यक्ष प्रश्न यह है कि अब भी सरकार मधेश की माँगों को लेकर कितनी गम्भीर है ?
श्वेता दीप्ति, काठमांडू, २९ जून | हमें तो अपनों ने ही लूटा गैरों में कहाँ दम था, राजपा को कुछ ऐसा ही झेलना पड़ा है । अपने ही कार्यकर्ताओं और कुछ नेताओं की वजह से राजपा की स्थिति आज कमजोर पड़ गई । मधेश की जनता मानसिक रूप से साथ होने पर भी सेना और गोली के त्रास में अपने नेता का साथ नहीं दे पाई, कुछ ने खुलकर अपने समुदाय का साथ दिया और कुछ अपने महत्वपूर्ण मत का महत्व नहीं समझ कर बिक गई । जिसकी सबसे बड़ी वजह होती है अशिक्षा, चेतना और गरीबी । वो समझ नहीं पाते कि लोकतंत्र में उनका एक मत कितना मायने रखता है । मौन अवधि में जी खोलकर माँस, चूड़ा और बोतल का खेल जारी रहा । ईद के बहाने आचार संहिता का खुलकर मजाक बना । देश का प्रधानमंत्री हर कामों से मुक्त होकर अपने क्षेत्र में एक सप्ताह गुजारता है । जाहिर सी बात है कि नियम कानुन ये कुछ लोगों के लिए है या फिर बस सुनने की चीज रह गई है । कानून विदों के अनुसार मधेश के चुनाव में सेना परिचालन का कोई औचित्य नहीं था । परन्तु बन्दुक की नोंक पर बैलेट की कहानी लिखी गई ।
खैर, सेना के बल पर ही सही किसी अप्रिय घटना के बगैर दूसरे चरण का चुनाव भी सम्पन्न हो गया । कहीं कहीं छिटपुट घटनाएँ अवश्य हुई पर वो तो चुनावी रंग हैं, जो बिखरते ही रहते हैं । अब मतपेटी खुलने का इंतजार है । जिसमें सामान्य जनता की नहीं, नेताओं की उम्मीदें बंद हैं । जनता के हाथ तो खाली ही रहने हैं । काठमान्डू के नवनिर्वाचित मेयर ने तो शुरुआत भी कर दी है । शहर विकास का नारा देने वाले पहले अपने स्तर का विकास करने में लगे हुए हैं । यही है शक्ति और शक्ति का सदुपयोग ।
चुनाव के दिन २ नम्बर प्रदेश बंद करने का निर्णय औचित्यहीन था । राजपा के नेताओं को कैम्पेन शुरुआती दौर से ही अन्य क्षेत्रों में जाकर करना चाहिए था जो वो कर नहीं पाए । कहीं ना कहीं सरकार मधेश के क्षेत्र को सीमित करने में सफल रही । मधेश का आन्दोलन २ नम्बर प्रदेश में सिमट कर रह गया है । सरकार चाहती तो सेना के बल पर २ नम्बर प्रदेश में भी चुनाव करा सकती थी किन्तु सरकार जानती थी कि २ नम्बर प्रदेश अतिसंवेदनशील है । जिसे सेना के बल पर रोका नहीं जा सकता और अगर खूनखराबे के बीच चुनाव सम्पन्न हुआ तो इसका दूरगामी परिणाम अच्छा नहीं होगा । विपक्ष के लिए यही हथियार बन जाएगा जो आगामी दिनों में घातक सिद्ध होता । फिलहाल यक्ष प्रश्न यह है कि अब भी सरकार कितनी गम्भीर है मधेश की माँगों को लेकर ? क्या आश्विन से पहले संविधान संशोधन की प्रक्रिया शुरु होगी या ये दो महीने भी निष्कर्षहीन निकलेंगे ? वैसे समाधान के पुख्ता आसार नजर नहीं आ रहे और न ही संम्भावना ही । सारी मुख्य माँगे तो ऐसे भी आयोग के जिम्मे चली गई है । जो बची थी उसे मानना इतना कठिन नहीं था फिर भी वो सम्भव नहीं हो पा रहा । निर्णय भी सर्वोच्च और कार्यान्वयन का इंतजार कर रही है । सीधी सी बात है कि इसे सम्भव बनाया नहीं जा रहा है । ऐसे में देउवा सरकार से किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की उम्मीद बेमायने ही होगी ।
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