Wed. Aug 12th, 2026
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” फूटी आँखों से, जो सुहाता न था; आज उसी से, बिछुड़ने का ग़म है।”

 
 गंगेश मिश्र

पाँच नम्बर से चार नम्बर वाले, पहाड़ी जिलों को अलग करने का प्रस्ताव क्या आया; इन तथाकथित राष्ट्रवादियों के सीने पर साँप लोटने लगा।
मधेश आन्दोलन के दौरान, हर पल मधेशियों को कोसने वाले; आज जब ख़ुद आन्दोलन पर उतारू हैं, तो ये सही है।सीमा पर उठने वाले राजस्व की लालच छोड़ नहीं पा रहे हैं, यही वज़ह है, कि बे-वज़ह राष्ट्रीयता का नारा देकर देश को एक नए आन्दोलन में झोकने पर अमादा हैं,  कम्युनिस्ट।
यह देश लोकतांत्रिक देश के बजाय, जंगलतान्त्रिक देश अधिक लग रहा है।जहाँ न तो कानून है, न अधिकार है, न भाईचारा है, न सद्भाव; चारोओर अराजकता का माहौल है। जहाँ दुनियाँ भर से कम्युनिस्टों का लगभग सफ़ाया हो गया है, पर इस का दुर्भाग्य है कि यहाँ अनायास ही इनका बोलबाला हो गया है।इन्होंने देश का इस प्रकार दोहन किया है, कि आज यह देश बस कंकाल सा; हल्की सी हवा के साथ हिलने लगता है।
” इस कदर लूटा है इसको,
कुछ बचा न शेष है,
अस्ति है बस,
साँस ही अवशेष है।

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