मेरे जीने का तौर कुछ भी नहीं साँस चलती है और कुछ भी नहीं : नूर नारवी
अलहदा शायर ‘नूह नारवी’दाइश नारा (इलाहाबाद के निकट एक छोटा सा शहर) के एक जागीरदार मौलवी अब्दुल मज़ीद के यहां 18 सितंबर 1879 ईं में हुई लेकिन मुश्किल से 4 साल के भी नहीं हुए थे कि पिता का साया सर से उट गया । पिता की अचानक मौत और तीन सौतेली माओं की मुसलसल शत्रुता ने जागीर को मुशीबतों का गहवारा बना दिया। और उनकी शिक्षा इसकी शिकार रही। उन्होंने अपनी साहित्य यात्रा का आरम्भ गद्य से किया था। कुछ समय बाद नूह साहब पाबंदी से शेर कहने के आदी हो गये, यह वक़्त संध्या और रात की नमाज के बीच में होता था। नूह साहब की शायरी में दाग़ की ज़बान की सरलता और रोज़मर्रा के शब्दों के प्रयोग, ख़ास है।
दिल हमारी तरफ़ से साफ़ करो
जो हुआ सो हुआ मुआफ़ करो
मुझ से कहती है उस की शान-ए-करम
तुम गुनाहों का ए‘तिराफ़ करो
हुस्न उन को ये राय देता है
काम उम्मीद के ख़िलाफ़ करो
हज़रत-ए-दिल यही है दैर ओ हरम
ख़ाना-ए-यार का तवाफ़ करो
तूर-ए-सीना की सम्त जाएँ कलीम
‘नूह’ तुम सैर-ए-कौह-ए-क़ाफ़ करो
मेरे जीने का तौर कुछ भी नहीं
साँस चलती है और कुछ भी नहीं
दिल लगा कर फँसे हम आफ़त में
बात इतनी है और कुछ भी नहीं
आप हैं आप आप सब कुछ हैं
और मैं और और कुछ भी नहीं
हम अगर हैं तो झेल डालेंगे
दिल अगर है तो जौर कुछ भी नहीं
शेर लिखते हैं शेर पढ़ते हैं
‘नूह’ मैं वस्फ़ और कुछ भी नहीं
ये मतलब है कि मुज़्तर ही रहूँ मैं बज़्म-ए-क़ातिल में
तड़पता लोटता दाख़िल हुआ आदाब-ए-महफ़िल में
असर कुछ आप ने देखा मारे जज़्ब-ए-कामिल का
उधर छोटे कमाँ से और इधर तीर आ गए दिल में
इलाही किस से पूछें हाल हम ग़ोर-ए-ग़रीबाँ का
कि सारे अहल-ए-महफ़िल चुप हैं उस ख़ामोश महफ़िल में
इधर आ कर ज़रा आँखों में आँखें डालने वाले
वो लटका तो बता दे जिस से दिल हम डाल दें दिल में
बदल दे इस तरह ऐ चर्ख़ हुस्न ओ इश्क़ का मंज़र
पस-ए-महफिल हो लैला क़िस हो लैला के महमिल में
बँधे शर्त-ए-वफ़ा क्यूँकर निभे रस्म-ए-वफ़ा क्यूँकर
यहाँ कुछ और है दिल में वहाँ कुछ और है दिल में
हमारे दिल की दुनिया रह गई ज़ेर-ओ-ज़बर हो कर
क़यामत ढा गया ज़ानू बदलना उन का महफ़िल में
ये क्या अंधेर है कैसा ग़ज़ब है क्या तमाशा है
मिटाओ भी उसी दिल को रहो भी तुम उसी दिल में
तमाशा हम भी देखें डूब कर बहर-ए-मोहब्बत का
अपाहिज की तरह बैठे हैं क्या आग़ोश-ए-साहिल में
तरीक़ा इस से आसाँ और क्या है घर बनाने का
मिरे आग़ोश में आ कर जगह कर लीजिए दिल में
बढ़ा ऐ ‘नूह’ जब तूफ़ान दरिया-ए-हवादिस का
तो ग़ोते वर्त-ए-ग़म ने दे दिए अफ़्कार-ए-साहिल में

