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मधेसी मोर्चा तथा गठबन्धन को सरकार में लाने को क्यों हो रही है कसरत

 

विजेता चौधरी, काठमाण्डू, १६ साउन

नेपाली कांग्रेस तथा माओवादी केन्द्र के गठबन्धन में मधेसी मोर्चा तथा संघीय गठबन्धन को भी शामिल करने की कसरत जारी है । सवाल उठता है क्या ये सिर्फ समर्थन हासिल करने के लिए किया जा रहा है ? क्या नई बननेवाली सरकार मधेस के मागों में सहमति कायम कर पाएगी ? उस से भी अहम मुद्दा संविधान संशोधन का है ।

sansad meeting with morcha

बहुमतीय सरकार गठन साउन १९ गते होने जा रही है, संभवतः इसी लिए सहमतीय सरकार गठन से पहले मधेसी तथा जनजाति के गठबन्धन का भी समर्थन हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है । बहरहाल अभी तक का राजनीतिक दाउपेच बता रहा है, कि मधेसवादी दल भी सरकार में ही शामिल होगी अन्यथा बाहर से भी सरकार को समर्थन करने की बात पर वहस किया गया है ।

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गौरतलब है, सरकार में जाने या न जाने के विषय में मधेसवादी दलों के बीच अभी तक मतभेद कायम है । नई सरकार का गठबन्धन अगर मधेस के माग के उपर सहमति करती है साथ ही संविधान संशोधन विधेयक दर्ता करवाती है तभी गठबन्धन सरकार में जाने की संभावना दिखाइ दे रही है ।

अगर ऐसा नहीं होता है तो विगत के आन्दोल के उपर प्रश्नचिन्ह खडा होना स्वभाविक है । पहले ही सरकार में जाना मधेसवादी नेताओं का अपने जनता एवम् अपने समर्थकों के साथ किया गया धोखा व कुठाराघात सावित हो सकता है ।

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अगर आंकडो की माने तो अभी तक १७० के लगभग मधेसी नेता कार्यकर्ता जेल में है । २६५ मुद्दा चल रहा है । शहीद घोषणा की मांग अपनी जगह अटकी हुई है । सीमांकन विवाद लगायत बहुत सारी समस्या को लेकर अब तक मधेसी नेता सडक पर जमे रहें । अब जनमत की राय के अनुसार आगे की रणनीति है तय करना मधेसियों के हित में हो सकता है । यद्यपि अपने मागों को पूरा करने के लिए अवसर को पकडना भी लाजिमी है ।

बहरहाल अब सरकार में जाने व समर्थन देने के विषय में ये नेता क्या कदम उठाते हैं ये तो अभी देखना बांकी है ।

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माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल के अध्यक्षता में बनी वार्ता समिति में नेपाली कांग्रेस के विमलेन्द्र निधि, कृष्णप्रसाद सिटौला तथा रमेश लेखक रहें हैं । वहीं माओवादी के तरफ से कृष्ण्बहादुर महरा, देव गुरुगं तथा गिरिराजमणी पोखरेल तथा मधेसी जनजाति गठबन्धन के तरफ से ह्दयेश त्रिपाठी, राजेन्द्र श्रेष्ठ एव्म कुमार लिगंदेन रहें हैं ।

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