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“हरियो वन नेपाल को धन ” कल कहीं कहावताें में ही सिमटकर ना रह जाए ।

 

१२ सितम्बर

मुकेश झा

“हरियो वन नेपाल को धन ” मतलब हरा वन नेपाल का धन है , यह एक बहुत ही पुरानी कहावत है लेकिन अब यह कहावत वास्तव में कहावत में ही सिमट कर रहने का समय आ रहा है. नेपाल सरकार ने विकास के नाम पर जो वन जंगल काटने का फरमान दिया है वह सुरसा की तरह मुँह फाड़े जा रही है . रेलवे फ़ास्ट ट्रैक सड़क विस्तार के लिए तो पेड़ कटते ही थे अब  हवाई अड्डा  निर्माण के लिए तो पूरा जंगल ही साफ़ करने का निर्णय ले लिया गया और दुर्भाग्य यह है कि जनता में विकास का नारा दे कर इस कार्य के लिए जनता को सहमत भी किया जा चुका है .दूसरे पेड़ काटने के विषय का चर्चा छोड़ कर इस आलेख मार्फत नेपाल में बनने वाले दूसरे अंतर्राष्ट्रीय विमान स्थल निर्माण के लिए प्रदेश नंबर २ स्थित बारा जिल्ला में अवस्थित “चार कोशे झारी” नामक जंगल को जो कि नेपाली लोक कथाओं से भी सम्बंधित है उसे अब कहानी में ही सीमित रहना होगा. नेपाल सरकार के इस निर्णय से वातावरण एवं वन जंतु से प्रेम करने वाले को एक बार सोचने के लिए विवश होना होगा.

देश में अगर लड़ाई हो तो देश अपना अस्तित्व बचा सकता है, अगर कोई महामारी हो तो देश अपना अस्तित्व बचा सकता है, अगर दुर्भिक्ष हो या सूखा बाढ़ गरीबी कुपोषण  हो तो भी अपना अस्तित्व बचा सकता है लेकिन वातावरण से खिलवाड़ करने वाला देश विश्व को खतरे में डाल देता है. जो सरकार अपने जनता को सही और स्वस्थ वातावरण नहीं दे सकता है वह सरकार जनता के प्रति दोषी ही माना जाता है. सरकार सिर्फ उन्ही के लिए उत्तरदायी नहीं होता जो उन्हें वोट देते हैं, सरकार भले ही इंसान के वोट से सत्ता प्राप्त करता है लेकिन उसके बाद उसका दायित्व जल जंगल जमीन पेड़ पौधा पहाड़ नदी नाला सब के लिए उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है और अगर सरकार ने उनके लिए अपना दायित्व गंभीरता पूर्वक निर्वहन नहीं किया तो उससे आने वाले दुष्परिणामों के लिए उत्तरदायी भी होती है .

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जब पुलिस किसी शांतिपूर्ण आंदोलन में लाठी अश्रुग्यास या गोली चलाती है, या कोई नेता कभी अनैतिक कार्य करता है तो जनता के द्वारा विरोध का सामना करना पड़ता है और प्रशासन एवं नेताओ को उसके किये की सजा मिलती है. लेकिन जंगल में रहने वाले निरीह निमुखा प्राणी के ऊपर राज्य द्वारा दमन हो , उनके वासस्थान को उजाड़ा जाए , उनके घरौंदो को सरकार बर्वाद करे तो वह बेचारे किस तरह से अपना विरोध जताये ? उसको भगवान ने मनुष्य की तरह बोलने की शक्ति नहीं दिया, न तो उनका कोई राजनैतिक या सामाजिक संगठन है जो जा कर संसद में अपना विरोध दर्ज कराये तो क्या उनके हजारो साल पुराने वास स्थान को पल भर में तोड़ने का अधिकार राज्य के पास हो गया ? उन जानवरों का अधिकार सुनिश्चित कौन करे ? उन निमुखा जंतुओं की आवाज कौन बने ? उनका नेतृत्व कौन ले ? जीव जंतु भी सृष्टिचक्र के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना इंसान , पेड़ पौधा भी उतना ही महत्वपूर्ण हैं जितने इंसान, तो सचेत इंसान को ही उन पेड़ पौधों के लिए उन जानवरों के लिए बोलना होगा.

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नेपाल सरकार को जंगल उजाड़ कर हवाई अड्डा बनाने  का फरमान जारी करने से पहले एक बात सोचना चाहिए था कि जंगल में सिर्फ पेड़ नहीं है जिसे काट कर मैदान बना दो और बोईंग ३८० उतार दो ,निजगढ के  जिस जंगल को काट कर हवाई अड्डा बनाने का निर्णय हुअा है वह जंगल “पर्सा राष्ट्रिय निकुञ्ज” है , वहां दुर्लभ दांत वाले एशियाई हाथी, गैंडा , बाघ , भालू चितुवा , विभिन्न प्रजाति के बन्दर, विभिन्न प्रजाति के चिड़िया आदि का अनादि काल से वास स्थान के रूप में है . सरकार ने उस जंगल का करीब २५ लाख खड़े पेड़ काटने की अनुमति दे दी है जिसमे पहले चरण में ५ लाख पेड़ नेपाली सेना लगा कर काटा जाएगा . वातावरण विद के अनुसार अगर यह पेड़ काटे गए तो इस के लिए १ पेड़ के बदले २५ पेड़ लगाने होंगे और नेपाल सरकार ने कहा है कि वह एक के बदले २५ पेड़ अर्थ २५ लाख पेड़ के बदले ६ करोड़ २५ लाख पौधा लगा देगी. उसने यह भी कहा की यह पौधा उसी जंगल के ३०-४० हेक्टर जमीन में लगा देगा. आश्चर्य की बात है अगर इस अनुपात में पौधा लगा भी दिया तो एक धूर में ३००० पौधा लगेगा, सरकार की कितनी दूरदर्शिता है और सरकार के पास कैसे सलाहकार और विज्ञ बैठे हैं जो ऐसे ऐसे मनोविक्षिप्त सलाह देते हैं. चलो मान लिया की सरकार ने यह पौधा लगा भी दिया लेकिन क्या उन जंगली जानवरो के लिए वासस्थान देने का जिम्मेदारी सरकार लेगी ? का वर्षा जब कृषि सुखानी समय रहते सचेत हाेने की अावश्यकता है । जंगल बचाअाे जीवन बचाअाे वरना कल हमारी अाने वाली पीढियाें काे हम मरुस्थल ही देने वाले हैं ।

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