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कुलदेवता की पूजा है जरूरी

 
हिंदू धर्म में कुलदेवता और कुलदेवी का स्थान सदैव से रहा है। प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज हैं, जिनसे उनके गोत्र का पता चलता है। बाद में कर्मानुसार इनका विभाजन वर्णों में हो गया। हर जाति वर्ग किसी न किसी ऋषि की संतान हैं और उन मूल ऋषि से उत्पन्न संतान के लिए वे ऋषि या ऋषि पत्नी कुलदेव और कुलदेवी के रूप में पूज्य हैं।

पूर्व के हमारे कुलों अर्थात पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने लिए उपयुक्त कुलदेवता अथवा कुलदेवी का चुनाव कर उन्हें पूजित करना शुरू किया था ताकि एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति कुलों की रक्षा करती रहे।

मंगल भवन के आचार्य भास्कर आमेटा जी बताते है कि समय क्रम में परिवारों के एक दूसरे स्थानों पर स्थानांतरित होने, धर्म परिवर्तन करने, आक्रान्ताओं के भय से विस्थापित होने, जानकार व्यक्तियों के असमय मृत होने, संस्कारों के क्षय होने, विजातीयता पनपने, इनके पीछे के कारण को न समझ पाने आदि के कारण बहुत से परिवार अपने कुलदेवता और देवी को भूल गए। लोगों को यह मालूम ही नहीं रहा उनके कुलदेवता और देवी कौन हैं या किस प्रकार उनकी पूजा की जानी चाहिए।

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एेसी मान्यता है कि, कुलदेवता और देवी की पूजा छोड़ने के बाद कुछ वर्षों तक तो कोई खास अंतर नहीं समझ में आता लेकिन उसके बाद जब सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में दुर्घटनाओं, नकारात्मक ऊर्जा का बेरोक-टोक प्रवेश शुरू हो जाता है। इससे उन्नति रुकने लगती है।
शास्त्रों के जानकार बताते हैं कि, कुलदेवता और देवी हमारे वह सुरक्षा आवरण हैं जो किसी भी बाहरी बाधा और नकारात्मक ऊर्जा से सबसे पहले व्यक्ति की रक्षा करते हैं। इसलिए ईष्टदेवी-देवता के साथ कुलदेवी और देवता की पूजा जरूर करनी चाहिए।

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