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संविधान-सभा का वो आखिरी दिन

 

संघीयता के विवादित विषय में सहमति जुटाने के लिए जेठ १४ गते सुबह से ही प्रधानमंत्री के सरकारी निवास बालुवाटार में सभी प्रमुख दलों के बीच बैठकों का दौर जारी था। संघीयता पर कांग्रेस-एमाले एक तरफ और माओवादी-मधेशी मोर्चा एक तरफ थे। कांग्रेस एमाले किसी भी हालत में एकल पहचान के आधार पर राज्यों की संरचना किए जाने के पक्ष में नहीं थे तो मधेशी मोर्चा किसी भी हालत में एकल पहचान को छोडने के लिए तैयार नहीं था।
इन दोनों के बीच समन्वय की भूमिका दिखाने वाले माओवादी कभी कांग्रेस-एमाले के पक्ष में तो कभी मधेशी मोर्चा के पक्ष में वकालत कर रहे थे। ऐसे में तय हुआ कि संघीयता और पहचान सहित राज्य पर्ुनर्संरचना के लिए आन्दोलनरत सभी समूहों के प्रतिनिधियों को बुलाकर उनकी भी राय जानी जाय। बालुवाटार में ही आदिवासी जनजाति -ककस), महिला -ककस), और वृहत मधेशी मोर्चा के प्रतिनिधियों को बुलाया गया।
इससे पहले बालुवाटार से मीडीया में यह खबर आने लगी कि दलों के बीच समझौता करीब-करीब हो गया है। और कांग्रेस-एमाले के ही कहने के आधार पर बहुपहचान के आधार पर प्रदेशों का गठन होने की ओर दलों के बीच सहमति होने वाली है। इसी खबर के साथ ही यह खबर जब आई कि मधेश को तीन हिस्सों में बांटे जाने की बात तय हर्ुइ है तो मधेशी सभासद और मधेशी जनता को दुख हुआ हालांकि संविधान आने की संभावना के बीच कुछ भी नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई थी। लेकिन जब इस बारे में बालुवाटार में मौजूद मधेशी मोर्चा के नेताओं से जानकारी हासिल हर्ुइ तो पता चला कि कोई भी सहमति नहीं हर्ुइ है। और मधेशी नेताओं ने उस समय भी यह स्पष्ट कर दिया कि एक मधेश एक प्रदेश की अपनी पुरानी मांग से वो पीछे नहीं हटने वाले हैं। उसी समय यह साफ हो गया कि बालुवाटार से जो भी खबरें बाहर आ रही थी वह प्रायोजित थी, उसका सच्चाई से कोई भी लेना देना नहीं था।
इसी बीच बालुवाटार पहुंचे आदिवासी जनजाति ककस के पृथ्वी सुब्बा गुरूंग ने पत्रकारों को बताया कि आज ही संविधान-सभा से संविधान जारी करने के लिए उन्होंने बहुजातीय पहचान पर अपनी सहमति दे दी है। हंसते हुए मीडिया के सामने आज ही संविधान जारी होने की बात गुरूंग ने इस विश्वास के साथ कहा लगता था आज मध्यरात तक वाकई में संविधान आ जाएगा। वैसे इसी बीच बालुवाटार से बाहर निकले किसी भी नेता ने मीडिया को कुछ भी नहीं बताया। प्रधानमंत्री निवास के भीतर से आ रही सहमति की खबरों की पोल उस समय खुल गई जब वृहत मधेशी मोर्चा के संयोजक उपेन्द्र यादव बालुवाटार से बाहर निकले। तीन दल और मधेशी मोर्चा के नेताओं ने विपक्षी दल के नेता होने के नाते उपेन्द्र यादव को भी बालुवाटार बुलवाया था। लेकिन आधा घण्टा से भी कम समय मंे बालुवाटार से बाहर निकले उपेन्द्र यादव ने मीडीया में जो बयान दिया उससे हडकम्प मच गया।
अब तक सहमति के करीब पहुंचने और आज ही संविधान जारी होने का दावा करने वाली नेपाल की मीडीया में अचानक उपेन्द्र यदव के बयान से रूख ही बदल गया। यादव ने उसी समय कह दिया कि संविधान जारी नहीं होने वाला है। तीन दल खासकर कांग्रेस-एमाले अभी भी बहुपहचान सहित का प्रदेश गठन पर अडÞ हुए हैं। लेकिन मधेशी दल किसी भी कीमत पर मधेश को तीन या चार टुकडों में बांटे जाना कतई स्वीकार नहीं कर रहे हैं। बालुवाटार के भीतर सहमति की कोई भी बात नहीं हो रही है बल्कि आगे के विकल्प के बारे में सोचा जा रहा है। आज तो किसी भी हालत में संविधान जारी करने की मनस्थिति में तीन दल नहीं हैं और संविधान-सभा भंग करने का षडÞयंत्र किया जा रहा है।
इसके बाद बालुवाटार के भीतर से आ रही प्रायोजित खबरों की खोज की गई तो पता चला कि कांग्रेस और एमाले के नेता अपनी पहुंच के आधार पर सोची-समझी रणनीति के तहत मीडीया में इस तरह की झूठी खबरें फैला रहे हैं। जिस सहमति का दावा कुछ नेता और उनके द्वारा संचालित मीडिया के माध्यम से बाहर आ रहा था, वह सिंहदरबार आते-आते सिफर साबित हुआ। सिंहदरबार में जिस तरीके से नेताओं के बीच नाटक हुआ, उससे साफ हो गया कि संविधान जारी नहीं होने जा रहा है। अब उसके बाद के विकल्पों के बारे में दलों के बीच गहमा गहमी होने लगी। सिंहदरबार में विकल्प पर विचार करने के लिए तीन दल और मधेशी मोर्चा ने पहले अलग-अलग बैठकें की। और बाद में सामूहिक बैठकें भी हर्ुइ। कुछ देर तक सिंहदरबार स्थित सभामुख के दफ्तर में भी सभी दलों की बैठक हर्ुइ। इस सबके बीच माओवादी स्पष्ट थे कि उन्हें क्या करना था। मधेशी मोर्चा भी स्पष्ट था कि उसे माओवादी के ही साथ रहना था। सबसे अधिक मुश्किल कांग्रेस-एमाले के साथ हर्ुइ। उन्हें आभास होने लगा था कि माओवादी कोई गहरी चाल चलने जा रहे हैं।
इन दोनों दलों के लिए इसलिए भी मुश्किलें होती जा रही थी कि यदि संविधान-सभा का कार्यकाल बढाया जाता है तो भी माओवादी की तरफ से प्रधानमंत्री बनाए गए बाबूराम भट्टर्राई अपना पद नहीं छोडने वाले हैं। और यदि रूपांतरित संसद में परिणत किया जाता है तो भी वो पद नहीं छोडने वाले हैं। कांग्रेस-एमाले को यह विश्वास था कि संविधान-सभा का कार्यकाल किसी न किसी रूप में बढ जाएगा। या तो संकटकाल लगाकर ६ महीने के लिए संविधान-सभा का कार्यकाल बढाया जा सकता है या फिर संविधान-सभा भंग होने के बाद उसे रूपांतरित संसद के जरिये संविधान-सभा का काम किया जा सकता है। कांग्रेस-एमाले के नेताओं को यह जरा भी इल्म नहीं था कि माओवादी संविधान-सभा भंग करने और चुनाव की घोषणा किए जाने का ऐलान कर सकते हैं। इसलिए कांग्रेस और एमाले उस समय संविधान-सभा से भी अधिक सरकार परिवर्तन की बात पर अडी हर्ुइ थीं। दो दिन पहले ही कांग्रेस ने सरकार से अपना नाता तोडÞ लिया था। उसे लगा कि सरकार से बाहर आने पर माओवादी पर दबाब पडेÞगा और प्रधानमंत्री अपना पद छोडÞ देंगे। संविधान-सभा का कार्यकाल बढाने के लिए जैसे ही दो दिन पहले सरकार की तरफ से विधेयक दर्ता कराया गया था तो इसका विरोध करते हुए कांग्रेस ने इसे र्सवाेच्च अदालत के आदेश का उल्लंघन बताया। कांग्रेस की यह मांग र्सार्वजनिक हो गई कि यदि सरकार का नेतृत्व उसे दे दिया जाता है तो संविधान-सभा का कार्यकाल भी बढ सकता है या फिर रूपांतरित संसद में उसे परिणत किया जा सकता है। यानी कांग्रेस के लिए संविधान जारी करना प्राथमिकता का विषय था ही नहीं वो हर कीमत पर सरकार का नेतृत्व हथियाना चाहती थी। लेकिन माओवादी उससे दो कदम आगे निकल गए।
माओवादी ने साफ कर दिया कि दलों के बीच हुए समझौता के मुताबिक जब संविधान तैयार हो जाएगा और उसे अन्तिम हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा उसी के साथ ही प्रधानमंत्री अपना इस्तीफा देंगे। लेकिन कांग्रेस एमाले जेठ १४ से पहले ही सरकार परिवर्तन की मांग करने लगी। कांग्रेस की तरफ से सरकार में शामिल दो मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस जेठ १४ की आखिरी घडी तक प्रधानमंत्री के इस्तीफे पर ही अडी रही और संविधान जारी करने या आगे के किसी विकल्प के बारे में उसकी धारणा स्पष्ट नहीं रही। एक तरफ तो र्सवाेच्च अदालत द्वारा संविधान-सभा का कार्यकाल नहीं बढाए जाने को लेकर दिए फैसले का स्वागत किया तो वहीं दूसरी ओर यह भी कहते नजर आए कि उनके नेतृत्व में सरकार का गठन किया जाता है तो सब कुछ संभव है। एमाले भी कांग्रेस की हां में हां मिलाती नजर आई। उधर माओवादी और मधेशी मोर्चा एक साथ मिलकर दो दिन पर्ूव ही तय कर चुके थे कि उन्हें इस अवस्था में कौन सा कदम उठाना है। चुनाव घोषणा किए जाने की तैयारी दो दिन पर्ूव ही कर दी गई थी और कांग्रेस-एमाले को भी इस बारे में संकेत दे दिया गया था। इसलिए भी कांग्रेस-एमाले को यह चिन्ता थी कि माओवादी के नेतृत्व में ही चुनाव होती है तो फिर से उनका वर्चस्व हो जाएगा।
सिंहदरबार में सभामुख के कक्ष में तीन दल और मधेशी मोर्चा के बीच हर्ुइ बैठक के दौरान सभामुख ने बताया कि सहमति होने पर सभी प्रक्रिया को हटाते हुए सीधे संविधान जारी करने की पूरी तैयारी कर ली गई है। अब तक हर्ुइ सहमति के आधार पर उतना ही संविधान आज जारी कर लिया जाए इसके लिए संविधान के मसौदा को ७०० प्रतियों में प्रकाशित करने के लिए जनक शिक्षा केन्द्र और गोरखापत्र संस्थान को तैयार रहने को कह दिया गया था। इसी बीच माओवादी की तरफ से चुनाव घोषणा का प्रस्ताव आ गया। अध्यक्ष प्रचण्ड ने किसी व्यक्ति से फोन पर बात की और कहा कि अब संविधान जारी करना मुश्किल है और चुनाव ही एकमात्र विकल्प है। माओवादी के प्रस्ताव को मधेशी मोर्चा ने भी र्समर्थन किया। रात के करीब ९ बज चुके थे। सभामुख ने कहा कि अभी भी समय है संघीयता को अलग रख कर जितनी सहमति हर्ुइ है उतना ही संविधान जारी किया जाए। लेकिन मधेशी मोर्चा बिना संघीयता के संविधान जारी करने का किसी भी हालत में र्समर्थन नहीं कर सकता है। माओवादी ने कहा कि चुनाव के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कांग्रेस-एमाले ने संकटकाल की घोषणा कर संविधान-सभा का कार्यकाल बढÞाने या फिर रूपांतरित संसद के जरिये संविधान के काम को पूरा करने का प्रस्ताव किया।
माओवादी नेता वहां से सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचे, जहां मंत्रिपरिषद की आपात बैठक बुलाई गई। इसी दौरान कांग्रेस-एमाले के नेता माओवादी से मिलना चाहते थे। उन्हें भी प्रधानमंत्री दफ्तर ही आने को कहा गया। एक ओर कांग्रेस-एमाले के नेता एक कमरे में बैठे थे वहीं दूसरे कमरे में माओवादी के नेता बैठे थे। उधर प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों के साथ कैबिनेट की बैठक कर रहे थे। बैठक के शुरुआत में ही प्रधानमंत्री ने चुनाव की घोषणा किए जाने का प्रस्ताव किया और मार्ग ७ गते की मिति भी बता दी। यह सुनते ही कैबिनेट में शामिल एमाले की तरफ से मंत्री रहर्ेर् इश्वर पोखरेल ने इसका विरोध करते हुए कैबिनेट का बहिष्कार किया। बाहर आकर उन्होंने मीडिया को बता दिया कि प्रधानमंत्री ने चुनाव घोषणा किए जाने का प्रस्ताव किया और मार्ग ७ गते चुनाव की बात बाहर ला दी। पोखरेल ने तत्काल सरकार से बाहर होने की जानकारी भी मीडीया वालों को दी।
यह खबर पाते ही कांग्रेस-एमाले आगबबूला हो गए। उन्होंने इसे माओवादी की गहरी साजिश बताई। सत्ता कब्जा की रणनीति करार दिया। कांग्रेस-एमाले विरोध करते रह गए और माओवादी के नेतृत्व वाली सरकार ने कैबिनेट से चुनाव की घोषणा का निर्ण्र्ााकर पत्र निर्वाचन आयोग को भी भेज दिया। उधर सहमति की आशा लिए और तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम बदलने की खबरें टीवी पर देख रहे राष्ट्रपति को अचानक टीवी से ही मालूम चला कि प्रधानमंत्री भट्टर्राई उनसे मिलने के लिए राष्ट्रपति भवन पहुंच रहे हैं। कांग्रेस-एमाले के नेताओं से प्रधानमंत्री दफ्तर में बिना मिले भट्टर्राई सीधे शीतल निवास पहुंचे। उन्होंने सरकार के निर्ण्र्ााके बारे में राष्ट्रपति को मौखिक जानकारी दी और निर्वाचन आयोग को भेजे गए पत्र की प्रति उन्हें थमा दी। राष्ट्रपति भी भौंचक्के हो गए। उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा कि सहमति के आधार पर ही निर्ण्र्ााकरना चाहिए। संविधान-सभा भंग होने पर राष्ट्रपति ने दुख व्यक्त किया।
राष्ट्रपति से मिलने के बाद प्रधानमंत्री सीधे लाजिम्पाट स्थित प्रचण्ड निवास पहुंचे, जहां कुछ माओवादी नेता थे। उनसे कुछ देर बातचीत के बाद वो बालुवाटार गए जहां उन्हें राष्ट्र के नाम संबोधन करना था। उधर कांग्रेस-एमाले माओवादी की इस चाल से यह समझ नहीं पा रहे थे कि आगे क्या करना चाहिए। सिंहदरबार में ही वो दोनों दल बैठक में जुट गए। सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात हर्ुइ। लेकिन संसद भी भंग होने के कगार पर थी। कुछ ही मिनट बचे थे। करीब रात के ११ बजकर ५५ मिनट पर प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन करने के बदले पत्रकार सम्मेलन किया। उस में उन्होंने साफ कर दिया कि सरकार उन्हीं के नेतृत्व में रहेगी और सभी कार्यकारी अधिकार उन्हीं में निहित है। कांग्रेस-एमाले सरकार के फैसले को अवैधानिक कह रही थी। देर रात करीब साढे १२ बजे कांग्रेस-एमाले सहित १६ दलों के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति से मुलाकात कर भट्टर्राई सरकार को हटाने की मांग करते हुए राष्ट्रीय सहमति की सरकार गठन के लिए दबाब डाला।
इन सभी के बीच कुछ जातीय संगठन के द्वारा संविधान-सभा का घेराव किया गया था। कुछ ने इसका विरोध करते हुए सिंहदरबार की तरफ कूच करने की तैयारी की। जैसे ही उन्हे पता चला कि संविधान-सभा भंग हो गई है और चुनाव की घोषणा हो गई तो सभी पर््रदर्शनकारी अचानक ही वहां से गायब हो गए। कुछ देर बाद ही जहां हजारों की संख्या में लोग सडकों पर जमा थे, वहां सुरक्षाकर्मियों के अलावा और कोई भी नजर नहीं आ रहा था। ऐसा लग रहा था मानो सभी की मुरादें पूरी हो गई सभी को उनका अधिकार मिल और इच्छित संविधान भी मिल गया !!

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