वधशाला ! जहाँ हर नेता कसाई और हर नागरिक मुर्गा, हांस और बकरी है : बिम्मीशर्मा
बिम्मीशर्मा, बीरगंज , १९ मार्च | (व्यग्ँय) नेपाल के तराई या मधेश से राजधानी काठमाडू के लिए चिनीया परिकार मोमोज बनाने के लिए हरेक दिन भैंस या रागां ले जाया जाता है । पर अब भैंस के साथ ही मधेश को वधशाला बना कर सिहं दरवार और वहां पर राज करने वालों को संतुष्ट किया जा रहा है । पर सिंह दरवार और ईस पर काविज नेताओं का पेट भरता ही नहीं है । सुरसा के मूंह की तरह पिछले साल मधेश आंदोलन के दौरान ५० से ज्यादा मधेशियों का वध करके डकार लिया गया था संविधान जारी करने के बहाने से ।
पिछले हप्ते सप्तरी के मलेठ को भी ईन नेताओं ने वधशाला बना दिया । अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए यह नेता गण कसाई बन देश और जनता की भावनाओं से खिलवाड कर उस विचारो की गंडासी से वध करते हैं । कभी कभी तो लगता है देश का हर नेता कसाई और हर नागरिक मुर्गा, हांस और बकरी है । जिसे जिबह करके सत्ता प्राप्ति के लिए ईन के खून से यह नेता होली मना रहे हैं । जनता के घर में मातम है और नेता मना रहे हैं होली और दिवाली । एक भी नागरिक का मरने का मतलब है नेताओं की नजर में आम के पेड से पका हुआ आम का टपकना । जिसे यह नेता बखुबी चूस कर तृप्त होते हैं । ईनके लिए किसी भी ईंसान का लहू या आंसू का गिरना एक वोट के बराबर है ।
पिछले साल तिलाठी में कोई एक मरा हो या पिछले हप्ते मलेठ में मरे चार जन । नेता तो चिंगारी को हवा देते है और अपने वचन, वाण से हतियार को धार लगा देते हैं । ईसके बाद उस जगह आर वहां की जनता का भगवान ही मालिक हैं । भेड की तरह एक ही गढ्ढे में कुद्ने के लिए जनता तैयार है । किसी की हाथ की लाठी, किसी के विचारों का अंधभक्त होने का खामियाजा जनता को ही भुगतना पड्ता है खुद की वलि दे कर । देश को वधशाला बनाना ही नेताओं की राजनीति का आखिरी मंजिल है । देश को शमसान घाट बना कर उस के सन्नाटे में चांडाल की तरह अकेले अट्टहास करना ही विभिन्न दल और ईनके नेताओं का अभिष्ठ बन गया है । ईसी लिए तो वधशाला का हाकिम बन कर हुकुमत चलाने के लिए नेता गण आतुर हैं । यह नेता गण खुद तो शायद चिरंजिवी या दिर्घजिवी हैं ।
अन्य देशों में पाठशाला, पाकशाला, व्यायामशाला बहुतायत में हैं । पर हमारे देश में मशाल्लाह हर शहर और गावँ मे वधशाला तुंरत बन जाता है । जहां नेताओं के मन में कसाई बन कर किसी को हलाल करने काख्याल आया वहीं वधशाला बन कर हाजिर हो जाता है । ईसी लिए तो मधेश आंदोलन देश के नागरिकों की रक्षा के लिए मुस्तैद पुलिस किसी दल, नेता या मंत्री के विशेष आदेश पर तुरंत कसाई बन कर मुर्गे की तरह अपने ही देश के नागरिकों को हलाल करने के लिए तैयार हो जाता है । और ईस नमकहलाली बदले में उसको मिलती है प्रमोशनऔर पैसा । देश की पुलिस और सेना तो जिस दल की सरकार बनती है उसी के जयजयकार कर उन्ही के आगे पिछे दूम हिलाने लगती है । ईन्हे देश के नागरिको की सुरक्षा से क्या लेना देना ? ईसी लिए तो कम्मर से उपर के भाग में बन्दुक न चलाने के नियम को भी ताक पर रख कर छाती और शीर पर ऐसे टारगेट कर के गोली दागते हैं जैसे वह ईसान नहीं लौकी हो । अपने ही देश के नागरिको से ईतनी नफरत की कर्फ्यू के समय लगाए गए नियम को भी दरकिनार कर देते हैं । संवेदनशील घडी में देश की सेना और प्रहरी खुद को स्वयमभू मानने लगते हैं । ईसी लिएआंदोलन या विरोध में उतरे देश के नागरिकों को तितर, बितर करने के लिए अश्रू गैस, हथगोला फेकंने या लाठीचार्ज करने के बजाय सीधा गोली ठोक कर मार देती है ।
और बहाना यह बनाया जाता है कि किसी फलां पार्टी के बडे नेताओं को मारने का प्लान था ।ईसी लिए पुलिस को वाध्य हो कर मलेठ में गोली चलानी पडी । बेचारे यह नेता हैं की कथाकार समझ में नहीं आता । ईस से अच्छा साहित्य में घूस जाओ भई और लिखो खुब काल्पनिकक हानी और कमाओ पैसे । पर नहीं राजनीति में यह काल्पनिकता घुसेड कर सत्ता पाने का ख्वाब देख रहे हैं । और ईस के लिए देश की जनता को जात, धर्म और वर्ग के खेमें मे अलग कर रेवड़ियाँ बांट रहे हैं । गरीब और मूर्ख जनता भीउल्लू बन कर जहर में लिपटे रेवडी को चाट रही है । ईनको यह नहीं पता की हलाल करने से पहले कसाई बकरी को भी खुब घांस खिलाता है और उसके बाद उसका वध करता है ।
मलेठ में मरने वाले मधेशी थे, धोती थे बिहारी थे, अंगिकृत थे, आतकंकारी ईसी लिए अपने ही देश में अपने दिए हुए टैक्स के पैसो से चलनेवाली प्रशासन और पुलिस को उन्हे मारना पडा । पर कंचनपुर में तो भारतीय एसएसबी के गोली से मरने वाला तो देश का रक्षक था, उसने अकेले ही पडोसी से लड कर उसके द्धारा हड्पे हुए सीमा-नाका की जमिन को बचा लिया । ईसी लिए वह देश का योद्धा था और मर कर शहीद हो गया । क्योंकि वह पहाडी था । उसका वंशज नेपाल का था । उसका ननिहाल और ससुराल भी नेपाल में ही होगा शायद । वह मधेशियों की तरह दिखनें में काला नहीं था भले ही मन का काला क्यों न हो ? और वह धोती भी नहीं पहनता था, न भोजपूरी, मैथिली या हिंदी ही बोलता था । ईसी लिए वह ईस देश का योग्य नागरिक था । ईसी लिएउसके मरते ही शहीद करार दिया गया और नेकपा एमाले पार्टी की तरफ से उसके परिवार को ५ लाख रुपएं दिए गए ।
वाह क्या बात है । कब तक अपने देश के जनता को सौतेला मान कर उनके साथ भेदभाव और मनमानी करती रहेगी सिंह दरवार की सत्ता ? सबसे बडा वधशाला तो सिंह दरवार के अंदर ही है जहां देश के नागरिकों के अधिकार और उनकी भावनाओं का वध करती रहेगी सरकार । देश की सत्ता यदि वधशाला है तो उस पर आरुढ होने वाला दल, नेता, मंत्री और प्रधानमंत्री कसाई । जो नियम कानूनों को रेट कर हत्या करते है और मधेश की जनता का हक मारते हैं । क्यों कि ईन्हे मधेश चाहिए पर मधेशी नहीं । ईन कसाईयों का शरीर तो मधेश के अन्न और आम खा कर अघाया हुआ है पर दिमाग का कुल्हाडी मधेशी का जड खोदने में और उन्हे यहां से बेदखल करने में खर्च हो रहा है ।


