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सेवा काल में पर्यटन

 

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय
सेवा काल व्यस्तता से भरा होता है । समाचार माध्यम, विशेषतः प्रसारण संस्थाओं से जुड़े पत्रकार कर्मचारियों के लिए क्या होली, क्या दीवाली सभी ड्यूटी के ही दिन होते हैं । ६–७ घंटे की ड्यूटी भी कब ८–१०घंटे की हो जाय पता नही रहता । अपने गाँव–घरों से दूर कार्यरत पत्रकारों के लिए तो लंबी छुट्टियों के दिन अपने परिवारजनों से मिलने की चाह उन्हें अपने गाँव या शहरों की ओर जाने को प्रेरित करती हैं तो २–३दिन के अवकाश की अल्प अवधि में उन्हें कई बते हुए काम निबटाने होते हैं । ऐसी स्थिति में अपने घर से दूर कार्यरत मुझ जैसे रेडियो संचारकर्मी के मन में पर्यटन की बात कभी दिमाग में आती भी तो कैसे ?
लेकिन कभी–कभी हालात ऐसे हो जाते हैं कि तीर्थाटन भी पर्यटन का स्वरुप ले लेती है । एक बार मेरी माता जी के इलाज के लिए पिता जी दिल्ली आए । भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उनका इलाज चल रहा था । कई रिपोर्ट आने थे । अतः घर लौटने पर माता जी कहने लगी– ‘अब तो एक हफ्ते के बाद ही डॉक्टर के पास जाना होगा । अतः एक बार हरिद्वार हो आने की इच्छा हो रही है ।’ ऑफिस से छुट्टी पाने की स्थिति नही थी । अतः मेरे लिए उनके साथ जा पाना कठिन था । अपनी विवशता बताने पर पिताजी ने कहा– ‘कोई बात नही है । मैं तो रहुँगा ही । घूम आते हैं ।’ और एक दिन रात की गाड़ी से दोनों रवाना हुए हरिद्वार के लिए । वहाँ से लौटने पर पिताजी ने कहा– ‘हरिद्वार से इतने निकट रहते हो, एक बार हो आओ न हरिद्वार, बहुत ही पावन और रमणीय तीर्थ है । शाम के वक्त गंगा पर होने वाली आरती तो दर्शनीय है ही, मन को भी छू लेती है ।’
उनकी यह बात मेरे मन में बैठ गई । पर सोचा–‘इतनी जल्दी क्या है । कभी आराम से चलेंगे ।’शादी होने पर समय निकालने में परेशानी हो रही थी । एक ओर समय बीतता जा रहा था और दूसरी ओर पिता जी की बातें स्मृति पटल पर उभरकर आती रहती थी । जब बच्चे चलने–फिरने योग्य हुए तो पत्नी से कहा–‘ चलते हैं हरिद्वार । कैजुअल लीव पड़ी है । अतः ३–४दिनों की छुट्टी ले लेता हूँ ।’ वह तैयार हुईं तो हम लोग २बच्चो. को साथ लेकर चल पड़े हरिद्वार की ओर ।
अंतरराज्य बस अड्डे से बस चलती थी हरिद्वार के लिए । वहाँ जाकर हम लोगोंं ने बस ली । रास्ते में चाय–नाश्ता लेते हुए ४घंटे की यात्रा के बाद हम लोग हरिद्वार पहुँचे । रास्ते में कभी उँटो को बोझा ढोते तो कभी हाथी को चलते और कभी सड़क के निकट से ही रेलगाड़ी को सीटी बजाकर दौड़ लगाते देख बच्चे खुशी से चिल्ला उठते । दिल्ली जैसे महानगर में हाथी दिखाई भी दे तो उँट का दिखना मुश्किल था । अतः उनका उत्साहित होकर चिल्लाना हमें भी अच्छा लग रहा था ।
मई का महीना था । मध्य दुपहरी में हरिद्वार पहुँचने पर सबसे पहला काम था हर की पौड़ी मे स्नान करना । हर की पौड़ी की सुंदरता को निहारते हुए जब पावन जल में डुबकी लगाने उतरा तो जल की शीतलता से मंत्रमुग्ध हो उठा । दो डुबकी के बाद लगा सारी थकान मिट गई । अतः निकलने का मन नही हो रहा था । लेकिन बच्चोें को काफी देर शीतल जल में रखना उपयुक्त न ठानकर बाहर निकला ।
उसके बाद हर की पौड़ी में ही अवस्थित देवी–देवताओं के दर्शन करते हुए भूख को मिटाने निकले । जब घाट के समीप के भोजनालय में खाने को पहुँचे तो हम पति पति–पत्नी ने तो किसी प्रकार अपनी क्षुधा मिटाई पर बच्चाें को तेज मिर्च की सब्जी के कारण फीकी पूरी खाकर ही अपनी भूख मिटानी पड़ी । रात का भोजन जल्दी करने का विचार करते हुए हम वहाँ से निकले और कुछ देर विश्राम करने की नीयत से पहुँचे नेपाली धर्मशाला । पर वहाँ जाने पर लालमोहरिया पंडे आ गए पोथे लेकर । उनकी जिज्ञासा पूरी करते–करते विश्राम करने की सोच छू हो गई । शाम ढल चुकी थी । अतः वहाँ से निकले और चाय पीते हुए पहुँचे गंगा की तट पर, जहाँ आरती की तैयारी हो रही थी । घाट पर असंख्य लोगों की भीड़ थी । पहले तो हम लोग दूर से ही नजारा देखते रहे पर जब प्रज्वलित दीप जलराशि पर तैरने लगी तो बच्चों को लेकर हम पहुँच गए तट के निकट । पावन गंगा की बहती जलधारा में फूलमालाओं से ढके दीपों का हलचल और दीपों से निकलती किरणेें जल में अलौकिक वातावरण प्रस्तुत कर रहे थे ।
माँ गंगा की आरती समाप्त होने पर उन्हें नमस्कार करते हुए हम निकले एक ऐसे भोजनालय की तलाश में जहाँ बच्चे आराम से भोजन कर सकें । इस तलाश में हम ऐसे ढावा में पहुँचे जहाँ थाली में खाना परोसा गया था । खाना घर के समान सादा और स्वादिष्ट था । उस पर थाली में खीर का कटोरा पाकर तो बच्चे खुशी से उछल पड़े । लौटे तो देखा गंगा के तट पर भीड़ यथावत है । अब क्या है वहाँ ? इस जिज्ञासा ने हमें पुनः उस ओर आकर्षित किया । चाँदनी रात थी । चन्द्रमा की स्वच्छ शुभ्र रश्मि गंगा की बहती जलधारा पर अपनी अलौकिक सुंदरता बिखेर रही थी ,यह एक ऐसा नजारा था जो सभी लोगों को सम्मोहित कर रहा था । जब घड़ी पर नजर पड़ी तो देखा ११बज रहे हैं । इस अलौकिक नजारे के सामने बच्चों की नींद भी गायब थी । अंततः हम वहाँ से निकल पड़े दिन भर का थकान मिटाने और कल सुबह के लिए उर्जा प्राप्त करने ।
हमारा सुबह का कार्यक्रम भी गंगा स्नान से ही प्रारंभ हुआ । आकाश में बादल छाए हुए थे । सूर्यदेव लुकाछिपी खेल रहे थे । नहाकर निकलने पर एक रिक्सा ली कनखल के लिए ।
कनखल भी एक पावन मिनी तीर्थ स्थल है हरिद्वार के निकट । स्थानीय जनता इसे भगवान शंकर के ससुराल के रुप में मानते हैं । क्योंकि एक किंवदन्ती के अनुसार जब दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ का आयोजन किया था तो उन्होंने अपने जमाता भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया था , जिसे सहन न कर पाने पर देवी सती ने यज्ञ कुण्ड पर कूद कर अपने प्राण की आहुति दे दी थी । इस कुण्ड के पौराणिक महत्व, इसका रखरखाव, स्वच्छता और वहाँ का पावन वातावरण भी मनमोहक था । भ्रमणकाल में यह भी पता चला कि इस यज्ञकुण्ड का रखरखाव का दायित्व भारत के पुरातत्व औेर पर्यटन विभाग का है ।
हरिद्वार के निकट ही बिलवा पर्वत पर अवस्थित मनसा देवी का मंदिर भी यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए एक पावन दर्शनीय स्थल है । यहाँ का एक आकर्षण है दर्शनार्थी की सुविधा के लिए स्थापित की गई रोप वे, जो विद्युतचालित होने के कारण पर्यटकों को सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मंदिर तक पहुँचने की परेशानी से बचाती है ।
कहते हैं हरिद्वार की यात्रा तब तक पूरी नही मानी जाती है जब तक निकटवर्ती ऋषिकेश की यात्रा न की जाय । अतः इसे पूर्णता प्रदान करने के लिए हम लोग २४किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित ऋषिकेश भी गए । नए–नए स्थलों की यात्रा होने के कारण बच्चे उत्साहित हो रहे थे और हमें पूरा साथ दे रहे थे । यह भी गंगा तट पर अवस्थित और प्राकृतिक सुंदरता से भरा तीर्थ स्थल है । यहाँ के मंदिरों से निकलते घंटों की ध्वनियाँ और दर्शनार्थियों की गतिविधियाँ इसे जहाँ पावनता प्रदान करती हैं वहीं लक्ष्मण झूला इस तीर्थ स्थल कोे संसार भर के पर्यटकों को आकर्षित भी करता है । लक्ष्मण झूला वास्तव में लोहे से बना एक लचकता हुआ पुल है, जिसका निर्माण सन् १९३९में किए गया थे । समुद्र तल से इसकी ऊँचाई १५०मीटर है । लक्ष्मण झूला के अलावा यहाँ के अन्य प्रमुख दशृनीय स्थल हैं राम झूला, जो शिवानंद झूला के नाम से भी प्रसिद्घ है, गीता भवन, त्रिवेणी घाट और स्वर्गाश्रम । त्रिवेणी घाट एक स्नान घाट है । शाम के वक्त यहाँ पर भी गंगा की आरती होती है, जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी होती है । गीता भवन जाने के लिए हमें मोटरबोट से यात्रा करनी पड़ी, जो बच्चों के लिए काफी रोमाञ्चकारी रही । ऋषिकेश एक पावन पर्यटन स्थल होने के अलावा केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोतरी और यमुनोत्तरी जैसे पावन तीर्थों का प्रवेश द्वार भी है । अतः यहाँ पर्यटकों के रहने और खाने–पीने के लिए होटलों और धर्मशालाओं की अधिकता है । इसके अलावा यहाँ ऋषि–मुनियों के कई आश्रम भी हैं ।
१४,०००फीट की ऊँचाई पर अवस्थित गंगोतरी ग्लेशियर से निकलते और पहाडाें के बीच अपना रास्ता बनाते हुए गंगा सबसे पहले इसी स्थल पर उतरती है और हरिद्वार होते हुए उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्र , उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल तक की २५१०की.मी. लंबी यात्रा के बाद समुद्र में विलीन हो जाती है ।
पर्यटन की दृष्टि से यह मेरी पहली यात्रा थी जो तीर्थाटन के कारण ही संभव हो पाया था । हरिद्वार की धार्मिक और पौराणिक महत्व से अधिक पावन गंगा की अलौकिकता ने मुझे इतना सम्मोहित किया कि मैं सेवा काल में इस नगर की यात्रा में कई बार निकला और बच्चे भी हर बार इस यात्रा से आनंद उठाते रहे । आज जब मैं यह लेख तैयार कर रहा हूँ तब मेरी आँखों के सामने गंगा की पावन धारा में बहते हुए दीप, जल में उनकी प्रतिच्छाया और कनखल के स्वच्छ यज्ञकुण्ड के दृश्य उत्पन्न हो रहे हैं, गंगा के शीतल जल का अनूठा अनुभव तो अवर्णनीय है । (क्रमशः)
संंदर्भ सामग्री ः–
१. सरिता (पाक्षिक पत्रिका)
२. रेडियो जिन्दगी
(प्रकाशक–घोष्ट राइटिंग, काठमांडू, नेपाल)

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