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नारी गौरव है : अंशु झा

 

विडम्बना तो देखिये ! इतने दायित्वों को जो नारियां एक साथ निभाती उस परिवार में घुल–मिल कर रहती है और उसी नारी को अगर मां बनने में थोड़ा सा समय लग गया अर्थात् दो–चार वर्ष के अंदर अगर वह मां नहीं बन पाई तो वही परिवार जिस परिवार के लिए वह न्यौछावर रहती है, उसे घृणा का पात्र बना देता हैIMG_20170401_081659

हमारा समाज पुरुष प्रधान है । जो सदियों से चली आ रही है और वही परंपरा बन गई है कि प्रत्येक परिवार का मुख्य सदस्य पुरुष ही होगा चाहे वह ज्ञानी हो या अज्ञानी । नारी चाहे कितनी भी ज्ञानी हो, फिर भी वह अपने परिवार का प्रमुख नहीं बन सकती क्योंकि उसे समाज में आगे बढ़ने का मौका ही दिया जाता । उसे दबाया जाता है । उसके रहने का स्थान उसे अपने घर तक सीमित कर दिया जाता है अर्थात् चारदीवारियों के अंदर ही । और उसका कार्य भी निर्धारित कर दिया जाता है– सास–सुसर की सेवा, पति की सेवा, बच्चे को जन्म देकर उसका पालन–पोषण, रसोई में सुबह से शाम तक तथा उसके पति के परिवार में जितने भी सदस्य हैं सबका उच्च स्तर पर स्वागत करें । जितने भी सदस्य हैं, सबका उच्च स्तर पर स्वागत करें । प्रत्येक परिवार में नारियों से यही अपेक्षा की जाती है । पर उसके अन्तर्मन के किसी भी सपने को देखने का प्रयास नहीं किया जाता है ।
विडम्बना तो देखिये ! इतने दायित्वों को जो नारियां एक साथ निभाती उस परिवार में घुल–मिल कर रहती है और उसी नारी को अगर मां बनने में थोड़ा सा समय लग गया अर्थात् दो–चार वर्ष के अंदर अगर वह मां नहीं बन पाई तो वही परिवार जिस परिवार के लिए वह न्यौछावर रहती है, उसे घृणा का पात्र बना देता है और यही बातें परिवार से निकलकर समाज तक आ जाती है और समाज में भी वह घृणा की भावना से देखी जाती है । वो विभिन्न नामों से पहचानी जाती है– बांझ, डाइन इत्यादि । यहां तक की अगर सुबह–सुबह उसे कोई देख ले तो विभिन्न प्रकार के ताने उसे सुनने पड़ेंगे ।
अगर कोई महिला पुत्री को जन्म दें तो भी उसे बहुत तानों का सामना करना पड़ता है । और समय–समय पर दुत्कारा जाता है । ये भी सत्य है कि अगर कोई दम्पत्ति बच्चे को जन्म देने में असमर्थ हो तो उसका सारा श्रेय नारी को ही मिलता है । अगर पुरुष में भी समस्या हो तो नारी को ही सब कोसते हैं और हमारे समाज में पुरुष इतने हावी हैं कि वह नारी अपने पति के खिलाफ कुछ बोल नहीं सकती क्योंकि पति परमेश्वर होते हैं, यही सिखाया जाता है ।
हमारे समाज में नारियों पर एक से बढ़ कर एक अत्याचार हो रहा हैं । विभिन्न प्रक्रिया द्वारा नारियों को सताया जा रहा चाहे मानसिक पीड़ा हो या शारीरिक पीड़ा । कहीं दहेज प्रथा के कराण नारी को जलाया जाता है, तो कहीं दहेज के लिए मानसिक तनाव देकर पागल करार कर किया जाता है । कही सास–ससुर के हाथ से पिटती है तो कही अपने पति के हाथ से, ये यातनाएं हमारे समाज में अभी भी अर्थात् इक्सीसवीं सदीं में भी मौजूद है ।
इतिहास गवाह है कि आदि काल से ही नारियों का कर्तव्य भी पुरुषों से कम नहीं है । वह भी पुरुष के कंधों से कंधा मिलाकर हरेक क्षेत्र में अपना कर्तव्य वहन की है ।
आदिकाल से लेकर आज तक की जो प्रगति है, क्या वह प्रगति अकेले पुरुष ने की है ? नारी ने इसमें कोई योगदान नहीं दिया ? यदि ऐसा होता तो फिर प्रगति की चाल कुछए की समान रही होती और आज की तरह ही हम सब कदम से कदम मिलाकर चलने में असमर्थ होते । प्राचीन काल में नारियों ने पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग किया और ज्ञान–विज्ञान के क्षेत्र में विकास के साथ–साथ समाज, राजनीति, धर्म, कानून, संगठन आदि सर्वांगीण उन्नति में पुरुष की सच्ची सहचरी बनकर रही । उसे प्रेरणा देती रही, बल प्रदान करती रही ।
क्यों ? इसलिए की उसकी प्रतिभा, क्षमता और योग्यता पुरुष की प्रतिभा क्षमता तथा योग्यता से मिलकर अनंत गुण प्रभावशाली हो जाती है । वेदानुशासन में जब चला जाता था, तब महिलाओं ने ऐसे–ऐसे कार्य करके दिखाएं हैं कि उनकी भूमिका को हटा दें तो इतिहास का स्वरूप ही बदल जाता है । और छूँछ मात्र रह जाता है । रमायण से सीता के चरित्र को निकाल दिया जाय तो रामायण में बांकी कुछ नहीं रहता । द्रौपदी, कुंती, गांधारी आदि का चरित्र निकाल देने पर महाभारत की महता ही क्या रह जायेगी ? पांडवों का सारा जीवन संग्राम ही अधूरा रह जायेगा । इसी प्रकार भागवत में से देवकी, यशोदा और गोपियों का चरित्र हटा दिया जाय तो श्रीकृष्ण एक साधारण पुरुष बनकर रह जाऐंगे । शिवजी के साथ पार्वती राम के साथ सीता और विष्णु के साथ लक्ष्मी को हटा दिया जाय तो इनके चरित्र आधे–अधूरे रह जायेंगे ।
यों कहने को नारी को अबला कहा जाता है, पर आसुरी उत्पातों के कारण देवतागण जब घबरा उठे तो असुरो का संहार करने में मातृशक्ति दुर्गा ही समर्थ हुई थी । इसी प्रकार पृथ्वी पर भगवान के अवतरण हेतु मनु सपत्नि सत्रूपा के साथ तपस्या करके ही सफल हुए थे ।
संतति निर्माण में माता की भूमिका पिता से हजार गुणा अधिक है । देवि अशिज ने अपने पुत्र कांक्षिवान को अपने ही संरक्षण में रखकर शिक्षा दी । लव–कुश का पालन–पोषण सीता ने ही किया । और इतने योग्य बनाया कि अजेय हनुमान और लक्ष्मण को भी पराजित कर छोड़ा ।
उदाहरणों का अंत नहीं है । इन सब का सारांश यह है कि नारी को किसी भी श्रेष्ठ दिशा में आगे बढ़ने से रोकना अपनी व्यक्तिगत हानि तो है ही, पर समय और आज की मांग को दृष्टिगत रखकर सोचा जाय तो सामाजिक अपराध भी कहा जायेगा । आज हमारी दुर्दशा के लिए कुछ शताब्दियों की कहानी ही जिम्मेदार नहीं है, नारी पर अब भी परंपरागत ढंग से लगे हुए प्रतिबन्ध जिम्मेदार हैं । हम सभी स्वतन्त्र है, सभी को आगे बढ़ने का हक है । आशय यह नहीं है कि स्थिति ज्यो की त्यों है, फिर भी विकास जिस गति से होना चाहिए, नहीं हो रहा है ।
रुढि़यो, अंधविश्वासों, भ्रांतियों और कुरीतियों का पोषण करते बहुत समय हो गया । इस क्रम को अब कम करना चाहिए । और चाहरदीवारी में जो गृहलक्ष्मी को बंद करके रखे हैं, उसे आजाद करना चाहिए । क्योंकि वह भी आज के जमाने में स्वतन्त्र है और उसे भी दुनिया देखने का हक है ।
सभी चाहते हैं कि अतीत का गौरव वापस लौटे । नारी अभी भी उसी अतीत की नारी है, अभी भी उसे अगर मौका दिया जाय तो वह पहले की तरह अपना कर्तव्य निभाने में कदापि पीछे नहीं हटेगी । नारी की स्थिति तब तक सुव्यवस्थित नहीं हो सकेगी, जब तक पुरुष नहीं चाहेंगें । हमारे देश की प्रगति के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है, उसमें भी नारी शिक्षा अत्यन्त महत्वपूर्ण है । नारी शिक्षा पर अनिवार्य रूप से सभी का ध्यान होना चाहिए । नारी शिक्षित होने से राष्ट्र विकासोन्मुख होगा ।

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