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” अन्याय के प्रतिकार और न्याय की रक्षा ” के लिए, आये भगवान श्रीकृष्ण ….

 

गंगेश मिश्रkr1

जब भी समाज में प्रेम, त्याग और परोपकार जैसे मानवीय गुणों में कमी आती है और अन्याय-अत्याचार जैसे दुर्गुणों में वृद्धि होने लगती है, तो इससे सम्पूर्ण मानवता प्रभावित होती है।
माना जाता है, आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व कुछ ऐसी ही घटना घटी; उस समय गणतान्त्रिक राज्यों के स्थान पर बड़े-बड़े साम्राज्यों की स्थापना का सूत्रपात हो चुका था। कुचक्र रचने में निपुण शक्तिशाली राजागण स्थानीय शासन को ध्वस्त कर अपना साम्राज्य स्थापित करने में लगे थे।शक्ति के मद् में चूर सत्तालोलुप मगध नरेश जरासंध ने कई छोटे राजाओं को कैद कर उनके राज्यों पर कब्जा कर लिया था।मथुरा के राजकुमार कंस की दुष्टता और राज्य लोलुपता इतनी बढ़ गई कि उसने अपने वृद्ध पिता महाराजा उग्रसेन तक को बन्दी बनाकर, उनके सिंहासन पर अधिकार कर लिया।दुर्योधन की घोर उद्दंडता और स्वार्थपरता भी चरम पर थी।ऐसे में लोगों की रुचि गलत कार्यों में अधिक होने लगी, समाज में बुराइयाँ बढ़ने से सज्जन लोगों की परेशानियाँ बढ़ गईं।
द्रोणाचार्य जैसे विद्वान और ज्ञानी भी कौरवों के साथ हो लिए, इससे सबसे बड़ी क्षति यह हुई कि अन्याय का विरोध करना लोगों ने छोड़ ही दिया।संकट की ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण समाज एक ऐसे महापुरुष की राह देख रहा था, जो अधर्म का नाश कर पुनः धर्म की स्थापना करे; लोगों की यह अभिलाषा पूर्ण हुई और भाद्रपद की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।
यदि हम श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण जीवन पर गौर करें, तो बाल्यावस्था से ही उनका समस्त जीवन अन्याय के प्रतिकार और न्याय की रक्षा करने में बीता।उनके चरित्र से यह शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को कभी भी प्रलोभन या भय के वशीभूत नहीं होना चाहिए और न ही अन्याय के सम्मुख कभी सिर झुकाना चाहिए।उन्होंने राजनीति, सामाजिक, धार्मिक, कला आदि कई क्षेत्रों में कार्य किया तथा लोगों को सन्मार्ग पर चलना सिखाया।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से जो उपदेश दिया, वह आज भी प्रासंगिक है।
श्रीकृष्ण ने फल की चिंता किए बिना कर्म करने की शिक्षा दी, तत्काल सफलता भले न मिले ; तो भी सच्चे मन से किया गया कार्य निष्फल नहीं होता, समय आने पर किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है।

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