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एकीकरण एक सही कदम, मधेशी को वर्षों से अपेक्षा थी : श्वेता दीप्ति

 
जहाँ एक ओर मधेश की जनता में खुशी है वहीं यह सोच भी शामिल है कि कहीं यह एकीकरण मृगतृष्णा ना हो । परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में मधेश की जनता को इस शक और अविश्वास से बाहर  निकल कर अब अपनी एकता का परिचय देना होगा ।
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श्वेता दीप्ति, काठमांडू, २१ अप्रैल | मधेश की चिंतित जनता के हाथों में मोर्चा एकीकरण के पश्चात राष्ट्रीय जनता पार्टी ने विपरीत हवा में भी उम्मीदों का चिराग थमा दिया है । उनकी सोच को एक मजबूत आधार दिया है । जिसका उत्साह कल से मधेश में दिखाई पड़ रहा है ।  हालाँकि जो अब हुआ वह बहुत पहले हो जाना चाहिए था । मंजिल एक थी पर सबने अलग–अलग राह पकड़ी हुई थी, जिसकी वजह से मधेश की आकांक्षाओं की मंजिल पर से उनकी पकड़ छटती जा रही थी । कल जब समारोह शुरु हुआ तो कुछ कमियाँ नजर आ रही थी | एक प्रश्न सभी के जुवान पर था कि नेपाल सद्भावना पार्टी और तमरा इस एकीकरण में क्यों शामिल नहीं हो पाई ? उन्हें भी इस छाते के नीचे लाना चाहिए था, या उन्हें आना चाहिए था । लेकिन अंतिम वक्ता श्री महंत ठाकुर जब बोल ही रहे थे तब श्री अनिल झा अपनी पूरी टीम के साथ हाल में प्रवेश कर के माहौल को उत्साहित कर दिया| अब उम्मीद है कि सही वक्त होते तमरा भी साथ हो लेंगे ।
खैर, मधेश की राजनीति में यह एकीकरण एक सही कदम है और जब कदम सही होते हैं तो राह में अन्य राही भी साथ हो लेते हैं । बशर्ते आपका नेतृत्व सही हो और आपकी सोच स्वार्थ से ऊपर उठकर हो । विगत में जो गलती हुई उसका आक्षेप मधेशी जनता ही नहीं देती आई, बल्कि पहाड़ी समुदाय की जनता और नेता दोनों ने ही इसका मखौल उड़ाया और इसी आधार पर यह सोच बनाए रखा कि मधेशी नेताओं के साथ मधेश की जनता ही नहीं है । पर वो भूल रहे हैं कि मधेश की जनता में एक मनःस्थिति यह भी पनप चुकी थी कि, अगर ठगना ही है तो अब अपनों के हाथों से ही ठगे जाएँगे क्योंकि दूसरे भी आज तक भरोसे के नाम पर छलते और ठगते ही आए हैं । अभी की परिस्थिति में अब अगर राजपा चुनाव में हिस्सा लेती भी है तो उनकी कोशिश यह होनी चाहिए कि हर हालत में उनकी स्थिति मजबुत हो और इसके लिए उन्हें तत्काल ही सर्वमान्य चुनाव नीति बनानी होगी और मधेश की जनता के पास जाना होगा । वर्चस्व और अहं की भावना से उठकर समर्पित भाव से मधेश की मिट्टी से जुड़ना होगा और उनके अन्दर अब भी जो थोड़ी शंका या अविश्वास की जड़ है उसे निर्मूल करना होगा । क्योंकि जहाँ एक ओर मधेश की जनता में खुशी है वहीं यह सोच भी शामिल है कि कहीं यह एकीकरण मृगतृष्णा ना हो । परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में मधेश की जनता को इस शक और अविश्वास से बाहर  निकल कर अब अपनी एकता का परिचय देना होगा । चंद सिक्कों और शराब की बोतल की लालच में न आकर अपना फैसला मधेश के हक में देना होगा क्योंकि  राजपा की मजबूत स्थिति ही मधेश को देश की राजनीति में भी मजबूत करेगी और तभी मधेश की माँग को उचित सम्बोधन भी मिल पाएगा । वरना यह कहने वाले कि मधेश को सब मिल चुका है, अब और क्या चाहिए अपना राग अलापते रहेंगे और विभेद की राजनीति प्रश्रय पाती ही रहेगी ।
मोर्चा की एकता ने, देश के तीन महत्तवपूर्ण पार्टियों को और उनके कारिन्दों को यह सोचने के लिए जरुर विवश कर दिया है कि अब उनके चुनाव की नीति क्या होगी ? क्योंकि उन्हें मधेश में मोर्चा का कोई अस्तित्व नजर नहीं आ रहा था, उसकी कोई जमीन नजर नहीं आ रही थी । मोर्चा के नेताओं ने जिस दूरदर्शिता से काम लिया है मधेश की जनता उसकी अपेक्षा वर्षों से कर रही थी । बार बार उनके दिमाग में यह सवाल था कि अगर सरकार उनपर जबरदस्ती चुनाव थोपती है तो वो क्या करेगी ? बहिष्कार करने पर भी वो लाचार हो जाती क्योंकि मधेश में वो भी हैं जो दूसरे पक्ष का साथ देती और तब मतदान का प्रतिशत चाहे जो भी होता चुनाव का परिणाम तो मान्य हो ही जाता ।
मोर्चा ने जो सहमति की है उसका असर तीन प्रमुख पार्टियों पर पड़ना तय है । अगर अब भी वो मधेश मुद्दों को सम्बोधन किए बगैर चुनाव में जाती है और चुनाव आयोग भयरहित तथा निष्पक्ष चुनाव कराने में सफल होती है तो इसका खामियाजा इन मुख्य पार्टियों को भुगतना पड़ सकता है । वैसे अभी यह सामने नहीं आया है कि चुनाव को लेकर राजपा की नीति क्या होगी ? सम्भवतः एकाध दिनों में कोई निर्णय सामने आ जाय । परन्तु अब बारी सत्ता की है कि वो क्या करती है क्योंकि मोर्चा का एकीकरण चुनाव में इनका समीकरण बदलने की क्षमता तो जरुर रखता है ।

 नवगठित राष्ट्रीय जनता पार्टी को हिमालिनी की ओर से ढेरसारी शुभकामनाये

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