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‘छोटा मधेश’और आगे की राजनीति : रणधीर चौधरी

 

अगर वाम गठबंधन की सरकार बन जाती है तो देखना है पुष्प कमल दहाल की हरकत । संविधान संसोधन के एजेण्डा को वे केन्द्रीकृत कर पाते हैं या फिर खडग प्रशाद ओली के ‘ओलिग्यार्की’ मे सिमट कर रह जाते हैं ।

मधेशवादी दल मन्त्री बनने के लिए बिखर कर ध्वस्त होते हैं या शहीदों के सपना को पूरा करने के लिए इमानदारी का आयाम कायम कर मधेश की राजनीति आगे बढ़ाते हैं?

देश अभी चुनावी चादर से बाहर आया है । प्रतिनिधि सभा और प्रदेश सभा के चुनाव समाप्ति पश्चात अभी चुनावी रुझान आना शुरु हो चुका है । ताजी अवस्था को देखा जाय तो देश में बाम गठबन्धन आगे उभर कर आएगा इस में शंका की जगह नहीं है । और नेपाल का संसोधनीय संबिधान लागु भी हो चुका, कहना गलत नही होगा ।
इन चुनावाें के दौरान हुए निरन्तर बम बिस्फोट एवं हिंसात्मक घटनाओ का कारण सरकार पता लगाए या न लगाए परंतु इस का कारण तलाशना आवश्यक है । देश चुनावमय हो चुके अवस्था मे नेत्रचन्द्र विप्लवल ने इस चुनाव को खारिज करने की माँग रखी थी । आखिर क्यों ? क्या है उनकी असंतुष्टि ? यद्यपि इस आलेख मे बिप्लव की असंतुष्टि से भी ज्यादा मधेशवादी दल अर्थात राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल (राजपा) के अध्यक्ष महन्थ ठाकुर ने अपने चुनावी सभा के दौरान महोत्तरी के जलेश्वर मे भाषण मे्र का था कि, “मित्रो, मधेश आन्दोलन करने के बाद हमें ‘छोटा मधेश’ मिला है ।” ठाकुर के इसी वक्तव्य पर केन्द्रीकृत है यह आलेख ।

आज के तारिख मे चुनावरुपी सूर्य के प्रकोप में त्रिपाठी खाक होने को निकल पड़े । यह यह अलग बात है कि त्रिपाठी चुनाव जीतने के पश्चात नेकपा एमाले के भीतर नया मधेशी पण्डित और महासेठ की पगड़ी ग्रहण कर सकते है

सम्भतः आठ जिला समेट कर बनाया गया प्रदेश नम्बर–२ को उन्होंने छोटा मधेश की संज्ञा दी थी और मधेश आन्दोलन के उपलब्धि के रूप में इस प्रदेश को लिया जा रहा है । क्या मधेश आन्दोलन का सपना केवल छोटा मधेश प्राप्ति करना था ? निश्चय ही नहीं । समग्र मधेश एक प्रदेश और स्वायत मधेश एक प्रदेश के एजेण्डा पर हुआ था मधेश आन्दोलन या कहें तो बसन्त क्रांति । यह एजेण्डा अभी भी पूर्व से लेकर पश्चिम तक रहे मधेशियाें के दिमाग से हटा नही है । और जिस तरह का राज्य का बरताव है इस से लगता नहीं कि यह नारा किनारे लग सकता है । अभी के चुनाव सम्पन्नता को ही आधार मान कर आन्दोलन का तोष अर्थात असंतुष्टि के तोष को असम्बोधित छोड़ा गया तो यह एक ऐतिहासिक भूल होगी । लोकतन्त्र और खास कर “एलेक्टोरल डेमोक्रेशी” तो आज के इस इक्कीसवीं सदी मे शाप तुल्य साबित होता दिख रहा है । और नेपाल जैसे देश मे तो चुनाव अफीम में नशा से कम नही ।
मधेश आन्दोलन के नवनिर्मित इतिहास को वर्तमान परिस्थिति से सान्दर्भीकरण कर के देखा जाय तो खराब स्थिति का आयतन बढ़ता नजर आ रहा है । छोटा मधेश मे बढ़ रही चुनावी यात्रा को दूर से भी अवलोकन करने पर पता चलता है कि मधेश इस चुनाव मे जात और भात के नाम पर कुछ ज्यादा ही बँट चुका है । राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल हो या संघीय समाजवादी फोरम । आठ जिला में सीमित होने के लिए लालायित दिखाई दे रहा है । ये सभी तथ्य बाहर आ जाने के बाबजूद भी मधेशवादी दल के नेता कहीं स्वायत मधेश प्रदेश तो कहीं एक मधेश दो प्रदेश के झूठे नारे लगा कर चुनावी सभा को सम्बोधन करते पकड़े गए । एक वक्त था जब मधेशवादी दल पूर्व के झापा, मोरंग और सुनसरी को प्रदेश नंबर–२ में मिलाने के लिए आन्दोलनकारी नारा लगाने में अपना उर्जा खर्च किया करते थे । आज वही नेता कोशी नदी से पश्चिम कट चुके है । और यह हुवा है चुनाव के कारण । झापा में मधेशवादी दल से कोई लड़ा भी था ? चुनावी बजार मे कोई चर्चा भी नही हुई । मोरंग से तो मधेश के मसीहा उपेन्द्र यादव का पलायन ही हो चुका है ।
सुनसरी का प्रत्यक्ष और समानुपातिक तर्फ कर के थोड़ा बहुत मधेश मुद्दा के नाम पर वोट लाने बाला विजय गच्छदार मधेशवाद के व्यापार में मुनाफा का आश खो कर अपने पुराने घर अर्थात नेपाली कांग्रेस मे वापसी कर चुके हैं । और अब हाल मधेशवादियों का सुनसरी मे झापा से कम नहीं । अर्थात मधेशवादी की अवस्था सुनसरी में शून्य है
हाल कुछ इसी तरह पश्चिम का भी है । मेरे पुस्ता ने जब से होश सम्भाला है और राजनीति को समझने में लगा है तब से हिृदेश त्रिपाठी की एक बात सुनती आ रही है कि उनके लही मे मधेशवाद के प्रवाह सिवाय और दूसरा कुछ भी नहीं है । परंतु आज के तारिख मे चुनावरुपी सूर्य के प्रकोप में त्रिपाठी खाक होने को निकल पड़े । यह यह अलग बात है कि त्रिपाठी चुनाव जीतने के पश्चात नेकपा एमाले के भीतर नया मधेशी पण्डित और महासेठ की पगड़ी ग्रहण कर सकते है । परंतु उनकी तार्किक क्षमता और बेजोड भाषण शैली को मधेश में बाजार नही मिलेगा, यह चर्चा अब आम है ।
वैसे तो जैसे भी एक थान संविधान और उसके बाद चुनाव का वकालतकर्ता लोगों की नजर में अभी सम्पन्न हुए चुनाव में कितना प्रतिशत मतदान हुआ इस विषय को ही महत्व दिया जा रहा होगा । क्याेंकि उन को जैसे भी संविधान लाना था और चुनाव करवाना था । और दर्जनों मधेशियाें की हत्या करके आज वे अपने मिशन में सफल नजर आ रहे हंै । परंतु कम संख्या मे ही सही अभी के राजनीतिक घटना क्रम के पीछे छुपे अप्रकटित तथ्यों के उपर ध्यान रखना आवश्यक है ।
अभी के मधेश राजनीति के पुराने चेहरे सत्ता के राजनीतिक चुंगुल में फँसने की सम्भावना जोरशोर से उभरती नजर आ रही है और कथित राष्ट्रीय दल तो विकास के नाम पर अपने करीबी को आर्थिक और व्यापारिक लाभ देने के सिवा कुछ नया करेंगे यह देखना ही होगा । चाकर पूँजीवादियाें को सुरक्षा और लाभ देने मे कोई कन्जूसी नहीं होगी इन दलों के द्वारा और चुनाव में जिस तरह से पैसा का नदी बहाया गया है इस से स्पष्ट भी होता है ।
मधेश को अभी प्रदेश नम्बर—२ में समेटा गया है जैसा प्रतीत होता है परंतु इस प्रदेश की आगामी राजनीति समग्र मधेश और देश मे प्रभाव डालेगा । इसलिए भी संविधान संसोधन के मुद्दो को गहनता के साथ ले कर देश को राजनीतिक निकास देने की आवश्यकता है । अगर वाम गठबंधन की सरकार बन जाती है तो देखना है पुष्प कमल दहाल की हरकत । संविधान संसोधन के एजेण्डा को वे केन्द्रीकृत कर पाते हैं या फिर खडग प्रशाद ओली के ‘ओलिग्यार्की’ मे सिमट कर रह जाते हैं ।
मधेशवादी दलके नेतागण के क्रियाकलाप को आम मधेशी जनता और अमर शहीद भी ऊपर से अपने निगरानी मे रखने वाले हैं । पिछले वक्त की तरह मन्त्री बनने के लिए बिखर कर ध्वस्त होते हैं या शहीदों के सपना को पूरा करने के लिए इमानदारी का आयाम कायम कर मधेश की राजनीति आगे बढ़ाते हैं ।

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