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क्‍या आप जानते हैं अपनी झपकती पलकों का राज

 

क्‍या है पलकें झपकाने का विज्ञान

तरोताजा हो जाता है दिमाग और आंखें

साल 2012 में अमेरिका के प्रोसीडिंग्‍स ऑफ दी नेशनल अकादमी ऑफ साइंस में पेश किए गए एक रिसर्च पेपर के मुताबिक जापान के ओसाका शहर में वैज्ञानिकों की एक टीम ने इंसानों के पलक झपकाने को लेकर एक बड़ी रिसर्च की। इसके के मुताबिक जब हम आप अपनी पलकें झपकाते हैं तो यह हमारे दिमाग के लिए एक छोटे सा आराम लेने का तरीका हो सकता है। अब भले ही यह पलक झपकाना 1 सेकंड के बहुत छोटे से हिस्से के बराबर हो लेकिन एक बार पलक झपका कर हमारा दिमाग पूरी एकाग्रता के साथ वापस उसी अवस्‍था में लौट आता है जैसे कि वह पहले था। यानी कि पलक झपकाने से हमारा दिमाग बार बार तरोताजा होता रहता है और हमारी आंखे किसी भी चीज को ज्‍यादा अच्‍छे से देख पाती हैं।

बढ़ती है एकाग्रता

पलक झपकाने से जुड़ी इस रिसर्च को करने के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने 20 स्‍वस्‍थ लोगों को ब्रेन स्कैनर लगाकर बिठाया। उनके सामने टीवी पर फेमस अंतरराष्‍ट्रीय कॉमेडी धारावाहिक मिस्टर बीन चला दिया। शोध में यह बात साफ देखने को मिली कि शो के दौरान जब जब भी ब्रेक आया तब सभी लोगों ने एक साथ अपनी पलकें झपकाईं। टीवी देख रहे लोगों ने जिस वक्‍त अपनी पलकें झपकाईं उस दौरान उनके दिमाग के उस हिस्से में मौजूद सक्रियता थोड़ी कम हो गई। शोधकर्ताओं ने रिसर्च के रिजल्‍ट के आधार पर बताया कि पलक झपकाने को हमारा दिमाग ब्रेक लेने या आराम करने के एक डिफॉल्ट मोड के तौर पर इस्तेमाल करता है। इसका फायदा यह होता है कि जितनी बार हम पलकें झपकाते हैं। हमारी एकाग्रता उतनी ही ज्यादा कायम रहती है। अगर ज्यादा देर तक हम पलकें ना झपकाएं तो हम पढ़ी जा रही किताब या दृश्य को देखकर ऊब सकते हैं और उसे ध्यान से समझने की हमारी क्षमता भी कम होना शुरू हो सकती है। यानी कि जो भी व्यक्ति किसी काम के दौरान जितनी ज्यादा बार अपनी पलकें झपकाएगा। माना जाएगा कि उसका दिमाग उतना ही एकाग्र और सर्तक है। साथ ही वो जानकारी उसके दिमाग में ज्यादा अच्छे से बैठ रही है।

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