जीवनमुखी चेतना को प्रदर्शित करती जीवन्त भित्ति चित्र : विजेता चौधरी
विजेता चौधरी
ललितपुर लगनखेल की सड़कों से गुजरते हुए हर एक राही मानसिक अस्पताल की दीवार पर चित्रित तस्वीर को निहारते हुए निकलते हैं । आखिर उन तस्वीरों में ऐसी क्या चेतना होगी जो हर निगाह को रोकती होगी ?
अस्पताल की दीवार पर मानसिक रोग, डिप्रेसन व आघात के विषय में अनेक तस्वीरें हैं, तस्वीरों में व्यक्त मनोरोगियों की मनोभावनाएँ व आचरण को दर्शाया गया है । जिस से लोग मनोरोगियों की विक्षिप्त अवस्था को सहज रूप से समझ सकते है, अनुभूत कर सहते हैं । निःसन्देह यही उद्देश्य रहा होगा अस्पताल की दीवारों पर इस आशय के भित्तिचित्र बनबाने की ।
मानसिक अस्पताल लगनखेल की एक नर्स से बात करने पर उन्होंने कहा–हमारे आस–पास कई प्रकार के मानसिक रोगी, डिप्रेस्ड तथा तनावग्रस्त लोग रहते हैं, जिनकी आचरण तथा व्यवहार कभी–कभार हैरान कर देने बाली होती है, या असामान्य होता है जिसे हम समझ नहीं पाते हैं । मानसिक रोगियों की अवस्था समझना परिवार, मित्र या समाज के लिए आवश्यक है तभी बीमार को उस के समस्याओं से छुटकारा दिलाने में मदद मिल सकती है, यही जनचेतना जगाने के लिए अस्पताल ने उक्त चित्र बनबाया है ।
इससे पहले अस्पताल की दीवार पर न जाने कितने राजनीतिक नारा लिखा रहता था । फिल्मो का भद्दा पोस्टर चिपका रहता था, बहरहाल अभी दृश्य बदल गया है, अब उन दीवारों पर हमारे महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा की कविता भी लिखी है । वहीं एक जगह लिखा है, मैं एक मेरी सोच अनेक (देखें तस्वीर १२, १३, १४, १७) ।

दीवार पर बनी अनेक भित्ति चित्र में से एक बहुत ही आइकानिक है, जिस में एक मानवरुपी पौधा मुरझाए हुए दूसरे पौधा में दिलरुपी पानी डाल रहा है (देखें तस्वीर), इस का आशय है कि जो मानसिक रुप से अस्वस्थ है, आप के आसपास या परिवार में उन्हें प्यार दे कर सीचों, उसे भी खिलने के लिए सहयोग करो । शायद ये तस्वीर कर्तव्य भी सिखा रही है । नजाने कितनी ही अव्यक्त भावनाएँ है इस एक तस्वीर में ।
एक चित्र हमेशा कुछ न कुछ दर्शाता है । अपने रंगों के माध्यम से, अपनी लकीरों के माध्यम से । उपत्यका की ही दीवारों की बात करें तो प्रायः शहर के सड़कों के किनारे की दीवार पर चेतनामूलक वाल पेन्ंिटग बनायी गयी है । जो सहज ही यात्रियों का ध्यानाकर्षण करती है ।
चित्रकार मिलन नेपाल बताते हैं– वाल पेन्ंिटग शौकिया तौर से बनवाने वालों की कमी नहीं है । फूल पौधा, भित्ति चित्र में नारी, वृक्ष, पशुपक्षी, मिथिला चित्रकला, मुगल कला लगायत बहुत सी तस्वीरें लोग अपने निजी घर, कार्यालय के दीवार पर शोभा बढ़ाने के उद्देश्य से बनवाते हैं । परन्तु भित्तिचित्र जनचेतना जगाने के लिए सब से महत्वपूर्ण स्तम्भ है । इस के जरिए जहाँ एक तरफ कला का प्रदर्शन होता है वहीं चेतनामूलक चित्र से लोगों में जनचेतना जगायी जा सकती है ।
कुछ वर्ष पहले तक शहर की प्रत्येक दीवारें राजनीतिक नारा से भरी रहती थीं ।
कहीं लाल सलाम का नारा, कहीं महाधिवेशन को सफल बनाने का नारा तो कभी बृहत आम सभा को सफल बनाने के लिए टुडीखेल चलने का नारा इन सबसे दीवारें सजी रहती हैं और कुछ नहीं तो फिल्मों के प्रचारबाजी के लिए शहर की दीवारें प्रमुख पाटी अर्थात् बोर्ड बनी थी, जहाँ जब चाहें जो चाहें चिपका दें कोई रोकने–टोकने वाला नहीं ।
यद्यपि ये चलन अभी भी बरकरार है, लेकिन कुछ अंकुश अवश्य लगा है । पिछले साल आए महाभूकम्प के बाद से शहर की दीवारो पर भावनात्मक चित्रें ज्यादा बनने लगी है ।
लेट अस स्टार्ट कहते हुए भूकम्प में ध्वस्त कई ऐतिहासिक मन्दिर तथा
<सम्पदाओं का चित्र दीवार पर बनाकर कलाकारों ने स्वतःस्फूर्त चलो देश बनाते हंै का नारा सहित अनेक चित्रकारी की थी । नेपाल में भित्ति चित्र का ये एक ऐतिहासिक कालखण्ड भी स्मरण योग्य है ।
वैसे तो हरेक चित्रकार अपनी चित्र में नई संसार रचता है । जो इस से पहले कभी नही बना होता है । हम इन चित्रों का आनंद लेते हैं । इन की लकीरें, प्रकार तकनीक देखकर दंग रह जाते हैं । कुछ अबुझ सी पहेली चित्र की भांति । लेकिन भित्तिचित्र अक्सर मुखर हुआ करती है । प्रायः भित्तिचित्र को समझना आसान होता है । तभी तो इस को जनचेतना का माध्यम बनाया गया होगा । यद्यपि प्रत्येक चित्रकारी चाहे वो भित्तिचित्र हों या अन्य हमें आश्चर्य में डाल देता है की आखिर ये कैसे बना होगा ।
माइतीघर से थापाथली जानेवाली सड़क जहाँ बसस्टाप है, उन दीवारों पर महिला प्रजनन अधिकार कार्यक्रम अन्तर्गत उक्त संस्था ने नेपाली समाज में व्याप्त महिला–पुरुष के बीच की असमानता, प्रजनन अधिकार, बालविवाह, शिक्षा में पहुँच की कमी लगायत के विषय में बेमेल समाजिक स्थिति का चित्रण किया है । (देखें तस्वीर १, २, ३, ६, ८)
इन तस्वीरों में तराजु के एक पलड़े में महिला तथा दूसरे पलड़े में पुरुष बैठा हुआ है और हमारे सामाजिक असन्तुलन को उभारती उक्त भित्तिचित्र में पुरुष का पलड़ा भारी दिखाया गया है । वहीं दूसरी तस्वीर में रोता हुआ एक छोेटा बालक और गर्भवती माँ का चित्र है । ये चित्र बच्चा पैदा करने में अन्तर रखने की चेतना प्रस्तुत करती है जिससे बच्चों को उचित देखभाल तथा मातृत्व उपलब्ध हो सकती है । दूसरी तस्वीर में स्कूल जा रहा एक लड़का तथा घास का बोझ लिए उसी रास्ते चल रही एक लडकी की तस्वीर है जो महिलाओं के शिक्षा में पहुँच की कमी की नंगी तस्वीर प्रस्तुत करती है । आज भी हमारा समाज बेटे को शिक्षा तथा बेटी को घर–व्यवहार में सीमित रखती है । एक और तस्वीर है उस दीवार पर जो हर राही को निःसन्देह झकझोरती होगी, एक व्यस्क को एक छोटी सी बालिका माला पहना रही है । आखिर हमें क्या दृश्य दिखाना चाह रही है ये तस्वीर ? ये बाल विवाह नहीं अनमेल विवाह का भाव दर्शाती है । जो आज भी हमारे ग्रामीण समाज में व्याप्त है । इतना ही नहीं एक पुरुष पैर जो महिला को पीटने के लिए उठा है, ये तस्वीर सर्वशक्तिमान समझनेवाले पुरुषप्रवृत्ति का पर्दाफास कर रही है ।
इतना ही नहीं नाचघर से घण्टाघर की ओर मुड़ने बाली व्यस्त सड़क के किनारे की दीवार हमेशा लोगों की नजरें अपनी ओर आकृष्ट करती है । बालअधिकार की तस्वीरें, बच्चों को स्वच्छता सिखाती भित्तिचित्र से रंंगी हैं ये पुरानी दीवार । खाने से पहले, ट्वाइलेट प्रयोग करने बाद हाथ पैर साबुन से धोना, हाथ को साफ से धोने का तरीका भी दर्शाया गया है । पर वहीं दूसरी ओर एक किशोरी का दुप्पट्टा खींचता एक पुरुष, सोचिए ये तस्वीर क्या कहना चाह रही होगी ।
उसी दीवार पर एक सिमटी सी अस्तव्यस्त लड़की की तस्वीर के नीचे लिखा है, स्टॉप साइबर क्राइम, अर्थात साइबर क्राइम बन्द करो, वहीं चित्र के चारो तरफ फेसबुक, यु ट्युब, ट्वीटर लिखा हुवा है । दूसरे चित्र में हिंसायुक्त नारी की प्रतीक तस्वीर बोलती है, स्टॉप भोइलेन्स अगेन्स्ट वुमन, अर्थात नारी विरुद्ध की हिंसा बन्द करो । इन तस्वीरों को अति व्यस्त सड़क पर विभिन्न एनजिओ तथा आइएनजिओ वालों ने चित्रित करवाया है ।
बबरमहल स्थित होमनेट नेपाल नामक गैरसरकारी संस्था की कार्यक्रम व्यवस्थापक सरला बताती हैं इन तस्वीरों को बनवाने का उद्देश्य प्रचारबाजी नहीं जनचेतना जगाना ही है । साथ ही हिंसा के विरुद्ध की आवाज बुलंद करना भी है । वे बताती हंै, कई अवस्था में हम हिंसा झेल रहे की चेतना महिलाओं को नहीं होती तो वहीं पुरुषों को भी इन तस्वीरों के माध्यम से महिला के प्रति हिंसा न करें न होने दें तथा रोकें आदि चेतना जगाना रहा है ।
ब्रिटिस दूतावास की बाहरी दीवार पर शान्ति का प्रतीक कबुतर के मँुह से ह्वैल मछली का कड़ा दांत आक्रोश का प्रतीक है, यद्यपि ये शान्ति व आक्रोश का संगम लगता है वहीं इस का उद्देश्य द्वैध प्रतीत होता है । उसी दीवार पर लिखा हुआ एक संदेश भी है, जो खुद बोलती है । (देखें तस्वीर ७, ९)
ज्वागल की सड़क के किनारे कण्डम का बड़ा सा चित्र बनाया गया है । कण्डम के भीतर एक दम्पत्ति व एक चिकित्सक है जो संभवतः यौन सम्पर्क, यौन रोग व फैमिली प्लानिंग के लिए कण्डम प्रयोग की चेतना प्रदर्शित कर रही है । वहीं सटी हुई एक और तस्वीर है जहा आधा दर्जन पर्म को गर्भनिरोधक सुई, दवा, कापरटी व कण्डम की तस्वीर ने रोका हुआ है । ये तस्वीर गर्भनिरोध के लिए विभिन्न साधन का प्रचार या कहुं जनचेतना जगा रही है । ये कोई अस्पताल की दीवार नही उपत्यका के बड़े होटल एभरेष्ट की बड़ी सी दीवार पर सालों पहले बनाया गया चित्र है जिस का रंग भी अब धुलने लगा है ।
त्रिपुरेश्वर चौक से सुन्धारा की ओर जब आगे बढ़ेंगे तो पानी के मुल्य को समझाती हुई तस्वीरें दिखेंगी । जो संदेश देती है कि कभी भी पानी को बेवजह बरबाद ना करें । जल जीवन है और जल की कमी से राजधानी ही नहीं विश्व गुजर रहा है । सेभ वाटर सेभ लाइफ अर्थात् जल बचाओ जीवन बचाओ । कई जगह एड्स से सम्बन्धित तस्वीरें राजधानी की दीवारों पर चित्रित मिलती हैं जो यह बताती हैं कि एडस संक्रमित रोगी घृणा के नहीं सहानुभूति के पात्र हैं और उन्हें भी समाजिक जीवन जीने का हक है । उन्हें छूने से या उनके पास जाने से यह रोग फैलता नहीं है ।
इस तरह हम देखते हैं कि हमारे शहर के दीवारों पर हर पल हमें जीवनमुखी चेतना प्रदर्शित करती चित्र नजर आती है । ये सिर्फ तस्वीरें नहीं हैं ये जीवन के मूल्यों को समझाती हैं । वो मूल्य जिसे जानते और समझते हुए भी जनमानस इन बातों को अनदेखा करता है । ये तस्वीरें हमारी चेतना के सुषुप्त हिस्से को जगाती है । हमें बस उन तस्वीरों की परिभाषा और व्याख्यान को समझना होगा, अनुसरण करना होगा । भित्तिचित्र में चित्रित चेतना को अपने अंदर जगाना होगा । तभी तो इन तस्वीरों की सार्थकता सिद्ध होगी । ये चेतनामुखी भित्तिचित्र मात्र शहर की दीवारों पर नहीं वरन् गाँवों व छोटे छोटे कस्बों की कच्ची दीवारों पर भी अंकित व चित्रित होने चाहिए । तभी तो समता मूलक चेतना व समाज की परिकल्पना संभव होगा ।
मालिनी मिश्र के सहयोग में

