“चुरिया वन जंगल तथा वातावरण बचाएँ” शीर्षक पर वृहत सभा का आयोजन

सभा में अपना विचार रखते हुए पर्सा जिला के चर्चित समाजसेवी प्रकाश थारू ने बताया कि चारकोसा जंगल के दक्षिणी भाग के थरुहट क्षेत्र में कृषक वर्ष के तीन बाली उपजाते आ रहे हैं लेकिन अनियंत्रित जंगल कटानी होने से पानी के श्रोत सूखने का खतरा बढ़ रहा है। पानी का सतह पिछ्ले कुछ साल में बहुत नीचे चले जाने से विमानस्थल निर्माण के लिये न्युनतम जितनी जमीन चाहिए केवल उतनी ही जमिन अधिग्रहण होनी चाहिए तथा आजकल प्रचारित विश्वका तीसरा सबसे बड़ा विमानस्थल बनानेकी धुन से विश्वके सामने हँसी के पात्र बनने की दिशा की ओर न जाने के लिये उड्डयन मंत्रालयको सुझाया।
उधर लालबकेया नदी के बगल में गाँव रहे समाजशास्त्री भरत शाह ने जानकारी दी कि चुरिया के अनियंत्रित दोहन से नदी की उँचाई खतरनाक गति से बढ़ रही है और हर साल बाढ़ आने का त्रास जनमानस में फैल रहा है। उन्होंने ये भी बताया कि यदि निजगढ़ एयरपोर्ट के लिये मिट्टी भरने के समय फिर से चुरिया पहाड़ काटा गया तो समस्या और विकराल हो जाएगी। साथ साथ उन्होंने विश्व के छोटे मगर एकदम कारगर रूप से बहुत अधिक यात्रियों को सेवा दे रहे लंदन के गैटविक, मुम्बई के क्षत्रपति शिवाजी, चीन के जियामेन इत्यादि जैसे कुशल और प्रभावकारी एयरपोर्ट से सीखने का सरकार को आग्रह किया। उन्होंने प्रश्न किया – “६७४ हेक्टेयर से ५ करोड़ यात्रीयों को सेवा दे सकने वाले गैटविक विमानस्थल से क्यों न सीखा जाए ? २ करोड़ यात्रियों को सेवा देने के लिये दो हज़ार हेक्टेयर जमीन की क्या आवश्यकता है?”
टांगिया बस्ती सरोकार समिति के अध्यक्ष रमेश सापकोटा ने कहा कि सरकार बस्ती स्थानांतरित करने के लिये मुआव्ज़ा वितरण में ढिला-सुस्ती कर रही है तथा विमानस्थल को बारा ज़िले से बाहर ले जाने के लिये शुरू हुए खेल को लेकर खबरदार किया। उनकी ये भी दलील थी कि सरकार चुरिया श्रिंखला के आसपास बसी जनता को समतल तराई में जबतक पुनर्वासित नही करती चुरिया में उत्खनन और सड़क निर्माण होता रहेगा जिससे मधेश की उर्वर खेतियोग्य जमीन का मरुभूमिकरण भी होता रहेगा।
निजगढ़के स्थानीय समाजसेवी कुमार लामा ने कहा कि निजगढ़ विमानस्थल छोटी बड़ी जैसी भी बने निजगढ़ से बाहर अन्यत्र ले जाने नही दिया जाएगा लेकिन पर्यावरणको खयाल में रखकर निर्माण कार्य आगे बढ़ाए पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी समय दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशको दान दे सकने की हैसियत रखने वाले हमारे देश की दुर्दशा बदलने वाली परियोजना के रूपमें निजगढ़ विमानस्थल को सभी को सहयोग करना चाहिए।

उसी तरह सामाजिक अभियन्ता सरोज राय के अनुसार जंगल कटानी की भरपाई स्वरूप जितनी भी गाछ रोपी जाए वो जंगल नही बन सकती, बल्कि वो महज़ एक बगिचा बन सकता है। उन्होंने कहा कि पौधे रोपे जा सकते हैं लेकिन दुर्लभ जंगली जानवर का बासस्थल काेई बगीचा नही हो सकता। सरकार ने इस परियोजना से सम्बन्धित कोई भी दस्तावेज सार्वजनिक नही की है जिससे सरकार की हड़बड़ाहट पर शंका होता है। उन्होंने साफ़ किया कि विमानस्थल की सम्भाव्यता २५ वर्ष पहले हुइ थी और आज की परिस्थिति व प्रविधि बहुत बदल चुकी है। उस समय निजगढ़ एवं सिमरा छोटे गाँव थें और अध्ययन ने इन दोनो शहरों के विकसित हो जाने का अनुमान नही लगाया था जिससे उसने इन दोनो शहरों को बाइपास करके नयाँ एयरपोर्ट शहर बनाने की सुझाव सिफारिश की है। इस पुराने घिसे पिटे रिपोर्ट की अब महत्व नही रही तथा यह बेकार हो चुकी है, विमानस्थल सम्बन्ध में एक नया अध्ययन किया जाना चाहिए।
कार्यक्रम का समापन करते हुए चुरिया मधेश विकास मंच के अध्यक्ष सुनिल यादव ने कहा कि अब तराई-मधेश के सब समुदायों को मिलकर वन जंगल और चुरिया संरक्षण के लिये हाथ से हाथ मिलाकर आगे बढ़ने का और कोई विकल्प नही। चुरिया के अव्यवस्थित उत्खनन तथा सड़क निर्माण में सरकार की हस्तक्षेपकारी भूमिका निर्वाह करने का समय आ चुका है तथा कठोर नियमनकारी विभाग संचालन करने की बात पर भी उन्होंने ज़ोर दिया।

सोमवार सांझ को समापन हुए कार्यक्रम में मंचके उपाध्यक्ष रामाधार यादव, प्रवक्ता राजेश भण्डारी, सचिव लक्ष्मी सिंह, पर्सा अध्यक्ष रॉकी झा, बारा अध्यक्ष लक्ष्मी यादव, रौतहट अध्यक्ष लक्ष्मण साह, सर्लाही अध्यक्ष संजय साह, केन्द्रीय सदस्य पन्नालाल पटेल, सूरज गुप्ता, अरविन्द यादव, कोषाध्यक्ष कृष्णाउति देवी साह तथा तराई मधेश राष्ट्रीय परिषद के सदस्य शशी यादव इत्यादि लोगों की उपस्थिति रही।



