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निकाय चुनाव और ईबीएम की प्रासंगिकता : सीमा विश्वकर्मा

 

काठमांडू, २८ अप्रैल |

नेपाल में चुनावों का प्रबंधन बेहद चुनौती भरा कार्य है । नेपाल भौगोलिक दृष्टि से विविधता लिए हुए है । यह देश कई धर्मों एवं कई संस्कृतियों को मानने वाले, कई भाषाएं बोलने वाले तथा विभिन्न जातियों के लोगों का समाज है । अतः चुनाव के दौरान समाज के हर एक वर्ग और हर एक व्यक्ति विशेष का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि कहीं वह मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाए । चुनाव के दौरान ऐसी व्यवस्था भी की जानी चाहिए कि समाज के उपेक्षित वर्गों के लोगों, विकलांगों, अल्पसंख्यकों (धर्म, संस्कृति और भाषाई आधार पर) को मतदान केन्द्र तक जाने में असुरक्षा का बोध न हो और वे बिना किसी दवाब के अपने मत का उपयोग कर सके । यह चुनाव आयोग का ही दायित्व है कि वह मतदाताओं और उम्मीदवारों दोनों के लिए मुक्त, निष्पक्ष, पारदर्शी और शान्तिपूर्वक चुनाव कराने की व्यवस्था करें । चुनाव के दौरान बखेड़ों के रूप में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का निपटान बेहद आवश्यक है । Seema Bishwakarma
साल २०६४ में हुई प्रथम संविधान सभा चुनाव के दौरान मैं राष्ट्रीय निर्वाचन पर्यवेक्षक समिति (नियोक) में प्रोग्राम ऑफिसर के रूप में सेवारत थी, तो कई प्रशिक्षणों एवं चुनाव सम्बन्धित कार्यक्रमों में सहभागी होने का मौका मिला था । इस अनुभव के आधार पर मैं बल देकर कहना चाहूंगी कि वर्तमान चुनाव प्रणाली में तत्काल सुधार की जरूरत है । बाहुबल, धनबल जैसे शब्द उस विरल संकट पर एक मुखौटा पहनाने का प्रयास करते हैं, जिसने हमारे लोकतन्त्र को खोखला कर दिया है । राजनीति का अपराधीकरण इस कदर बढ़ चुका है कि अनेक निर्वाचन जनप्रतिनिधि स्वयं असामाजिक प्रवृत्ति के आपराधिक छवि वाले हैं । उनके होते यह कल्पना नहीं की जा सकती कि चुनावी प्रदूषण को समाप्त करने वाला कोई प्रस्ताव पारित हो सकता है । यदि चुनाव प्रक्रिया में सुधार किए जाते हैं, तो अपने इस कर्तव्य का पालन किसी भी नागरिक को जानलेवा संकेत मोल देने जैसा नहीं लगेगा । आज हालात ऐसे हैं कि मतदान के मौसम में तो आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद से मतदान पूरा होने तक चुनाव आयोग सौद्धान्तिक रूप से जान और माल की सुरक्षा का भरोसा दिला सकता है । पर क्या नतीजे आने के बाद केन्द्रीय सुरक्षा बल किसी निरीह नागरिक को सुरक्षा कवच प्रदान कर सकते हैं ? यह ज्वलंत प्रश्न हमारे सामने मौजूद है ।
दूसरा सवाल है चुनाव को निष्पक्ष एवं पारदर्शी बनाना, तो चुनाव अयोग द्वारा बार–बार घोषणा की जाती है कि चुनाव निष्पक्ष, शांतिपूर्ण एवं पारदर्शी बनाया जाएगा, चुनाव संहिता को उलंघन करने वालों को सजा दी जाएगी । जबकि वैसा नहीं हो पाया है । प्रथम संविधान सभा चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) लागू करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा अन्तरक्रिया, संवाद, परिसम्वाद और सेमिनार जैसे कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया । लेकिन राजनीतिक दल ईवीएम के प्रयोग पर पूर्णरूपेण सहमत नहीं हुए । फिर भी प्रथम संविधान सभा चुनाव में पहली बार काठमांडू के चुनाव क्षेत्र १ में ईवीएम का प्रयोग किया गया । इससे यह देखा गया कि चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी कदम ईवीएम साबित हुई हैं ।
नेपाल में यह देखा गया है कि जब चुनाव की तारीख घोषणा की जाती है, तब चुनाव आयोग द्वारा वोटर एजुकेशन, चुनाव की निष्पक्षता और ईवीएम मशीन आदि सवालों को उठाया जाता है । कुछ हद तक वोटर एजुकेशन दी जाती है, लेकिन जब बात आती है चुनाव की निष्पक्षता व ईबीएम मशीन की, तो यहां की पार्टियां इन मुद्दों में मौन हो जाती हैं । इसके साथ–साथ इन मुद्दों को शक की दृष्टि से देखती हैं । एक आंचलिक कहावत है कि शक का कोई इलाज नहीं होता है । कुछ ऐसा ही मामला ईवीएम मशीन को लेकर है ।
ईवीएम की निष्पक्षता, प्रासंगिकता एवं विश्वसनीयता पर गम्भीर सवाल उठा दिए जाते हैं । लेकिन जो लोग ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करते हैं, उनको यह समझना चाहिए कि जब बैलेट पेपर से चुनाव हो रहे थे, तब देश में रामराज्य नहीं था, तब भी लोग बैलेट पेपर इस बात की गारंटी कहां देती है कि चुनावों में बेईमानी नहीं होगी ? मैं तो समझती हूँ कि शायद बैलेट पेपर वाले चुनाव में ज्यादा ही बेईमानी होती है । दूसरी बात यह है कि बैलेट पेपर वाले चुनावों के बाद हफ्तों तक मतगना होती थी, और दिन–रात लोग मत पेटियों की चौकीदारी करते थे । उस मतगणना में भी खूब धांधली होती थी । बड़े–बड़े शामियाने लगते थे । पुलिस की भारी व्यवस्था होती थी और तब समय व पैसा खूब बरामद होता था । इसलिए यह कहना कि बैलेट पेपर से चुनाव कराने में बेईमानी नहीं होगी मैं समझती हूं कि यह सरासर नासमझी है ।
प्रथम संविधान सभा चुनाव के दौरान ईवीएम मशीन से छोड़छाड़ होने की भी बात उठी थी । इस बात को लेकर चुनाव आयोग द्वारा कई अन्तरक्रिया व संवाद जैसे कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया । ईवीएम सम्बन्धी जानकारी के अनुसार मैं कहना चाहूंगी कि ईवीएम में छोड़छाड़ करना बहुत ही मुश्किल है या यूं कह लें कि कोई भी व्यक्ति इसमें छेड़छाड़ नहीं कर सकता है, क्योंकि इसमें बहुत सारे सिक्योरिटी मेथड़ काम करते हैं । ईवीएम में एक माइक्रो कंट्रोलर चिप होता है, जिसे एक बार प्रोग्राम करने के बाद बदला नहीं जा सकता । वहीं ईवीएम का सॉफ्टवेयर कोड़ भी किसी के द्वारा नहीं पढ़ा जा सकता है और न तो दोबारा उसे लिखा ही जा सकता है । दरअसल, ईवीएम एक ‘स्टैंड अलोन’ मशीन है, जो किसी रिमोट या नेटवर्क से एक्सेसबुल नहीं है और इंटरनेट के साथ भी इसका कोई लिंक नहीं है, इसलिए इसके हैक होने और इसमें वाइरस की भी कोई सम्भावना नहीं है ।
चुनाव में देश की जनता द्वारा बढ़–चढ़कर निष्पक्ष पारदर्शी व शांतिपूर्ण रूप में मतदान करना ही लोकतन्त्र की सफलता की कुंजी है । इसलिए नेपाल के चुनावी प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली तथा चुनाव की निष्पक्षता व विश्वसनीयता हेतु ईवीएम मंशीन का प्रयोग अति आवश्यक है । आज के युग की मांग भी है ।

ईवीएम की खासियतें
 यह छेड़छाड़ मुक्त तथा संचालन में सरल है ।
 नियन्त्रण इकाई के कामों को नियंत्रित करने वाले प्रोग्राम ‘एक बार’ प्रोग्राम बनाने योग्य आधार पर’ माइक्रोचिप में नष्ट कर दिया जाता है । नष्ट होने के बाद इसे पढ़ा नहीं जा सकता । इसकी कॉपी नहीं हो सकती या कोई बदलाव नहीं हो सकता ।
 ईवीएम मशीनें अवैध मतों की संभावना कम करती हैं, गणना प्रक्रिया तेज बनाती है तथा मुद्रण लागत घटाती हैं ।
 ईवीएम मशीन का इस्तेमाल बिना बिजली के भी किया जा सकता है, क्योंकि मशीन बैट्री से चलती है ।
 उम्मीदवारों की संख्या यदि ६४ से अधिक नहीं होती, तो ईबीएम के इस्तेमाल से चुनाव कराये जा सकते हैं ।
 एक ईवीएम अधिकतम ३,८४० वोट दर्ज कर सकती है ।

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