हर इक शब हर घडी गुज़रे क़यामत यूं तो होता है मगर हर सुबह हो रोज़े-जज़ा, ऐसे नहीं होता : फैज

अवाम के शायर फैज अहमद फैज का नाम उर्दू कविता और शायरी में बड़े ही अदब से लिया जाता है. उनका जन्म 13 फरवरी 1911 को क़स्बा काला क़ादिर सियालकोट (पंजाब) में हुआ था. उनकी शायरी उर्दू के मशहूर शायरों मीर, ग़ालिब, इकबाल, जोश और फिराक की तरह भारत ही नहीं पूरी दुनिया में लोकप्रिय है.
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़ुबां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले
“आपकी याद आती रही रात-भर”
चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर
गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर
कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन[2]
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर
फिर सबा[3] सायः-ए-शाख़े-गुल[4] के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर
जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर[5]
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर
एक उमीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर
मास्को, सितंबर, 1978
- ऊपर जायें↑ उर्दू के मशहूर कवि, जिन्होंने तेलंगाना आंदोलन में हिस्सा लिया था। उनकी ग़ज़ल से प्रेरित होकर ही ’फ़ैज़’ ने यह ग़ज़ल लिखी है
- ऊपर जायें↑ वस्त्र
- ऊपर जायें↑ ठंडी हवा
- ऊपर जायें↑ गुलाब की टहनी की छाया
- ऊपर जायें↑ दरवाज़े कि साँकल
सितम सिखलायेगा रस्मे-वफा, ऐसे नहीं होता
सनम दिखलायेंगे राहे-खुदा, ऐसे नहीं होता
गिनो सब हसरतें, जो खूं हुई हैं तन के मक़तल में
मेरे क़ातिल हिसाबे-खूबहां, ऐसे नहीं होता
जहाने-दिल मे काम आती हैं, तद्बीरें न ताजीरें
यहां पैमाने-तस्लीमो-रज़ा, ऐसे नहीं होता
हर इक शब हर घडी गुज़रे क़यामत यूं तो होता है
मगर हर सुबह हो रोज़े-जज़ा, ऐसे नहीं होता
रवां है नब्ज़े-दौरां, गर्दिशों मे आसमां सारे
जो तुम कहते हो सब कुछ हो चुका, ऐसे नहीं होता
तेरी सूरत जो दिलनशीं की है
आशना शक्ल हर हसीं की है
हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हमने आतशीं की है
सुबहे-गुल हो की शामे-मैख़ाना
मदह उस रू-ए-नाज़नीं की है
शैख़ से बे-हिरास मिलते हैं
हमने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्रे-दोज़ख़, बयाने-हूरो-कुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क़ तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूं से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानें हरम के सहल-पसन्द
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है
फ़ैज़ औजे-ख़याल से हमने
आसमां सिन्ध की ज़मीं की है

