सिर्फ टोपी ही नेपाल की राष्ट्रीयता नहीं है : अब्दुल मोबिन खान
मैं नेपाली भाषा की इज्जत करता हूँ, लेकिन मैं नेपाली को भाषा मानने के पक्ष में नहीं हूँ । क्योंकि नेपाली की अपनी कोई लिपि नहीं है । हिन्दी की लिपि देवनारी है और नेपाली हिन्दी की बोली होने की वजह से देवनागरी लिपि में लिखी जाती है । इसीलिए जब हमारी जुबानों को वे लोग स्वीकार नहीं करते हैं, तो हम क्यों उनकी जुबान को स्वीकारें ?
अब्दुल मोबिन खान, काठमांडू ,५ फरवरी | मधेशी, आदिवासी जनजाति, मुस्लिम दलित, मारवाड़ी आदि समुदायों की जायज मांगों को पूरा किये बगैर मुल्क अगर आगे बढ़ता है, तो वह अनुचित होगा । कोई यह कल्पना करता है कि मधेश बिना के नेपाल, हिमाल बिना के नेपाल एवं पहाड बिना के नेपाल, तो उसकी खामखयाली होगी । हाँ, नेपाल को मजबूत बनाना है, तो यहाँ बसनेवाले तमाम वंचित, शोषित एवं बहिष्कृत समुदायों के मौलिक अधिकारों की प्रत्याभूति करनी होगी । संविधान सिर्फ एक या दो नस्लवादियों के इर्द–गिर्द घुमे और बाकी लोग अपने अधिकारों से वंचित रहे, तो मौजूदा संविधान हमारे मुल्क के लिए फालतू कवायद सिद्ध होगा ।
आजकल राष्ट्रीयता को लेकर बहुत चर्चा होती हैं । ओली का कहना है कि हम जो टोपी लगाते हैं, वही हमारी मूल राष्ट्रीयता है । लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि नेपाल एकीकरण से पूर्व दही बेचने वाले लोगों ने काठमांडू को आबाद किया था । खासकर मधेशियों ने ही यहां आकर आबादी की बुनियाद रखी । कहने से ही सिर्फ मुनासिव नहीं होगा कि वे मधेशी हैं, वे भारतीय हैं । जबकि दुनिया जानती है कि टोपी लगाने वाले लोग भी भारत होते नेपाल में प्रविष्ट हुये हैं । देखा जाए तो कोई भी लोग नेपाल के नहीं हैं । इसलिए सिर्फ टोपी ही नेपाल की राष्ट्रीयता है, ऐसा हम नहीं मानते हैं ।
जहां तक भाषा की बात है । मेरे ख्याल से हिन्दी और उर्दू दोनों जुबानें नेपाल की साझा विरासत हैं । हिन्दी व उर्दू मधेश, हिमाल व पहाड़ की सम्पर्क भाषा रहती आयी है । ये दोनों जुबानें नेपाली जुबानों पर बेशुमार अलफाज हैं । जिसे नेपाली भाषी इस्तेमाल कर रहे हैं । जैसे, अदालत, कानून, क़ानूनी,कानून, सरकार,सरकारी, मस्जिद,वकील, मिसिल आदि । संविधान में नेपाली को राष्ट्रीय भाषा व कामकाज की भाषा के रुप में मान्यता दी गई है । जबकि हिन्दी एवं उर्दू को मान्यता नहीं दी गई है । मैं नेपाली भाषा की इज्जत करता हूँ, लेकिन मैं नेपाली को भाषा मानने के पक्ष में नहीं हूँ । क्योंकि नेपाली की अपनी कोई लिपि नहीं है । हिन्दी की लिपि देवनारी है और नेपाली हिन्दी की बोली होने की वजह से देवनागरी लिपि में लिखी जाती है । इसीलिए जब हमारी जुबानों को वे लोग स्वीकार नहीं करते हैं, तो हम क्यों उनकी जुबान को स्वीकारें ? दूसरों की चादर व चटाई में बैठकर ‘हम होने की बात’ या ‘हमारी नेपाली भाषा’ होने की बात करते हैं, तो उन्हें शर्म होनी चाहिए ।
अभी के हालात में सरकार चुनाव करवाने के लिए जो कदम उठा चुकी है, बहरहाल मुनासिब नहीं है । मुनासिव यही है कि पहले मधेशियों की जायज मांगों को पैकेज पर सहमति से पूरी करे । अगर सहमति के बगैर सरकार चुनाव करवाती है, तो हम समझेंगे कि इसमें कथित बड़ी सियासी पार्टियों का मिलाजुला षड़यन्त्र है । वे असम्भव को संभव बनाने के लिए साजिश कर रहे हैं ।
(अब्दुल मोबिन खान उर्दू एकेडेमी नेपाल के अध्यक्ष तथा नया शक्ति पार्टी के केन्द्रीय परिषद् सदस्य हैं ।)
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