Mon. Aug 10th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

उनसे जो कहने गए थे ‘फ़ैज़’ जाँ सदक़ा किए अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद :फ़ैज

 

फ़ैज अहमद फ़ैज का शुमार एशिया के महानतम कवियों में किया जाता है। वे विचारों से साम्यवादी थे और पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे। प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के पुरोधाओं में एक, फ़ैज ने पंजाब में प्रगतिशील लेखक संगठन की शाखा (1936) स्थापित की। वे सूफी परंपरा से भी प्रभावित थे, जिसकी झलक उनकी गजलों और नज्मों में मिलती है। कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद वे सेना में भर्ती हुए। 1947 में उन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से इस्तीफा दिया और पाकिस्तान चले गए। अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ फ़ैज की शायरी हमेशा मुखरित होती रही, जिसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा और कई वर्षों तक निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। फ़ैज अहमद फ़ैज की शायरी का अनुवाद हिंदी, रूसी, अंग्रेजी आदि कई भाषाओं में हो चुका है।

Image result for images of faiz ahmed faiz

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग

मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा

यह भी पढें   महेश बस्नेत ने प्रधानमंत्री को दी नसीहत, कहा—राजनीति भावनात्मक पोस्ट से नहीं, काम और परिणाम से चलती है

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे!
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग

 

रंग है दिल का मेरे 

तुम न आए थे तो हर चीज़ वही थी कि जो है
आसमाँ हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
और अब शीशा-ए-मय, राहगुज़र, रंगे-फ़लक
रंग है दिल का मेरे “ख़ून-ए-जिगर होने तक”
चंपई रंग कभी, राहते-दीदार का रंग
सुरमई रंग की है सा’अते-बेज़ार का रंग
ज़र्द पत्तों का, खस-ओ-ख़ार का रंग
सुर्ख़ फूलों का, दहकते हुए गुलज़ार का रंग
ज़हर का रंग, लहू-रंग, शबे-तार का रंग
आसमाँ, राहगुज़र, शीशा-ए-मय
कोई भीगा हुआ दामन, कोई दुखती हुई रग
कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आईना है
अब जो आए हो तो ठहरो कि कोई रंग, कोई रुत, कोई शै
एक जगह पर ठहरे
फिर से इक बार हर इक चीज़ वही हो कि जो है
आसमाँ हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
(मॉस्को, अगस्त 1963)

यह भी पढें   प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह और भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव बीच मुलाकात

अब कहाँ रस्म घर लुटाने की

अब कहाँ रस्म घर लुटाने की
बरकतें थीं शराबख़ाने की
कौन है जिससे गुफ़्तगू कीजे
जान देने की दिल लगाने की
बात छेड़ी तो उठ गई महफ़िल
उनसे जो बात थी बताने की

साज़ उठाया तो थम गया ग़म-ए-दिल
रह गई आरज़ू सुनाने की
चाँद फिर आज भी नहीं निकला
कितनी हसरत थी उनके आने की

अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सबकी ज़ुबाँ ठहरी है

अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सबकी ज़ुबाँ ठहरी है
जो भी चल निकली है, वो बात कहाँ ठहरी है
आज तक शैख़ के इकराम में जो शै थी हराम
अब वही दुश्मने-दीं राहते-जाँ ठहरी है
है ख़बर गर्म के फिरता है गुरेज़ाँ नासेह
गुफ़्तगू आज सरे-कू-ए-बुताँ ठहरी है
है वही आरिज़े-लैला, वही शीरीं का दहन
निगाहे-शौक़ घड़ी भर को जहाँ ठहरी है
वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबुक गुज़री थी
हिज्र की शब है तो क्या सख़्त गराँ ठहरी है
बिखरी एक बार तो हाथ आई है कब मौजे-शमीम
दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है
दस्ते-सय्याद भी आजिज़ है कफ़-ए-गुलचीं भी
बू-ए-गुल ठहरी न बुलबुल की ज़बाँ ठहरी है
आते आते यूँ ही दम भर को रुकी होगी बहार
जाते जाते यूँ ही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है
हमने जो तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ की है क़फ़स में ईजाद
‘फ़ैज़’ गुलशन में वो तर्ज़-ए-बयाँ ठहरी है

यह भी पढें   भारत और नेपाल के विकास सहयोग: काभ्रेपलांचोक में दो नए विद्यालय भवनों की आधारशिला रखी गई

( मॉस्को अगस्त 1963)

तेरी सूरत जो दिलनशीं की है

तेरी सूरत जो दिलनशीं की है
आशना शक्ल हर हसीं की है
हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हमने आतशीं की है
सुबहे-गुल हो कि शामे-मैख़ाना
मदह उस रू-ए-नाज़नीं की है
शैख़ से बे-हिरास मिलते हैं
हमने तौबा अभी नहीं की है
ज़िक्रे-दोज़ख़, बयाने-हूर-ओ-कुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है
अश्क़ तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है
कैसे मानें हरम के सहल-पसंद
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है
‘फ़ैज़’ औजे-ख़याल से हमने
आसमाँ सिंध की ज़मीं की है

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com