बन जाता है।

बदलते समय में बदलता स्वरूप

समय के साथ जितिया व्रत के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। शहरीकरण, रोजगार, शिक्षा और बदलती जीवनशैली के कारण अनेक पारंपरिक रीति-रिवाजों में बदलाव दिखाई देता है। फिर भी इस पर्व की मूल भावना आज भी कायम है—संतान के स्वस्थ, सुरक्षित और सुखी जीवन की कामना।

आज आवश्यकता इस बात की भी है कि परंपराओं को उनके मूल सांस्कृतिक अर्थ के साथ समझा जाए। व्रत व्यक्तिगत आस्था का विषय है और इसे स्वास्थ्य तथा व्यक्ति की शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए। परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह समय के साथ संवाद करती है और मानवीय मूल्यों को अपने भीतर सुरक्षित रखती है।

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मातृत्व से आगे मानवता का संदेश

जितिया का संदेश केवल संतान की दीर्घायु तक सीमित नहीं है। जीमूतवाहन की कथा में दूसरे के जीवन की रक्षा के लिए स्वयं का त्याग केंद्रीय मूल्य है। यही इसे व्यापक मानवीय संदर्भ प्रदान करता है।

आज जब दुनिया अनेक प्रकार के तनाव, हिंसा, असुरक्षा और सामाजिक विघटन से गुजर रही है, तब जीवन के प्रति सम्मान, करुणा, त्याग और पारिवारिक संवेदना जैसे मूल्य और भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। जितिया हमें याद दिलाता है कि जीवन की रक्षा और अपने प्रियजनों के सुख की कामना मानव सभ्यता की सबसे पुरानी और सबसे सहज भावनाओं में से एक है।

निष्कर्ष

जितिया व्रत भारतीय और नेपाली लोकसंस्कृति में मातृत्व, ममता, आस्था, त्याग और लोकस्मृति का पर्व है। इसके अनुष्ठान में जहाँ धार्मिक विश्वास दिखाई देता है, वहीं इसके गीतों और कथाओं में लोकजीवन की संवेदनाएँ सुरक्षित हैं। बदलते समय के बावजूद यह पर्व आज भी परिवार और समाज को भावनात्मक रूप से जोड़ने का काम करता है।

जितिया का वास्तविक सौंदर्य केवल कठिन उपवास में नहीं, बल्कि उस भावना में है जिसके कारण एक माँ अपनी संतान के जीवन में सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती है। यही भावना इस पर्व को पीढ़ियों से जीवित रखे हुए है और आने वाली पीढ़ियों तक भी इसकी सांस्कृतिक ज्योति पहुँचाती रहेगी।

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