डा.राउत की गिरफ्तारी नेपाल के लोकतान्त्रिक मुल्क होने पर एक बड़ा सवाल ? रोशन झा
रोशन झा, १६ फरवरी,राजबिराज २०७३ माघ २० गते स्वतन्त्र मधेस गठबन्धन के संयोजक वैज्ञानिक डा. सीके राउत को नेपाल पुलीस द्वारा गिरफ्तार किए जाने से मधेस भर हजारों जनता उनके समर्थन में गिरफ्तारी का बिरोध करते हुए तत्काल रिहाई करने के लिए गावं गावं और सडको पे शान्तिपूर्ण प्रदर्शन करने को उतर आयें । उसी क्रम में दर्जनौं को गिरफ्तार किया गया बहुतो को छोड दिया गया और कुछ लोगों पे मुद्दा चलाया गया । जब डा. राउत को फालुगुण १गते सिरहा जिल्ला अदालत मे पेश करने की खबर आई तो पुन: हजारौं लोग सिरहा पहुँच गए। कुछ लोगों को पुलीस द्वारा रास्ते में ही रोकदिया गया और नियन्त्रण में ले लिया गया। लेकिन जब हजारौं की संख्या में मधेसी जन सैलाव सिरहा अदालत अगाडी जाने का प्रयास कर रहे थें तो वहाँ पुलिस द्वारा लाठी चार्ज किया गया, जिसमें चार-पाँच महिला समेत दो-दर्जन से ज्यादा लोग जख्मि हो गए ।
मधेसी जनता जब भी अधिकार की बात करती है तो उन्हे गोली, बोली और झडप का सिकार होना पडता है । परन्तु जब नेपाली(पहाडी) समुदाय के व्यक्ति सड़को पर आन्दोलन करते है तो उन्हे पुलिस द्वारा सुरक्षा दिया जाता है । मधेसी नस्ल के साथ ये जुल्म, शोषण, दमन और अत्याचार आखिर क्यों और कब तक ? नेपाल एक लोकतान्त्रिक मुलुक है और लोकतन्त्र मे जनमत को सर्वोपरी माना जाता है । विभिन्न मानव अधिकारवादी संघ-संस्था, राजनैतिक दल, अधिकारवादी निकाय, देश-विदेश के कुटनितीज्ञय और एक बहुत बडा मधेसी समुदाय ने डा. सीके राउत की रिहाई के लिए नेपाल सरकार से अपिल किया तो राज्य द्वारा उन्हें अनसुना कर दिया गया है । सत्ताधारी दलद्वारा जनमत को अपमानित करते हुए सर्वसत्तावाद की रवैया प्रस्तुत की जारही है । ये एक अहम सवाल है कि अगर नेपाल एक लोकतान्त्रिक मुलुक है तो यहाँ पर मधेसी समुदाय को उपेक्षित रखकर अनसुना क्यों किया जा रहा है ! लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था जनता की सेवा और जनता के हक-अधिकार पर नीहित होनी चाहिए ना कि सत्तासिन दलों के सुविधा के लिए । अगर मधेसी जनता मधेस में जनमत संग्रह कराने की बात कर रही है तो राज्य को मधेसीयों के जनमत का कद्र कर के जनमत संग्रह के द्वारा ही मधेसीयों का हक-अधिकार सुनिश्चितता की पहल करनी चाहिए |


