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राष्ट्रपति निवार्चन, शपथ में मधेशियों की शुन्य उपस्थिती : कैलाश महतो

 

कैलाश महतो,परासी,३० अक्टूबर |
अब कितने समय लगेंगे मधेशियों की आँख खुलने में ? देखा आपने अपनी और अपने समाज की अवस्था को ? नेपाली नव राष्ट्रपति विद्या देवी भण्डारी के शपथ ग्रहण कार्यकम में हजारों नेपाली तथा विदेशी अतिथी तथा कुटनीतिज्ञों को शपथ समारोह में बुलाया गया था । उनमें मधेशी कितने थे ? सैकडों विशिष्ट अतिथियों में एक भी मधेशी ? आखिर क्यूँ नहीं ? मधेशी दल के मधेशी हमारे नेता महोदय तथा नेपाली पार्टीयों में गुलामी को ही अपना सोर्स और फोर्स मानने बाले मधेशी गुलाम नेताओं का तो यह कहना है कि आज के नेपालियों से पूराना नेपाली तो वे हैं, क्यूँकि मधेशियों ने ही तो नेपाल बनाया और नेपाल पर पहला शासन भी किया ।

vidyadevi bhandari

दुनिया के भूमि आन्दोलन के इतिहास को गौर से देखें तो यही देखने को मिलता है कि भूमि जितने बालों की ही रही है । और हमारे लाल बुझक्कड कुछ नेता साहब लोग जिस प्राचीन और मध्य युगीय नेपाल की बात करते हैं, उस नेपाल को प्रथमतः गोर्खालियों ने धोखे और कायरतापूर्ण रुप ही क्यूँ न हडपा हो, उसे जित ही माना जायेगा । उस छल कपट को भी विश्व के युद्ध राजनीति जीत ही मानती है । दुसरी बात, जिस नेपाल के हर गली, हर चौराहे तथा हर महफिलों में कभी मधेशी गीत, संगीत, संस्कृति, परम्परा तथा रीतिरिवाज की गुञ्जन होती थी, आज उनके इतिहास भी वहाँ खोजना मुस्किल है । तीसरी बात, जिस नेपाल पर कभी मधेश की परम्परा ही नेपाली संस्कृति और परम्परा हुआ करते थे, आज नेपाल को पूर्ण रुपेण कब्जा कर चुके छद्म गोर्खाली नेपाली लोग नेपाल में मधेश ही नहीं होने का पाठ्य पुस्तक तैयार कर रहे हैं । और आप के ही नेपाल को कब्जा कर उस भरी नेपाल में आप के सारे नेपालित्व को लात पर लात मारते जा रहे हैं । और उसी का परिणाम है कि राष्ट्रपतिय शपथ समारोह में आपकी उपस्थिती को विदेशी कुटनीतिज्ञ तथा अतिथियों में अस्वीकार किया गया है ।

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हम ५० प्रतिशत से उपर के जनसंख्या में होने बाले मधेशी नेपाली नहीं होने का स–प्रमाण नेपालियों ने आज पूनः पेश किया है । वह भी विश्व के कुटनीतिक अतिथियों के सामने । और यही प्रमाण है कि हम नेपाली नहीं है । हमारा मधेश नेपालियोंद्वारा अविजित है और इस भूमि पर उन्हें शासन करने का कोई भी अधिकार नहीं है ।

आज तो सारा विश्व ने देखा है कि मधेशियों की उपस्थिती राज्य में लगभग गौण है और मधेश की ऐसी कोई भी झलक को राष्ट्रिय पर्व के अवसर पर भी नहीं होना या करबाना नेपाल और मधेश अलग होने का मजबूत प्रमाणों में से एक सशक्त प्रमाण है ।

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दो बातें और भी ध्यान देने योग्य हैं । प्रथम, निवर्तमान राष्ट्रपति डा.रामबरण यादव को राष्ट्रपति पद से विदाई लेने देने का मनस्थिती नेपालियों का पक्का था । उसका सारा बन्दोबस्त राज्य ने कर चुका था, मगर उनके अवकाशप्राप्त जीवन व्यतित करने हेतु घर उस रोज किराये पर ली जाती है, जिस रोज उनकी शितल निवास से विदाई होती है । देश का पहला राष्ट्रपति के रिटायर्ड लाइफ के लिए दुनिया के अव्वल और एशिया के ही सर्वोत्कृष्ट लोकतान्त्तिक गणतान्त्तिक कहे जाने संविधान में कोई व्यवस्था बिना ही उनके जीवन यापन के लिए अपूर्ण मरम्मतीय घर में भगाया जाता है । वहीं प्रधान मन्त्री चुनाव के बाद निवर्तमान बन चुके प्रधानमन्त्री सशिल कोइराला को कोई अच्छा व्यवस्था न होने तक के लिए बालुवाटार में ही ठहरने की बात होती है ।

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वैसे ही प्रधान मन्त्री ओली ने पूनः प्रष्ट कर चुका है कि तेल तथा भारतीय अन्य वस्तुओं की रुकावट मधेशियों के द्वारा नहीं, अपितु भारत के नाकाबन्दी के कारण है । प्रचण्ड का कहना है कि भारत से इस के बारे में नेपाल सरकार को बात करना होगा । इन नेपाली नेताओं का मानना आज भी यही है कि मधेशी जनता का कोई मायने नहीं है । उनसे बात करने की आवश्यकता अभी भी ये नहीं समझ रहे हैं, क्यूकि मधेशी उनके भाषा में नेपाली ही नहीं है ।

इन सारी विभेदीय घटनाओं से भी हमें सीख लेनी होगी और यह तय करना होगा कि अब आजादी ही अन्तिम उपाय है हर बन्देजों से मुक्ति पाने के लिए ।

“अब तो कम से कम समझो मधेशी, शदियों से लडकर तुमने पाया क्या ?
नेपालियों ने की शैतानी, हमने की गुलामी, अब अपने बच्चों को दास बनायें क्या ?”

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