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अधिकार प्राप्ति के लिए मधेशियों को नेपाली अंक-गणित जानना होगा : श्याम सुन्दर मण्डल

 

श्याम सुन्दर मण्डल, सप्तरी 25 May 2017 । ‘मुल्क’ हम उसी को कह सकते हैं जहाँ हर मुल्कबासी समान हों | मुल्क की हर भुगोल में नागरिकों का सम्मान हों | देश की भाषा, वेश, संस्कृति, राष्ट्रियता एवं पहचान पर हर एक मुल्कवासियों में गौरव प्राप्त हों | नश्ल, रंग एवं शरीर के आधार पर शोषण, उत्पीड़न और विभेद नहीं हों | परंतु, क्या नेपाली मुल्क में मधेशियों के लिए यह सारे तत्व प्राप्त हैं ? नेपालियों का मुल्क तीन भुगोल में विभक्त होने की बात नेपाली शिक्षा हर मुल्कबासियों को जानकारी देती है : हिमील, पहाड़ और तराई | नेपाली लोग हमें उल्लू बनाकर हमपर हुकुमत चलाने यह नारा भी लगाते आ रहे हैं, “हिमाल पहाड़ तराई, यहाँ कोई छैन पराई !” लेकिन क्या यह नारा किसी मधेशियों को न्याय दे रही है ? मधेशी और नेपालियों के बीच भावनात्मक एकजूटता प्रदान कर रही है ? हमारे मानसपटल कह रही है, बिलकुल ही नहीं |

हम मधेशी नेपालियों द्वारा चरम विभेद के शिकार हो रहे हैं | हमारे पास नेपाली नागरिकता तो हैं, किन्तु हमारी नागरिकता का सम्मान ईस मुल्क के ८५% भुगोल में कहीं नहीं है | अर्थात पहाड़ (६८%) और हीमाल (१७%) की भुगोल में सारे मधेशी विदेशी माने जाते हैं | बिहारी, भेले और धोती का शाब्दिक उपहार हमें दिए जाते हैं | उतना ही नहीं, आज के दिन तो हमारी ऐतिहासिक भुमि मधेश (जो पुरे नेपाल के केवल १५% हैं) पर भी कब्जा जमाकर हमें यहाँ बोल्ने तक नहीं दिया जाता है | मकान, दुकान, सड़क, चौराहा पर हमें हर वक्त अपमानित किया जाता है | पेट और बाल बच्चों के खातिर अपमान एवं जिल्लत सहकर ही सही नेपालियों द्वारा कब्जित अपने ही मधेश के भुमि (जैसे ईटहरी, भरतपुर, बुटवल, कोहलपुर, टीकापुर, अत्तरीया, महेन्द्रनगर धनगढ़ी आदि) पर मजदूरी करने, उनके जूते पालिस करने,नेपालियों के घरों में गुलाम बनने, उनके बाजार में चटपटी बेचने एवं नेपालियों की सेवा/गुलामी कर गुजारा करनेपर मजबूर बन चुके हैं | हमारी यह मजबुरी हमें दिन प्रतिदिन अपनी आत्मसम्मान बेचने पर मजबूर कर रहे हैं |

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खरिदकर्ता नेपाली तो पहले से थे ही, हमारे मधेशी (ईलाइट) भी हमें खरिद करने से नहीं चुक रहे हैं | मधेशियों के नाम पर भावुक राजनीति कर हमें नेपालियों के हाथों बेचते रहे हैं | सत्ता, कुरसी और पैसा प्राप्त करने के लिए शासकों के हाथ हमारी मजबुरियों का सौदा करते रहे हैं | अधिकार प्राप्त कराने के नामपर नेपाली गोली हमारी सर और छातियों पर दागते रहे हैं | मधेशी जनों में रहे गणित की कमजोरियों पर भ्रम, षड़यन्त्र और भय-त्रास देकर हमारी अस्तित्व को मिटाने पर तुले हुए हैं | हमारी मधेश की भुमि हरदिन, हर सप्ताह, हर महिना और हर वर्ष घटते जा रहा हैं | नेपाली लोग उत्तर से दक्षिण की ओर फैलते जा रहे हैं और हम सिमटते जा रहे हैं | हीमाल नेपालियों का है, पहाड़ नेपालियों का है और तराई भी उनका ही बन चुका है | हमारी तो केवल मधेश थी परंतु चन्द स्वार्थ, अदूर-दृृष्टि और गुलामी करने की आदत्त के कारण आज वह भी संकट में पड़ गया है | हमें उन संकटों से अब निकलना होगा | हमारे मतो को बेचकर गुलामी कायम रखने वालों को खदेड़ना होगा | अधिकार प्राप्त करने के लिए नेपाली अंक-गणित को जानना होगा |

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हमें अब यह समझना ही होगा कि हम पहाड़ और हिमाल के कभी हो ही नहीं सकते | पहाड़ और हिमाल से राजनैतिक शक्ति प्राप्त कर ही नहीं सकते | संसदीय गणित (१६५ सीट उदाहरण के तौरपर) में हम मधेशी आनेवाले ईतिहास के किसी कालखण्ड में भी बहुमत गणित प्राप्त नहीं कर सकते | अर्थात मधेशी एकजूट हो जानेपर भी अपने बलबूतों के अंकगणित आधार पर सरकार बनाकर नेपालियों को मंत्री परिषद में लानेकी क्षमता नहीं बना सकते | सदैब हमें ही उनके सरकार में जाना होगा और मंत्री, प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति जैसे पदों का भीख मांगते रहना पड़ेगा | जब हम बहूमत लाने में ही सक्षम नहीं तो संविधान एवं कानून बनाने और उसे बदलने की अंकगणित हमारे पास कहाँ ? और जब यह ही नहीं तो हम अपने बलबूतों पर अधिकार लिखने को सक्षम कहाँ ? हमें सदैव अधिकार की भीख ही माँगना पड़ेगा और यह बात सभी जानते हैं, भीख तो देनेवालों के वस में होती है लेनेवालों की इच्छा, आकांक्षा और हाथों में कदापी नहीं ? अतः गुलामी छोड़िए, नेपाली अंक-गणित को समझिए और अन्तिम विकल्प “आजाद़ी” के ओर चल पड़िए… जय मधेश !

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श्यामसुन्दर मंडल

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