बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी प्रदूषण के कारण ख़तरे में, बचाने के लिए गुहार : उदय मलिक
उदय मलिक, लुम्बनी | लुंबिनी के पास लगे कारखानों से होने वाले प्रदूषण से विश्व धरोहर का दर्जा पाए लुंबिनी को लगातार नुकसान पहुंच रहा है.
लुंबिनी डेवलपमेंट ट्रस्ट के एक वरिष्ठ अधिकारी सुरेंद्र मुनि शाक्य ने सरकार से अपील की है कि इन कारखानों को यहां से कहीं और हटाया जाए.
ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष सुरेंद्र मुनि शाक्य कहते हैं, “हाल के सालों में सीमेंट और स्टील की फ़ैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषक ने बुद्ध की जन्मभूमि को बहुत नुकसान पहुंचाया है.”
लुंबिनी से जुड़ने वाले नज़दीकी शहर भैरावा की मुख्य सड़कों पर लगे पेड़-पौधे सालों भर धूल से ढके देखे जा सकते हैं.
सुरेंद्र मुनि शाक्य कहते हैं, “लुंबिनी को प्रदूषण के ख़तरे से बचाने के लिए कारखानों को कहीं और स्थापित करना चाहिए. सरकार को ख़ुद इसमें पहलक़दमी करनी होगी.”
नतीजतन लुंबिनी के विश्व धरोहर स्थल से कुछ ही किलोमीटर पर एक दर्जन सिमेंट की फैक्ट्रियां और कई सारे ईंट भट्टे यहां खुल गए.
बाद में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दबाव की वजह से सरकार ने यहां से दस किलोमीटर के अंदर नए कारखाने लगाने पर पाबंदी लगा दी.
लेकिन फिर भी नुकसान तो हो चुका था.
शोधकर्ताओं के नतीजों से पता चलता है कि लुंबिनी का विश्व धरोहर क्षेत्र बढ़ते प्रदूषण के कारण ख़तरे में है. सर्दी के दिनों में यहां प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ जाता है.
इस साल की शुरुआत में वायु प्रदूषण पर नज़र रखन वाले स्टेशनों ने कहा था कि लुंबिनी में प्रूदषण का स्तर राजधानी काठमांडू से भी अधिक हो चुका था.
आईयूसीएन और यूनेस्को के एक अध्ययन में कहा गया है कि लुंबिनी के विश्व धरोहर स्थल पर प्रदूषण से ख़तरा मंडरा रहा है.
“लुंबिनी के संरक्षित क्षेत्र में कार्बन छोड़ने वाले उद्योगों के विस्तार से कई तरह की समस्याएँ पैदा हो चुकी है. मसलन यहां की जैव विविधता, स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य, पुरातात्विक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर बुरा असर पड़ा है.”
यहां के तीन स्मारकों को लेकर किए गए आईयूसीएन के एक अध्ययन में कहा गया है कि वे जहरीले गैस और ठोस कार्बनिक प्रदूषकों से प्रभावित हो चुके हैं.



