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मच गया कोहराम जब हुआ महाभारत के युद्ध में जोर का धमाका

 

आज से लगभग 5,300 वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था। उस दौरान गुरु द्रोण के पुत्र अश्‍वत्थामा ने भगवान कृष्ण के मना करने के बावजूद ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था जिसके चलते युद्ध क्षेत्र में इतना जोर का धमाका हुआ था कि गर्भ में पल रहे शिशुओं तक की मौत हो गई थे।

मोहन जोदड़ो में कुछ ऐसे कंकाल मिले थे जिसमें रेडिएशन का असर होने की बात कही जा रही थी। महाभारत में सौप्तिक पर्व के अध्याय 13 से 15 तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिए गए हैं। यह परिणाम ऐसे ही हैं जैसा कि वर्तमान में परमाणु अस्त्र छोड़े जाने के बाद घटित होते हैं।

महाभारत में इसका वर्णन मिलता है- ”तदस्त्रं प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमंडल संवृतम।।” ”सशब्द्म्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम। चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा।।” 8 ।। 10 ।।14।।- महाभारत
अर्थात : ब्रह्मास्त्र छोड़े जाने के बाद भयंकर वायु जोरदार तमाचे मारने लगी। सहस्रावधि उल्का आकाश से गिरने लगे। भूतमातरा को भयंकर महाभय उत्पन्न हो गया। आकाश में बड़ा शब्द हुआ। आकाश जलाने लगा पर्वत, अरण्य, वृक्षों के साथ पृथ्वी हिल गई।
अपने पिता के मारे जाने के बाद अश्चत्थामा बदले की आग में जल रहा था। उसने पांडवों का समूल नाश करने की प्रतिज्ञा ली और चुपके से पांडवों के शिविर में पहुंचा और कृपाचार्य तथा कृतवर्मा की सहायता से उसने पांडवों के बचे हुए वीर महारथियों को मार डाला। केवल यही नहीं, उसने पांडवों के पांचों पुत्रों के सिर भी काट डाले।
पुत्रों की हत्या से दुखी द्रौपदी विलाप करने लगी। अर्जुन ने जब यह भयंकर दृश्य देखा तो उसका भी दिल दहल गया। उसने अश्वत्थामा के सिर को काटने की प्रतिज्ञा ली। अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर अश्वत्थामा वहां से भाग निकला। भीम को जब यह पता चला तो वह अश्वत्‍थामा को मारने के लिए उसे ढूढंने निकल पड़े। उनके पीछे युधिष्ठिर भी निकल पड़े। बाद में श्रीकृष्ण और अर्जुन भी अपने रथ पर सवार होकर निकल पड़े।

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अश्‍वत्थामा उस वक्त धृत लगा कर कुश के वस्त्र पहनकर गंगा के तट पर बैठा था। वहां वेद व्यासजी के साथ अन्य ऋषि भी थे। भीम ने अश्वत्‍थामा को देखते ही तीर तान दिया और चेतावनी देने लगे। अश्‍वत्‍थामा ने भीम और उनके पीछे रथ पर सवार युधिष्ठिर, अर्जुन आदि को देखा तो वहां से भागने लगा।

श्रीकृष्ण को सारथी बनाकर अर्जुन ने उसका पीछा किया। अश्वत्थामा को कहीं भी सुरक्षा नहीं मिली तो अंत में उसने अर्जुन सहित सभी पांडवों पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। ब्रह्मास्त्र की उस अति प्रचंड तेजोमय अग्नि को अपनी ओर आता देख अर्जुन भयभी तहो गया और उसने श्रीकृष्ण से विनती की।

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श्रीकृष्ण बोले, ‘है अर्जुन! तुम्हारे भय से व्याकुल होकर अश्वत्थामा ने यह ब्रह्मास्त्र तुम पर छोड़ा है। इस ब्रह्मास्त्र से तुम्हारे प्राण घोर संकट में हैं। इससे बचने के लिए तुम्हें भी अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना होगा, क्योंकि अन्य किसी अस्त्र से इसका निवारण नहीं हो सकता।’

अश्वत्थामा ने पांडवों के नाश के लिए छोड़ा था और अर्जुन ने उसके ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के लिए छोड़ा था। दोनों द्वारा छोड़े गए इस ब्रह्मास्त्र के कारण लाखों लोगों की जान चली गई। इसका असर बढ़ता ही जा रहा था।
अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, प्रत्युत्तर में अर्जुन ने भी छोड़ा। इस दृष्य को देख ऋषि वेदव्यास आए और उन्होंने दोनों ही से अपने अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेना का अनुरोध किया। अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र आपस ले लिया लेकिन अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र को वापस लेना नहीं जानता था। अंत में उसे अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु की उसे याद आई। उसने वह ब्रह्मास्त्र उसी पर उतार दिया।
यह देखकर कृष्ण ने अश्वत्थामा से कहा- ‘उत्तरा को परीक्षित नामक बालक के जन्म का वर प्राप्त है। उसका पुत्र तो होगा ही। यदि तेरे शस्त्र-प्रयोग के कारण मृत हुआ तो भी मैं उसे जीवित कर दूंगा। वह भूमि का सम्राट होगा और तू? नीच अश्वत्थामा! तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ 3,000 वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध नि:सृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।’ वेद व्यास ने श्रीकृष्ण के वचनों का अनुमोदन किया।

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तब अश्वत्थामा ने कहा, ‘हे श्रीकृष्ण! यदि ऐसा ही है तो आप मुझे वह मनुष्यों में केवल व्यास मुनि के साथ रहने का वरदान दीजिए, क्योंकि मैं सिर्फ उनके साथ ही रहना चाहता हूं।’ जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी, जो कि उसे दैत्य, दानव, अस्त्र-शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी। वही मणि द्रौपदी ने मांगी थी।

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