मधेशी शासकों का लठैत ही बनते आ रहे हैं : ई. श्याम सुन्दर मण्डल
ई. श्याम सुन्दर मण्डल, भारदह, 7 अप्रिल |
संघीयता और विकेन्द्रीकरण दो भिन्न राजनैतिक व्यवस्था है । इस विषयवस्तु पर चर्चा करने से पहले समाज व्यवस्थापन के यह दो शब्दें– संघीयता और विकेन्द्रीकरण को समझ लेना जरूरी है ।
संघीयता ः
संघीयता एक ही स्टेट में रहे अनेक राष्ट्रों का एकीकृत अभिव्यक्ति है । बहुजातीय, बहुभाषिक, बहुसांस्कृतिक, बहुराष्ट्रीय एवं भौगोलिक विविधता को एक मजबूत गठजोड़ बनाने की राजनैतिक व्यवस्था के रूप में भी यह माना जाता है । इस व्यवस्था में दो प्रकार की सरकारे होती हैं– १. केंद्र सरकार, २. राज्य सरकार ।
केंद्र सरकार समग्र राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करती है, वहीं पर राज्य सरकारें स्थानीय स्तर की समस्याओं का हल करती है ।
संघीय विधायिका पूरे देश की प्रतिनिधित्व करती है वहीं प्रादेशिक विधायिका सदन अलग–अलग राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है । संघीयता में दो प्रकार की सरकारे होती हैं । यद्यपि दोनों स्तरों की सरकार एक ही जनता पर शासन करती है । दोनों सरकार अपनी– अपनी स्तर पर अलग शक्तियों का प्रयोग करती है । प्रत्येक स्तर में प्रयोग होनेवाली शक्तियाँ संविधान में स्पष्ट रुप में लिखी रहती है और इस पर आपसी दखल निषेध रहती है ।
संविधान में कोई भी परिवर्तन के लिए दोनों स्तरों की इच्छा और २/३ बहुमत की आवश्यकता होती है । जन–प्रतिनिधित्व के लिए जनसंख्या प्रधान मानी जाती है । प्रदेश निर्धारण का मुख्य आधार भाषा, संस्कृति, ऐतिहासिक पहचान, भौगोलिक समानता एवं बसोबास में समानता, मनोवैज्ञानिक एकता एवं श्रोत–साधनों की उपलब्धता होती है । विबाद समाधान में न्यायालयों का योगदान महत्वपूर्ण रहता है । केन्द्र का बार बार हस्तक्षेप एवं केन्द्र द्वारा प्रादेशिक जनता पर हुए विभेद, शोषण, दमन, उत्पीड़न के कारण प्रादेशिक जनमत के आधार पर संघ से अलग होने का अधिकार भी सुरक्षित किया जाता है, ताकि केन्द्र और शासक में कोई भी प्रकार की विभेदी मानसिकता पैदा न हों । अतः संघीयता न केवल देश की एकता को बढ़ाने में मदद करता है, बल्कि अखण्डता को बचाता है और क्षेत्रीय अलगाव को भी शान्तिपूर्ण विधि से व्यवस्थित करता है ।
विकेन्द्रीकरण
विकेन्द्रीकरण का अर्थ केन्द्रीय राज्यसत्ता के प्रशासनिक कार्य एवं शक्ति को स्थानीय हिस्सों में अवतरित कराना है । केन्द्रीय सरकार की शक्ति स्थानीय स्तर पर बनी सरकार या निकायों में हस्तान्तरित करना ही विकेन्द्रीकरण है । शहरी जनसंख्या एवं औद्यौगीकीकरण को पुनर्संरचना के जरिये ग्रामीण इलाकों में विस्तारित होने के लिए प्रेरित करने और जनता की ध्यान को केन्द्रीय शासन से खिंचकर स्थानीय शासन पर केन्द्रित करने का विधि भी विकेन्द्रीकरण है ।
स्पष्ट शब्दों में कहें तो विकेन्द्रीकरण का आशय किसी भी सत्ता या अधिकार को केंद्र से हटाकर दूर दराज में ले जाना अर्थात् राजनीतिक क्षेत्र में रही शक्ति या सत्ता को केवल केंद्र या किसी एक व्यक्ति में निहित न रखकर अनेक संस्थाओं या व्यक्तियों में थोड़े–थोड़े अंशों में बटवारा करना ही है ।
विश्लेषण
नेपाल में सत्ता परिवर्तन और अधिकार प्राप्ति के लिए आन्दोलन हुआ और होता आ रहा है । राणा शासन हटाने के लिए हों या प्रजातन्त्र लाने के लिए हों यहाँ सबने आन्दोलन किया । निरंकुश पञ्चायत हटाने के लिए हों या फिर राजतन्त्र हटाने के लिए हों कुरबानी हर जाति, वर्ग, सम्प्रदाय के लोगों नें दी हैं । बड़े–बड़े आन्दोलन हुए, हर आन्दोलन में हिस्सा भी लिया है, परिवर्तन भी हुआ परंतु उस आन्दोलन या परिवर्तन से मधेशियों को आज तक कुछ नहीं मिला है ।
मधेशियों नें जितनी बलिदानी दी है, धन, दौलत लगानी की है, उससे अधिक खोया है । शासक वर्ग पर हमने विश्वास करता रहा परंतु शासक सदैव मधेशियों के साथ विश्वासघात करता रहा है । हम अपना श्रम, खून, पसिना लगाते रहे हैं, शासक हमारे जल, जंगल, जमीन छीन कर हमें कमैया, दास, भूमिहीन और कंगाल बना कर धोखा देते आ रहे हैं । हमें आज तक कुछ भी नहीं मिला, जो भी मिला, नेपालियों नें ही पाया है उस का उपभोग किया है ।
सबकी एकजूटता से ००७ में राणातन्त्र हटे, शाह वंश को राज्यसत्ता प्राप्त हुआ । ०४६ में परिवर्तन हुए, शाही राजतन्त्र में अन्य खस वंशी को शेयर प्राप्त हुआ । ०६२÷०६३ में भी आम जन सहभागिता में आन्दोलन हुये, शाह वंशीय राजतन्त्र का पतन हुआ और नेपाली राजसत्ता एवं शक्तियों पर खस बंशियों नें पूर्ण कब्जा जमाया । नेपाली साम्राज्य के हर आन्दोलन में मधेशी, जनजाति, आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं सीमान्तकृत समुदायों ने सहभागिता तो जताई परंतु मिला कुछ भी नहीं ।
वैसे नेपाली साम्राज्य में आजतक जितने भी आन्दोलन हुये हैं सारे के सारे अधिकार प्राप्ति से अधिक सत्ता परिवर्तन के लिए ही हुआ है । हर आन्दोलन से शासक वर्ग के ही अलग अलग व्यक्ति या परिवार में सत्ता हस्तान्तरण हुई है । कभी शाह परिवार से राणा परिवार, तो कभी राणा परिवार से फिर शाह परिवार में राज्यसत्ता पहुँची है । कभी शाहीतन्त्र में चतूर खस परिवार को सेयर मिला, तो कभी पूरे राजशाही खत्म होकर आम खस में सत्ता एवं शक्तियों का हस्तान्तरण हुआ है । बाकी की सभी गैर–शासक वर्ग सत्ता परिवर्तन एवं हस्तान्तरण के उस आन्दोलन का सहयोगी ही रहे हैं ।
०५२ साल में जनयुद्ध के नामपर आरंभ हुए आन्दोलन एक प्रकार से अधिकार प्राप्त करने का आन्दोलन था । मधेशी मोर्चा के नामपर जो मधेशियों की आवाज बुलन्द हो रही है, उसे दबाने के लिए भी षड़यन्त्र का मञ्चन हो रहा है । इसके लिए संघीयता के मर्म विपरीत शासक वर्गों नें स्थानीय चुनाव को आगे बढ़ाया है । नेपाली दल में रहे मधेशियों की आवाज तो वैसी ही बुबन्द है, सड़क से जो आवाज आ रही थी उसे भी बन्द करने के लिए अचूक हथियार के रूप में ही इस निर्वाचन को आगे लाया गया है । प्रदेश सभा गठन पश्चात् पहली बार निर्वाचन हो रहा है और उसे भी सरकार करा रही है जिसपर हर नेपाली दल एवं नेता पूर्ण सहमत हैं ।
हाँ, संविधान निर्माण के क्रम में अनेक विवाद का नाटक दिखाकर संविधान को सभी शासकों नें एकजूटता से पारित करवा लिया था । ठीक उसी स्टाईल में मोर्चा द्वारा मांग की गई संशोधन पर शासक वर्ग द्वारा अभी नाटक मंचन किया जा रहा है । मोर्चा को खस–जाल में फँसाने के लिए महाप्रपंच हो रहा है ।
संविधान संशोधन पर एमाले की शख्त इनकारी सीमांकन को तत्काल कायम रखने की वार्गेनिंग है । सरकार द्वारा संसद में पेश किया गया सीमांकन हेरफेर सहित का संशोधन विधेयक मोर्चा को संसद में ही रखे रहने का चालबाजी है । तत्काल संशोधन कर चुनाव कराने की काँग्रेसी वकालत मोर्चा को चुनाव में सहभागी करवाने का ट्याक्टिकल षड़यन्त्र है । यह भी तय है कि संशोधन तो जरूर होगा परंतु अन्तरिम संविधान में रहे प्रावधानों से अधिक नहीं । नेपाली संविधान में एक तरफ संशोधन होगा, दूसरी तरफ नयी समस्याएं आगे निकल आएंगी (बबूल का पेड़, एक तरफ का टहनी काटो दूसरी तरफ निकल जाता है) और मोर्चा सदैव टहनी काटने के ही जाल में फंसे रहेंगे, शासक वर्ग फँसाते रहेंगे । जैसे जनसंख्या के आधार पर केन्द्रीय संसद में प्रतिनिधित्व मांग ही रहे थे, स्थानीय निकाय में मधेश को केवल २३५ सीटें देकर फिर से नयी समस्या खड़ी कर दी गई । मोर्चा को आन्दोलन करने का नयाँ एजेन्डा प्राप्त हो गया ।
“जनसंख्या के आधार पर स्थानीय निकायों में सीट दो !“
संघीयता की भावना विपरीत स्थानीय निर्वाचन कराने का उद्देश्य शासक वर्ग का है । आज सड़क पर रहे आन्दोलनकारी युवाओं को गांव–नगर के प्रमुख, उप–प्रमुख एवं सदस्य बनाकर उलझाने का शासकीय दाव हो सकता है । पदों में उलझा कर आन्दोलन करने की नैतिक धरातल को कमजोर बनाने की साजिश भी हो सकता है । स्थानीय निकायों का चुनाव पहले कराने में लोकतान्त्रिक, गणतान्त्रिक, माक्र्सवादी, माओवादी, राजावादी सभी शासकीय शक्ति एकमत है । किसी तरह मधेशियों को चुनाव में सहभागी कराकर आन्दोलनकारी कार्यकर्ताओं को सही जगह पर लाना चाहती है, ताकि शासक के लिए आगे की राह सहज बन सके ।
इस साजिश को अञ्जाम देने का महत्वपूर्ण अस्त्र स्थानीय निर्वाचन को पहले कराना ही है । शासकीय इस प्रपंच का सामना मधेशी मोर्चा तथा अन्य मधेशी शक्ति कैसे करती है, आगे के दिनों में जरूर देखने को मिलेगा । तत्काल के लिए धैर्य कीजिए ।



