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पिके हो या सिके सब राजनीति के मैदान मे हैं बिके : बिम्मी शर्मा (व्यंग्य)

 

बिम्मी शर्मा (व्यंग्य) | पिके गिर पडे और सिके उठ पडे । राजनीति में यही होता है और हमेशा यही होता रहेगा । शेयर के भाव की तरह नेताओं का भाव भी गिरता और उठता है । १० साल पहले पिके की जो कीमत थी वह गिरते गिरते औने पौने भाव में आ गया है । अब सिके की कीमत राजनीति के बजार में किसी बड़ी मल्टि नेशनल कंपनी के शेयर से भी ज्यादा है । कुछ साल बाद सिके कि कीमत भी पिके जैसी ही हो जाएगी । गोभी जब बाजार में नयां और ताजा आता है तो बहुत महंगी होती है । सभी गोभी को देख कर ललचाने लगते है । पर वही गोभी सुबह, शाम खाते खाते बासी और पुराना हो जाता है । सभी उसी गोभी को देख कर नाक, मूंह सिकोडने लगते है और खाने से बचना चाहते है । अभी सिके भी बाजार मे ताजा ताजा आए हुए गोभी या सहजन कि मानिंद हैं । सभी उन्हे हाथो हाथं ले रहे है । अलग मधेश देश या स्वतंत्र मधेश की वकालत करते करते सिके खुद केपी ओली नाम के न्यायाधीश के हाथ के फाईल बन गए । जिस फाईल को मधेश के और चुहे द्धारा कुतरने से बचाने के लिए किसी महत्वपूर्ण मंत्रालय में घूसा कर छूपा देना चाहते है । मधेश अब स्वतंत्र होगा कि नहीं यह तो भविष्य ही बताएगा । पर चतुर शिकारी या व्याधा कि तरह केपी ओली सिके को तोता बना कर अपने पिजंडे में ले ही आए । पिछले साल ईसी तरह पिके एंड कपंनी को भी ओली नें अपने नेकपा एमाले नामक पिजंडे मे. कैद कर लिया है । तब से बेचारे पिके उडने के लिए फडफडा रहे हैं पर उड नहीं पा रहे है । बेचारे उड कैसे पाएगें ओली महाशय ने राजनीति के कैंची से पखं जो कुतर दिए हैं । अब उस पर तुर्रा यह कि प्रचंड पहले कि तरह दहाड भी नहीं पाते । सिके से हाथ मिला कर या उन को अपने दल में समाहित कर के ओली ने प्रचंड को चुपके से यह ईशारा कर दिया है कि अब आप काम न काज के दुश्मन अनाज के हो गए हैं । आप का समय खत्म हो गया है, आप राजनीतिक के बिसात पर आउट डेटेड गोटी हो गए है । और सब से मजेदार बात यह कर दी ओली ने कि पिके कि तुलना सिके से और सिके कि तुलना पिके से कर के दोनों को आईना दिखा दी है । और यह अनकहा संदेश दे दिया है कि मेरे आग तुम दोनों अभी राजनीति के मैदान के कच्चे खिलाडी हो । मैं तुम सब के बाप का भी बाप हूं । तुम दोनों को मैंने साईज मे ला दिया है , अब अपने साईज में बैठ कर कथित देशप्रेम और राष्ट्रवाद का माला जपते रहो ।

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अब बेचारे सिके अलग मधेश का नारा पहले कि तरह लगा कर दहाड भी नहीं पाएगें । क्यों कि सिके नाम के शेर को पिजडे में बदं कर उस के नाखुन और दांत को तोड दिया है । अब सिके भी ओली कि तरह राष्ट्रवाद का माला जपते हुए किसी महत्वपूर्ण मंत्रालय में मंत्री कि कुर्सी पर बैठ कर मलाई खाएगें और पिठठूओं को भी खिलाएगें । जिस पिके को ओली के हनुमान फूटी आंख से भी देख नहीं पाते थे अब उसी सिके को हाथ में लिए घूम रहे हैं और उस का बचाव कर रहे हैं । ओली के आदेश पर उन के हनुमान सिके कि आरती भी करें औंर भजन भी गाने लगे तो कोई आश्चर्य कि बात नहीं होगी । राजनीति का दस्तूर है अपनी पार्टी या सामियाने पर आते ही दुश्मन भी दोस्त बन जाता है । केपी ओली तो राजनीति के पहुंचे हुए उस्ताद हैं । पर ईसी उस्ताद ने उस्तरा लगा कर पिके और सिके को चारों औंर से ईस तरह से मूड दिया कि पिके और सिके न शीर ढंक कर रख सकते हैं और न दिखा सकते हैं । मधेश अलगाव बाद के मास्टर खिलाडी कह कर सभी सिके को मानते या चिढाते थे । नासा के वैज्ञानिक की उनकी छवी कहीं धूल धुसरित हो गयी थी । यह कोई नहीं जानता या जानना नहीं चाहता कि मधेशी और काले वर्ण का होने का कितना बडा दर्द और जिल्लत सिके ने सही है । अभी जिस सिके को विखडंनकारी कह कर सबोधित किया जाता है । उस समय उन्होने ईसी देश के शासक और अन्य के द्धारा जो विभेद और असमानता का जहर पिया था शायद वह अभी भी हलाहल बन कर उन के कठं मे अटका ही होगा ? सिके भी शायद अपने उठाए हुए मुद्धे से थक हार चूके हैं । ईसी लिए सुस्ताने के लिए केपी ओली नाम के माली के बगिचे में पनाह ले ली है । पर सौ बात कि एक बात यह है कि राजनीति के मैदान पर सभी ने अपना मूल्य तोक रखा है । जैसे बिहार के सौराठ सभा में दूल्हे का हाट लगता है और उस में सहभागि सभी अपनी, अपनी हैसियत के अनुसार दुल्हे कि बोली लगाते है । राजनीति के मैदान पर ओली द्धारा आयोजित सौराठ सभा मे पिछले साल नेकपा एमाओवादी की बोली लगी थी और पिके दुल्हे के रुप में और उनकी पार्टी बराती के रुप में बोली लगा कर नेकपा एमाले में प्रवेश कर गए थे । ठीक उसी तरह अब सिके की बोली लगी है और वह वीधिवत रुप में एमाले के कारिंदा बन गए हैं । पिके हो या सिके सब राजनीति के मैदान में हैं बिके । पिके का नशा उतर चूका होगा अब कुछ महिनों बाद सिके का नशा भी उतर जाएगा ।

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