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व्यग्ंय( बिम्मीकालिंदीशर्मा


नेपाल के सन्दर्भ में नागरिकता वह शै है जिसके लिए ईंसान अपना सब कुछ लुटाने के लिए तैयार रहता है । किसी को नागरिकता मिल जाती है तो वह ऐसे खुश होता है जैसे कुबेर का खजाना पा लिया हो । जो जिस देश में जन्मा या पैदा हुआ तो वह स्वत उस देश का नागरिक हो जाता है पर नेपाल में सिद्ध करना पडता है कि वह यहीं पैदा हुआ था । इस के लिए उस को अपने माता, पिता की नागरिकता दिखा कर यहां का वंशज सावित करना पडता है । अगर मां, बाप की पैदाईश इस देश की नहीं है तो बेचारे को नेता से ले कर सत्ता के गलियारे तक पापड़ बेलना पड़ता है तब भी नागरिकता मिल जाए तो गनीमत है । मिल भी गयी तो बेचारा अंगीकृत ही कहलाएगा ।
नेपाल में जितना नागरिकता बवाल और घोटाला और किसी देश में नहीं है । नागरिकता न हुआ जीवन, मरण का सवाल हो गया हो जैसे । मां, बाप बच्चे को पैदा करते हैं पर वह उस बच्चे के माथे पर अपना नाम ट्याग कर के नहीं चलते कि यह मेरा ही बच्चा है कह कर । पर इस देश का कानून तो माशाल्लाह नागरिकता को बपौती समझता है इसी लिए पहाड़ी और मधेशी के हक में अलग, अलग फैसला करता है । वह पहाडियों के साथ तो नागरिकता के मामले में अपना जैसा व्यवहार करता है पर मधेशियों के साथ सौतेले से भी बुरा बर्ताव करता है । कानून को लगता है कि हर मधेशी और काला ईसान दक्षिण से आयातित है । मधेशी का यहां पर कोई जड़ ही नहीं है इसी लिए वह वशंज नागरिकता का अधिकारी नहीं हो सकता । अगींकृत नागरिकता ले कर दूसरे दर्जे का नागरिक बन कर एक कोने में बैठे रहे और राज्य द्धारा अपने नागरिक को प्रदान किए जाने वाले सारे अधिकारों से वंचित रहे । क्योंकि नागरिकता पर पहाडि़या खस तंत्र सांप की तरह कुडंली मार कर बैठा है ।
पहाडि़या सोच के मुताबिक ज्यादातर मधेशी दक्षिण से आयातित है और उन्हे नागरिकता देने का मतलब यह देश मामा घर बन जाएगा । और दक्षिण से रेडिमेड भांजा, भांजी आकर यहां मौज करेगें । शासकों पर यही डर कि मानसिकता हावी है इसी लिए जहां मधेशी या काला ईसान दिखा नहीं कि उस का सिर से पावं तक मुआयना कर के अनेक प्रश्नों से जांच, पडताल करते है जैसे कि वह ईसान कोई छूत का मरीज है । समझ में नहीं आता कि ईस देश में अब क्या आकर्षण बचा है कि कोई विदेशी अपना देश त्याग कर यहां की नागरिकता लेगा ? देश के गिरती साख के कारण ही यहां के लाखों नागरिक विदेशों में रोजगारी के बहाने से वहीं सेटल हो रहे हैं और किस विदेशी को पागलकुत्ते ने काटा है जो यहां की नागरिकता लेगा ? देश का यही खस्ता हाल बना रहा तो ऐसा दिन भी दूर नहीं कि लोग यहां की नागरिकता और देश दोनों त्याग कर सगर्व विदेश में हमेशा के लिए बस जाए ।
महंगाई हद से ज्यादा, कर के मार से देश के नागरिक की रीढ की हड्डी ही चरमरा गई है । असुविधाऔर असुरक्षा इतनी ज्यादा है कि लोग घर से निकलने में डरते हैं । सुबह अच्छा, भला घर से निकला इंसान शामको घर लौटेगा भी की नहीं मन में सशंय बना रहता है । देश की सड़क की हालत उतनी ही खस्ता है । लगता है सडक खुद आर्यघाट जाने के लिए कब्र में पाँव लटकाए बैठा है । गंदगी उतनी ही है । चारों तरफ व्याप्त अव्यस्था देश कर यहीं पैदा हुआ ईसान भी कब यहां से भागे जैसा सोच रखता है । और भय के ऐसे माहौल में कौन इस देश का नागरिक बन कर या नागरिकता ले कर अपने पांव मे कुल्हाडी मारेगा ? नागरिकता एक ऐसा ईश्यू है जिसे भजा कर खस शासक अपना शासन निशकटंक करना चाहते हैं । इसी लिए कब्र में सो चूके भूत को जगाने जैसा काम करते है यह नागरिकता के विवाद को समय, समय में उछाल कर । इस देश के शासक ऐसे मनोग्रंथी से पीडि़त है जिसे नागरिकता मेनिया कहा जाता है । इन्हे लगता है बस वही इस देश के नागरिक है और राज करने का अधिकार भी बस उनका हैं । शासनतंत्र में यही दंभ के कारण ही जो एक सामान्य परिचयपत्र है देश के हर नागरिक का । जिस को असामान्य समस्या बना कर शासक देश के नागरिक को उल्लू बना रही है । और नागरिक भी तमाशे में मदारी का खेल देख कर ताली बजाने वाले तमाशबीन जैसा ही व्यवहार कर के नागरिकता को इतना महत्व दे रही है कि जैसे वह न मिला तो मर ही जाएगा । इस देश के नागरिकों के लिए अक्सिजन या प्राणवायु से ज्यादा जरुरी है नागरिकता ।

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