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नागरिकता के सवाल को राष्ट्रीयता के साथ जोड़ना ही सबसे बड़ा विभेद है

 

सरिता गिरी, राजनीतिज्ञ
विवाह जैसी संस्था का भी राजनीतिकरण कर दिया है इस संविधान ने । जहाँ किसी महिला ने किसी विदेशी से अपनी मरजी से अगर विवाह किया

सरिता गिरी, राजनीतिज्ञ
सरिता गिरी, राजनीतिज्ञ

तो अपने होने वाले बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया । जिस समाज में हम रह रहे हैं, वह आखिर किधर जा रहा है ? अन्तरिम संविधान में जो बातें थी जो अधिकार था उसे जब लागू करने का वक्त आया तो सामंती व्यवस्था ने अपना रंग दिखाया, जिसका परिणाम हमारे सामने है । आज की नई पीढ़ी अपनी सोच में बहुत आगे निकल गई है । उन्हें कोई पाबन्दी पसन्द नहीं है । वो अपनी सोच और अपनी शर्तों के साथ जीना चाहती है । वो पीढ़ी आज के संविधान या राजनीतिक व्यवस्था को नहीं समझती । किन्तु हमें तो यह समझना होगा कि हम नई पीढ़ी को क्या दे रहे हैं ? अगर वो गलत दिशा की ओर जा रहे हैं तो उन्हें वहाँ से निकलने और बचने की राह तो हमें दिखानी होगी । उनके लिए स्वतंत्रता और अधिकार की बातों को संविधान में तो शामिल करना होगा । अगर हम नई पीढ़ी को स्वतन्त्रता नहीं देते कि वो खुद के लिए अपनी राह तय करे तो ऐसे संविधान का क्या मतलब ? दूसरी बात कि राज्य जो व्यवहार हमारे साथ करता है उसका असर कहीं ना कहीं हमारे परिवार पर भी पड़ता है । मैं अंगीकृत नागरिक हूँ और अगर हम पर राज्य भरोसा या विश्वास नहीं करता तो कल हमारा परिवार भी हम पर विश्वास नहीं करेगा । राज्य अगर हमें सम्मान नहीं देता तो हमें कहीं सम्मान नहीं मिलेगा । अगर संक्षिप्त में मैं अपनी बात कहूँ तो, यह संविधान हमें किसी भी क्षेत्र में कोई सम्भावना नहीं देता है । हम कहीं किसी से कोई प्रतिस्पद्र्धा नहीं कर सकते क्योंकि हमें इस अधिकार से भी वंचित कर दिया गया है । नागरिकता के मामले में अभी भी हमारे पास वक्त है हमें इसे उठाना ही होगा । समानुपाती और समावेशी का फायदा भी अप्रत्यक्ष रूप से उसे ही मिल रहा है जो पहले से ही स्थापित हैं । उन्हें इससे कोई फायदा नहीं है जो दबे या पिछड़े हैं । हमारे देश में आज भी महिलाएँ इस अवस्था में हैं जो संविधान के विषय में कुछ नहीं जानती । उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि संविधान ने उसे क्या दिया है और उसका क्या छीना है । इस अज्ञानता को पहले हटाना होगा । उन्हें उनके अधिकार से परिचय कराना होगा तभी एक साथ हमारी माँग सामने आ सकती है और हम अपने अधिकार को पा सकते हैं । नया संविधान बना किन्तु उसमें नया कुछ नहीं है । मधेश को दबाने के लिए नागरिकता के कानून को लाया गया था और आज भी वही किया गया । नागरिकता के सवाल को राष्ट्रीयता से जोड़कर कब तक भजाया जाएगा ? इस मानसिकता से निकलना होगा । यह संविधान महिलाओं लिए पूर्णतः विभेदकारी है । रास्ता कठिन है राह बहुत लम्बी है पर आगे तो हमें बढ़ना ही होगा क्योंकि हमें हमारी उपस्थिति और पहचान अपने देश में स्थापित करनी है ।

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