अंदर झाँकने से पता चलता है कि अदालत और सरकार की मिली भगत है : जयप्रकाश आनन्द
नेपाल में विद्यमान सेटिंग न्याय प्रणाली

सिके राउत अलग मधेश राष्ट्र की मांग का परित्याग करते हुये सम्भवत मूलधार कहलाने वाले दलीय प्रतिस्पद्र्धा की राजनीति में आने की घोषणा की है । सिके के इस निर्णय को स्वागत करने वालों की कतार में मेरा भी स्वागत है । विभिन्न परिस्थितिगत कारण से पृथक मधेश राष्ट्र का मांग उचित नहीं है । मैंने विभिन्न संदर्भो तथा सिके से मिलने के उपरान्त भी यही कहा कि सिके को इस मांग का परित्याग करना ही होगा ।
इस प्रसंग से कुछ विचारणीय प्रसंगों का जन्म हुआ है ः न्यायालय के संबन्ध में । इसबार की गिरफ्तारी के क्रम में रौतहट जिला अदालत ने सिके को कब्जे में रखकर पुष्टि करने का आदेश दिया था । सिके राउत के तरफ से उसके रिस्तेदारों ने उस गिरफ्तारीके बिरुद्ध सर्वोच्च अदालत में बन्दी प्रत्यक्षीकरण का रिट दायर किया था । महीनों के बाद सर्वोच्च अदालत ने मुद्दा को जीवित रखकर रौतहट जिला के आदेश को ही मान्यता दिया था तथा सिके को जेल में ही रखा गया ।
आज का परिदृश्य तो देखिये ः अनायास सर्वोच्च अदालत ने पेशी सुनिश्चित करके सिके को रिहा करने का आदेश दिया है । पूर्वनियोजित रुप में कुछेक घंटा के अंदर प्रधानमंत्री के साथ सिके का संयुक्त संभाषण हुआ है । इस संबंध में अनेकों चर्चा होने वाला है । परन्तु यह विषय पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि अद्यावधि नेपाल में अदालत और सरकार की सेटिंग कायम नहीं है क्या ?
अदालत द्वारा रिहाई का आदेश देना और बहुतों के लिये सर दर्द का विषय रहे सिके का पृथकतावादी विचार जिसका परित्याग आम जनता के लिये रोचक विषय होने के बाबजूद भी अदालत के अंदर झांक कर देखने से पता चलता है कि अदालत और सरकार की मिली भगत है । इससे राजनीति प्रकृति के मुद्दे वा राजनीतिक व्यक्ति लक्षित मुद्दे में स्वविवेकीय न्याय सम्पादन पद्धति अर्थात जनमत से प्रभावित न्याय निरुपण व्यवस्था ही है वह फिर से पुष्टि नहीं हुआ ।
(जयप्रकाश आनन्द के वाल से)

