Sun. Sep 13th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

कभी दिखती पहेली अनसुलझी,  कभी लगती खुली किताब सी : गणेश लाठ

 

२४ अगस्त

Ganesh Lath

बुरा न माने तू गर तो कहु
एक बात है हलक में फांस सी
बातें करती तू ज्ञानी सयानी सी
फितरत क्यू तेरी बेगानी सी ।

कभी दिखती पहेली अनसुलझी

कभी लगती खुली किताब सी ।

कभी सताती कभी सहलाती 
कभी रुलाती कभी गुदगुदाती ।

तेरे रूप अनेक, रंग अनेक
तेरे घर अनेक, घाट अनेक
कभी दिखती निर्दोष नादान सी
कभी लगती शातिर शैतान सी ।

लाख कर ले जतन
सुहाती नहीं मुँह पर तेरे
बाते उसूल व ईमान की
फरेबी है तू
फिर भी लगती मुझे प्यारी
तुही बता जिन्दगी क्यूं है तू ऐसी 

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com