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नेपाल मे मधेसी को कर्मचारी बनना भी अभिशाप है : डि. के. सिँह

 

madheshi-karmchari

डि. के. सिँह, बारा, ४ मई  । सभी का एक चाहना होता है सरकारी नौकरी पाने की पर क्या करे मधेसी विचारे, जी जान लगाकर ताबडतोर मेहनत कर सरकारी नौकरी मिलते ही भेजे गए जगह पर काम करने जाते है । फिर उनको वहाँ पर दिखता है दमन,शोषण, की प्रकाष्ठा जो हिन भावना का बोध कराती है । जिस आरक्षण कोटा का नाम नेपाल सरकार जपती है वह आरक्षण के नाम पे सारे (खस) पहाडी समुदाय को फायदा दी जाती है | वे लोग मधेस मे बसोवास करते है और मधेसियो के तरह सिडियो कार्यालय से मधेसी प्रमाण पत्र प्रमाणित करा के उसी मधेसी कोटा वाले लोकसेवा या कोई दुसरे संस्थान, बैंकीङ मे फारम भरते है, और परिक्षा देकर मधेसी समुदाय वाले कोटा पर हावी होते है । इनके सम्बन्धी कार्यालय प्रमुख लगायत के पद पर कार्यरत होने के कारण खस लोग का काम तुरुन्त हो जाता है ।

इन खस समुदायका बहुत ही बडा फेक्ट्र्र इफेक्ट करता वह है “” यो मेरो मामा को छोरा को भतिजो “”अगैरा-वगैरा सम्बन्ध बताते हुए जुड जाते है फिर उनके काम विना पैसे असानी से हो जाता है। लेकिन! उसी जगह पर मधेसी बहाली होने के लिए नाम निकालो फिर इन्टरव्यू मे सोर्स पैरवी लगाओ, घुस खिलाओ तब जाकर कुछ बात बनती है”” यह नेपाल है बिना खाए पिए कोई काम ही नही हो सकता, यहाँ पर मधेसियो का “आर्थिक शोषण” जो किया जाता है। अगर सही मायने मे देखा जाए तो “”आरक्षण मधेस की सबसे बडी समस्या है जिसमे गिने चुने मधेसी को ही नोकरी मिलती है पर उसी सिट पर खस वाहुलय को नोकरी दी जाती है । कानो कान हमारे मधेसी बन्धु को पता तक नही चलने दिया जाता है””। इतने से ही मधेसी का समस्या समाधान तक नही पहुँचता उसके वाद भी ईश से वडी समस्या आती है , अगर कोई कार्यालय मे प्रमुख बन कर आ गए तो फिर इनकी तो लग गई । यहाँ एक ऐसी रणनीति नेपाल सरकार बनाती है उसी रणनीति के तहत जितना भी पहाडी कर्मचारी कार्यरत रहते है वो लोग किसी न किसी बहाने से ( भुमिगत सङगठन को बदनाम कर के, या कोई और बहाना बनाकर के) मधेस के जिल्ला छोडते हुए पहाड मे हेटौंडा जैसी जगह पर कार्यलय मे बैठ जाते है, भले ही वहाँ पर सिट क्यूँ न कम हो फिर भी जबर्जस्ती वहीं बैठकर हाजरी लगाते रहते है। तब तक यहाँ मधेस के कार्यलय मे कर्मचारी के अभाव मे विचारा मधेसी कर्मचारी जनता को सन्तुष्ट करने के लिए जी-जान लगाकर देर रात तक काम करते रहते है। ऐसे ही नोकरी मे चाकरी बजाते 2-3 महिना बित जाते हैं उपर से काम का दबाव रहता है ।

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कर्मचारीयो के उपर सिकायत आता ही रहता है, स्वभाविक बात है जहाँ 18-20 कर्मचारी काम करते हो उस जगह पर घटकर 7-8 कर्मचारी हो जाए तो यह बात होना निश्चित है। फिर उसके वाद वरिष्ठ कर्मचारी लोगों का बैठक बैठती है उसमे मधेसी कर्मचारी को फटकार लगाते हुए बोला जाता है “अरे तुमको तो मैनेजर बनाकर भेजे थे लेकिन तुमसे कुछ नही हुआ, तुम उस पोष्ट के लायक हीनही हो। ईश तरह के गल्ती ठहराते हुए जुनियर बना दिया जाता है या फिर तबदला कर दिया जाता है (श्रोत -बैंक )। इसके अलावे पुलिस मे देखा जाए तो:- खस प्रशासन ने मधेसी पुलिस लगाकर घुस, दमन-शोषण , अनैतिक कार्य करवाने हेतु बिवश किया जाता है। इसके पिछे खसवादी लगायत नेपाल सरकार के बहुत बडी षड्यन्त्र होती है:- १. मधेसी कर्मचारी,पुलिस और मधेसी जनता के विच घृणा पैदा करना। २.ऐक दुसरे क प्रति मारकाट की स्थिति सृजना करवाना ३. मधेसियो मे फुट डालो और राज करो वाली नीति अपनाई जाती है। मै तो आप सबो से बस इतना ही कहना चहुंगा कि कोई भी मधेसी पुलिस या कर्मचारी के प्रति घिर्ना पैदा न करते हुए उनलोग को उचित मार्ग् दर्शन दे ताकि ऐ वात वो लोग भी समझ सके । समय के साथ साथ 200 बर्ष की गुलामी से मुक्त होना वो सब चाहते है। समय का इन्तजर करे , लेकिन हार न माने …

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dk singh
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