सत्ता कब्जा की तयारी
पंकज दास
आखिरकार जेठ १४ गते के मध्यरात में वही हुआ, जिसका डर सभी को था। देश और जनता के लिए अपरिहार्य रहा संविधान चार साल की नाकाम कोशिशों के बाद धाराशायी हो

गया। नेपाल की राजनीति में अन्तिम घडी में आकर सहमति करने की परम्परा भी इस बार काम न आई। जिस समय नेताओं को संविधान के विवादित विषय पर सहमति जुटाने में अपना समय व्यतीत करना चाहिए था, उस समय सत्ता की बार्गेनिंग की जा रही थी। इससे साफ जाहिर हो गया है कि चार साल बर्बाद करने के बाद भी संविधान नेताओं की प्राथमिकता में नहीं था। संविधान निर्माण के विषय पर हो या फिर संविधान के विवादित विषयों पर सहमति जुटाने की बात पर जितनी बार भी रिसोर्ट से लेकर पांच सितारा होटल तक और सिंहदरबार से लेकर बालुवाटार तक बैठकें हर्ुइ, इन सभी बैठकों में सत्ता का खेल हमेशा ही संविधान पर हावी रहा और जेठ १४ आते-आते सत्ता ने संविधान को चारों खाने चित्त कर दिया।
दो सदी के संर्घष्ा और हजारों लोगों की बलिदान के बाद इस बार जनता के द्वारा जनता के लिए और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा संविधान निर्माण करने का सुवर्ण्र्ाावसर हम सभी को मिला था। इसके लिए ६०१ सभासदों पर करीब ९ अरब रूपये भी खर्च किए गए, लेकिन अन्ततः निक्कमे नेताओं और निरीह सभासदों की वजह से संविधान-सभा असफल हो गई। राजनीतिक नेतृत्व की अकर्मण्यता के कारण नेपाली जनता को एक बडी उपलब्धि से वंचित रहना पडÞा।
संविधान-सभा भंग होने के बाद सभी प्रमुख दल इसके लिए एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते नजर आए। लेकिन कोई भी इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए तैयार नहीं हुआ। हां प्रधानमंत्री डाँ बाबूराम भट्टर्राई ने संविधान-सभा भंग होने के बाद आयोजित पत्रकार सम्मेलन के जरिये इसकी जिम्मेवारी लेने की औपचारिकता पूरी की लेकिन साथ ही वे इसके लिए कांग्रेस और एमाले के ऊपर दोषारोपण करने से भी नहीं चूके। संविधान-सभा किसके कारण भंग हुआ और कौन इसमें सबसे अधिक दोषी हैं यह एक अलग ही विश्लेषण का विषय है। लेकिन इसके भंग होने के बाद फिर से संविधान-सभा चुनाव की घोषणा कर देश में एक नए द्वंद्व और उन्माद को हवा मिल गई है।
चुनाव घोषणा के साथ ही माओवादी ने आगामी चुनाव में दो तिहाई बहुमत लाने का दम्भ भरना शुरू कर दिया है। संविधान-सभा भंग होने और चुनाव की घोषणा में जिस तरीके से माओवादी के नेताओं का व्यवहार और बयान देखा गया, वह उनके अन्तिम लक्ष्य की ओर ही इंगित करता है। माओवादी के नेताओं द्वारा कई बार यह बयान र्सार्वजनिक रूप से आया है कि उनका अन्तिम लक्ष्य नेपाल की राजसत्ता पर पूरी तरीके से कब्जा करना है। और इसके लिए कई बार कोशिशे भी की गई जो कि नाकाम रही। लेकिन इस बार सब कुछ माओवादी की योजना के मुताबिक ही हो रहा है। निश्चित ही संविधान-सभा भंग होने और उसके पहले की जटिल परिस्थिति के लिए कांग्रेस-एमाले सहित कई विदेशी ताकतें भी दोषी हैं लेकिन यह सब माओवादी की चतुर रणनीति का हिस्सा न चाहते हुए भी बन गए और परिणामतः संविधान-सभा को भंग होने पर मजबूर कर दिया।
जब किसी भी चाल से माओवादी की सत्ता कब्जा की रणनीति पूरी नहीं हर्ुइ तो ९ महीने पहले उन्होंने एक बार फिर से सरकार पर कब्जा जमाया। मधेश में अपनी पकडÞ खो चुके माओवादी ने मधेशी मोर्चा को अपने साथ लिया और उनको ऐसे-ऐसे मंत्रालय से नवाजा गया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इसके अलावा जब राष्ट्रीय सहमति की बात आई तब भी माओवादी ने मधेशी मोर्चा को वह भाव दिया, जो कि कांग्रेस एमाले किसी भी शर्त पर नहीं दे सकते थे। साथ ही मधेश के मुद्दे पर जितनी लचकता माओवादी अपना रहे हैं उतनी कांग्रेस और एमाले उदार नहीं हो सकती हैं। मधेश के मुद्दों पर चार सूत्रीय समझौते में से भले एक भी पूरा नहीं हुआ हो लेकिन मधेशी मोर्चा को माओवादी ने इस तरीके से अपने जाल में फंसा रखा है कि उनको छोड कर मोर्चा के नेताओं के बाहर रहने का सवाल ही नहीं उठता है।
सरकार के लिए स्पष्ट बहुमत से कहीं अधिक बनाने के लिए माओवादी ने छोटे-छोटे दलों को भी चारा खिलाया और सभी उसके गुणगान करने लगे। एक सभासद रहे दलों को भी श्रम तथा यातायात मंत्रलय की जिम्मेवारी दी जाने लगी। यह सब माओवादी का उदार चेहरा या गठबन्धन में सम्मान कतई नहीं था बल्कि अपने उस लक्ष्य को पाने की चाहत थी जिसके लिए वो कोई भी मूल्य चुकाने को तैयार थे। और समय पर माओवादी की यह रणनीति काम भी कर गई। उन्हें अछी तरह मालूम था कि मधेशी मोर्चा के द्वारा उर्ठाई जाने वाली समग्र मधेश एक प्रदेश को कांग्रेस-एमाले कभी स्वीकार नहीं करेगी, जातीय राज्य को कांग्रेस-एमाले कभी स्वीकार नहीं करेगी और इसके बिना मधेशी मोर्चा सहित जातीय संगठन नहीं मानने वाले है। इसलिए जातीय संगठनों को भी उकसा दिया। उधर अखण्ड के नाम पर कई आन्दोलन चला दिया। कभी थारूओं को, कभी आदिवासी जनजाति को, कभी ब्राहृमण क्षत्री को। कभी मुस्लिम को, सभी को आन्दोलन के लिए उकसाने में कहीं न कहीं और किसी न किसी रूप में माओवादी की चाल थी। और वो इसमें पूरी तरह सेसफल रहे।
इसका एक उदाहरण हमें जेठ १४ गते को देखने को मिला। संविधान-सभा को चारों ओर से विभिन्न जातीय संगठनों ने घेराबन्दी की थी। ब्राहमण क्षेत्री ने भी घेरने की कोशिश की। राजधानी में कोई भारी उत्पात मचने जैसा माहौल था। सिर्फराजधानी में ही नहीं वृहत मधेशी मोर्चा द्वारा मधेश बन्द, थारूओं द्वार पश्चिम के जिले बन्द, अखण्ड सुदूर पश्चिम बन्द, हर जगह बन्द ही बन्द का वातावरण था। ऐसा लग रहा था मानो संविधान नहीं बना तो कयामत आ जाएगी। क्योंकि सभी बन्द की एक ही मांग थी जेठ १४ गते हर हाल में संविधान आना चाहिए। लोगों को यह डर सताने लगा कि यदि इस बार संविधान जारी नहीं हुआ तो देश में अराजकता की स्थिति आ जाएगी। जातीय दंगा फैल जाएगा। चारों ओर अफरा तफरी का माहौल हो जाएगा। लेकिन जैसे ही जेठ १४ गते अंधेरा छाने लगा और यह बात स्पष्ट हो गई संविधान नहीं बनेगा और संविधान-सभा भंग होने जा रहा है, वैसे ही सब ओर का माहोल शान्त हो गया। सभी बन्द अचानक ही खुलने लगे, सभी आन्दोलन और हडÞताल को वापस लेने की होडÞ लग गयी। अगले दिन सुबह तक इस कदर सन्नाटा पसरा था, जैसे की कुछ हुआ ही नहीं हो।
इन बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि ये सभी आन्दोलन बन्द हडताल और बेवजह की मांगें मौसमी बरसात की तरह आई और चली गई। जिस उद्देश्य के लिए यह सब नाटक हो रहा था वह पूरा हो गया। ऐसा लग रहा था जैसे कि यह सब संविधान-सभा भंग करने के लिए किया गया हो। इसलिए इन सभी के पीछे किसी न किसी रूप में माओवादी की भूमिका संदिग्ध है। और उनको साथ मिला है, मधेशी मोर्चा का जो जाने अनजाने उनका मोहरा बनते आ रहे हैं।
संविधान-सभा भंग होने के बाद कांग्रेस-एमाले को यह लग रहा था कि राष्ट्रपति द्वारा कोई ठोस कदम उठाया जा सकता है। लेकिन जिस तरीके से माओवादी के नेतृत्व वाली सरकार ने राष्ट्रपति को ‘र्साईज’ में लाकर खडा कर दिया है वह अपने आप में एक रहस्य है कि आखिर राष्ट्रपति भी कैसे निरीह बन गए। जितना दबाब राष्ट्रपति को वर्तमान सरकार को भंग कर राष्ट्रीय सहमति की सरकार के लिए पडÞ रहा है, उतना शायद कटवाल प्रकरण के समय भी नहीं पडा था। लेकिन इस बार मजबूरी में राष्ट्रपति कोई भी कदम नहीं उठाने को बाध्य है।
जेठ १४ गते की मध्यरात को जब राष्ट्रपति इस बात का इंतजार कर रहे थे कि शायद आखिरी समय में भी दलों के बीच कोई चमत्कारिक सहमति हो जाए, ठीक उसी समय राष्ट्रपति के पास पहुंचे प्रधानमंत्री ने संविधान-सभा भंग होने में कुछ ही समय शेष रहने की बात बताते हुए चुनाव घोषणा किए जाने की जानकारी दी। साथ ही प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को एक पत्र भी सौपा। वह पत्र प्रधानमंत्री की तरफ से राष्ट्रपति को नहीं लिखी गई थी बल्कि सरकार की तरफ से चुनाव की घोषणा के लिए चुनाव आयोग को लिखी गई पत्र का सिर्फबोधार्थ भर था। यानी कि माओवादी ने अन्तरिम संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति को भी उनकी हैसियत बता दी। संविधान-सभा भंग होने के अगले ही दिन रेडियो नेपाल के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को अपना संदेश साफ बता दिया कि कटुवाल प्रकरण वाली गलती वो न दोहराए। उन्होंने यह भी संकेत दे दिया कि अगर राष्ट्रपति की तरफ से कोई भी कदम उठाया जाता है तो उनका हाल भी ज्ञानेन्द्र जैसा हो सकता है। प्रधानमंत्री के इस रुख से माओवादी की सत्ता कब्जा की रणनीति स्पष्ट झलक रही थी। संविधान-सभा भंग होने और चुनाव की घोषणा के बाद जब बालुवाटार में प्रधानमंत्री पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे उसी समय उनका हाव भाव और ‘बडी लैग्वेज’ देख कर उनकी अकड का अंदाजा लगाया जा सकता था। भट्टर्राई ने साफ कर दिया कि कोई कुछ भी कहता रहे उनकी सरकार संवैधानिक सरकार है और उनके द्वारा घोषित चुनाव भी संवैधानिक है। सभी कार्यकारी अधिकार उन्ही में निहित है। अन्तरिम संविधान का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री ने यह भी कह कि यह संविधान कोई ०४७ साल का संविधान नहीं है जिस में कार्यकारी अधिकार प्रधानमंत्री और राजा में बंटा होता था। यह ०६७ का संविधान है, जिसमें कि सारा अधिकार प्रधानमंत्री में निहित है और राष्ट्रपति को सरकार का हर फैसला मानना संवैधानिक मजबूरी है। विपक्षी दलों के लगातार दबाब के बाद जब सभी को यह लग रहा था कि माओवादी नेतृत्व वाली भट्टर्राई सरकार को बर्खास्त कर दिया जाएगा वैसे समय राष्ट्रपति ने भी अपनी तरफ से भट्टर्राई को ही संवैधानिक दर्जा की मान्यता दे दी। राष्ट्रपति ने माना कि वर्तमान सरकार ही अन्तरिम सरकार है और सरकार द्वारा किए जाने वाले दैनिक कार्याें का संचालन भी करती आएगी। राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए इस पत्र में कहीं भी दूसरी सरकार गठन का उल्लेख नहीं किया गया था।
इन सब परिदृश्यों से यह लगने लगा है कि संविधान-सभा भंग होने के बाद चाहे जैसे भी हों सत्ता पर पूरी तरीके से कब्जा करने की उसकी रणनीति रंग ला रही है। चुनाव की घोषणा यह सोच कर की गई है कि इतनी जल्दी चुनाव तो होंगे नहीं, तब तक सरकार चलती रहेगी। और साल डेढ साल के बाद माहौल अपने पक्ष में कर ही चुनाव कराए जाएंगे। संविधान-सभा भंग होने के बाद माओवादी ने खुद को संघीयता और जातीय पक्ष का सबसे बडा हिमायती और कांग्रेस तथा एमाले को संघीयता का सबसे बडा दुश्मन साबित कर ही दिया है। ऐसे में जिस तरीके से लोगों में राज्य को लेकर और जातीय पहचान और अधिकार को लेकर राजनीतिक चेतना जागी है, इस माहौल में चुनाव होने पर निश्चित रूप से माओवादी को ही इसका फायदा मिलने वाला है। कांग्रेस-एमाले की तो यह हालत हो गई है कि उनके ही सभासद ने उनका साथ छोडÞ दिया था और इस समय इन दोनों पार्टियों की हालत सबसे अधिक खराब है। वैसे माओवादी में भी वैद्य पक्ष द्वारा विभाजन किया जा रहा है लेकिन यह उनकी रणनीति का ही हिस्सा है जबकि कांग्रेस-एमाले जड से हिल गई है।
निष्कर्षयह है कि यदि मंसिर में चुनाव हुए तो जिसकी संभावना काफी न्यून है, तो भी माओवादी को ही फायदा पहुंचने वाला है। माओवादी-मधेशी मोर्चा मिलकर चुनाव लडÞने की सोच रही है, जिससे यह लग रहा है कि विपक्षी दलों के लिए आने वाले दिनों में कोई भी स्थान नहीं रहने वाला है। यदि मंसिर में चुनाव नहीं हुए तो भी माओवादी की सरकार जारी रहेगी। यदि दलों के बीच मजबूरी में सहमति हर्ुइ तो भी माओवादी ही हावी होंगे और इन सब में से कुछ नहीं हुआ तो एक साल के बाद माओवादी इस देश पर पूरी तरीके से हावी होंगे। जो लोग इस गलतफहमी में हैं कि चुनाव हुए तो माओवादी को पराजय हाथ लगेगी और कांग्रेस-एमाले जैसी शक्तियां फिर उभर कर आएंगी तो उन्हें पिछली संविधान-सभा चुनाव के परिणामों से सीख अवश्य लेनी चाहिए। उस समय भी माओवादी को १० से १२ सीटों पर समेटने वाले ही इस बार फिर से उसको कम आंक रहे हैं। जिस तरीके से पिछली बार माओवादी ने कई जिलों में शान्तिपर्ूण्ा बूथ कब्जा किया था इस बार भी वह फिर से वही करने वाले हैं। लडाकुओं को शिविर से विदा अवश्य कर दिया गया है लेकिन उनको भी संगठन से जोडे रखने की मुहिम जारी है। नाराज लडाकुओं और कार्यकर्ताओं के लिए वैद्य को अलग से ही मिशन पर लगा दिया गया है। ऐसे में चीत और पट दोनों ही माओवादी के हैं। और संविधान-सभा भंग होने के बाद अब वे पूरी तरह से सत्ता कब्जा पर ही केन्द्रित हैं।





