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१९५० की सन्धि न तो मधेश को प्रतिष्ठा दिला सकी नाही भारत को सुरक्षा : कैलाश महतो

 

कैलाश महतो, पराशी | बापू ! आप शायद जीवित होते तो मधेश का स्थान कहीं कुछ और ही होता कि…?

भारत और नेपाल के बीच बनाये गये १९५० की सन्धि ने न तो भारत को प्रतिष्ठित होने दिया और न ही नेपाल को स्वविवेकी । न मधेश को प्रतिष्ठा दिला सकी, न भारत को सुरक्षा ।

नेपाल और भारत के प्रबुद्ध कहे जाने बाले कुछ लोगों ने ८ अक्टूबर, २०१७ को काठमाण्डू में बैठकर उस सन्धि को बदलने की बात की है । जिन बूँदों को बदला जाना चाहिए, उनपर नेपाल की न तो सरकार, न किसी बुद्धिजीवी की हैसियत है बोलने की । जब उनकी हैसियत नहीं बनती है तो वे बडे चालाकी से भारत जैसे देश के बुद्धिजीवियों व सरकारों की बुद्धि भ्रष्ट करने की उपाय निकालते हैं और वे सफल भी हो रहे हैं ।

भारत सरकार और उसके बुद्धिजीवी समाज यह क्यों नहीं समझ पाते कि नेपाल की बुद्धि भारत को बर्बाद करने में लगी है । क्या भारत को यह नहीं समझना चाहिए कि मधेशियों से भारत का सम्बन्ध तोड़ने की नेपालियो ने बुद्धि लगा दी है ? भारत यह क्यों नहीं समझता कि कंगाल और गुलाम मधेश उसका सही मित्र नहीं हो सकता । सन् २००९ से बैंकिंग रूप से भारतीय रुपयों के बाजार को नेपाल ने कमजोर किया । भारत को यह समझ में कब आयेगा कि जो उपर से उसके रुपयों का बाजार बन्द करता है और नीचे से भारतीय रुपयों का विशाल कालाबजार चलाता है, उसका कारण क्या है ? नेपाल जानता है कि भारत से मधेश का सम्बन्ध टूटे बिना भारत को मात नहीं दिया जा सकता । भारत से रहे मधेश के सम्बन्धों को तोड़ने के लिए मधेशियों का भारत आने जाने पर अघोषित प्रतिबन्ध लगे जिसके लिए मधेशी द्वारा प्रयोग हो रहे भारतीय रुपयों का अभाव कर मधेश को तवाह करें ताकि नेपाल को उससे तीन तीन फायदे हों । पहला यह कि शादी, विवाह, तीर्थ, मेला, दवा आदि के लिए भारत जाने बाले मधेशियों से भारतीय रुपये भारी दामों में खरीदवाकर उसके आर्थिक अवस्था कमजोर बनायें । दूसरा, इससे परेशान होकर भारत से मधेश अपना सम्बन्ध कालान्तर में तोड़ने को बाध्य हो जायें । तीसरा, मधेश का सम्बन्ध टूटते ही मधेश पर नेपाल का स्थायी शासनपूर्ण सरकार स्थापित हो जाये और कंगाल मधेशियों को उक्साकर भारत के खिलाफ उसके विरोधी शतिmयों से तवाह करबाया जाय ।

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उसी का क्रम है यह कि भारत और नेपाल प्रवेश पर नियन्त्रण तथा आतंकवादी क्रियाकलापों को रोकने के नामपर मधेशियों का सम्बन्ध भारत से तोड़ा जाय परिचयपत्र के अनिवार्यता के नाम पर । भारत को अब यह निर्णय लेने में कतई देर नहीं करनी चाहिए कि उसका सुरक्षा कवच स्वतन्त्र समृद्ध मधेश हो सकता है या सीमाओं पर तैनात लाखों सुरक्षाकर्मी । भूखे पेट, नंगा बदन और तड़पते अस्तित्व के लिए आतंक भी एक धर्म ही होता है ।

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भारत को आज से तकरीबन २५ वर्ष पहले की भारत नेपाल सीमा सुरक्षा अवस्था का अध्ययन करना होगा । उस समय भारत और नेपाल शासित मधेश से सटे हुए सीमाओं पर कोई बन्दुकधारी सुरक्षाकर्मी नहीं होते थे । पर सुरक्षा की कोई गड़बड़ी नहीं होती थी । दोनों तरफ से लोग बिना कोई रोकटोक आनेजाने तथा अपने आवश्यकतानुसार की वस्तुएँ एक दूसरे से खरीदते थे । मेलमिलाप और सम्बन्ध प्रगाढ था । लेकिन अब मधेश ही नहीं, भारत भी असुरक्षित होने लगा हंै ।

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भारत अगर नेपाली बुद्धिजीवियों के अनुसार १९५० की सन्धि में परिवर्तन ही लाना चाहता है तो नेपाल के अनुसार ही उसके ग्रेटर नेपाल के लिए धारा ८ में परिवर्तन करें–जिससे नेपाल की राष्ट्रभक्ति को नापा जा सके । उसे परिवर्तन करने से या तो ग्रेटर नेपाल बनेगा और नेपाली शासकों का औकात ढहेगी या मधेश स्वतः के अस्तित्व का इतिहास सामने आएगा । मधेश भी चाहता है कि सन् १९५० की भारत नेपाल मैत्री तथा व्यापार सन्धि का धारा ८ पूणतः लागू हों ।

मधेशियों से भारत का सम्बन्ध तोड़ने की नेपालियो ने बुद्धि लगा दी है ? कैलाश महतो

१९५० की सन्धि ने न तो मधेश को प्रतिष्ठा दिला सकी न भारत को सुरक्षा : कैलाश महतो

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