Sun. Aug 9th, 2020

दहेज का दानव अमृत पीकर आया है

.बिम्मी शर्मा

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अपनी नाजो से पाली पोसी हुई बेटी को एक अजनवी के साथ शादी भी कर दो और उस पर दहेज भी दो । दहेज न दो तो ससुराल नाम के कसाई उस का जीना दूभर कर देगें । ससुराल वाले अपनी बेटी के लिए जितने नरम होते हैं दूसरे की बेटी के लिए उतने ही गरम । हमेशा हाथ मे. गणासी लिए खडे रहेगें बहू का सिर छेदन करने के लिए । पहले दहेज न लाने पर मिट्टी का तेल या तेजाब डाल कर जलाया जाता था पर अब तो वह भी नहीं है । तेजाब को निषेध कर दिया गया और मिट्टी का तेल महंगा हो गया । अब तो हाथ, पैर चला कर ही एक औरत को मारा जा सकता है तो उस को जलाने की भी जरुरत नहीं है । कितना क्रुर हो गया है समाज जहां एक औरत पैदा भी बमुश्किल से होती है और पैदा हो कर बच भी गयी तो दहेज नाम का राक्षस उस को सुरसा की तरह निगल जाता है । दहेज तो बाद में राक्षस बन कर आता है एक औरत की जिदंगी में। इस से पहले तो लडकी के अपने मां, बाप ही उस का पालन पोषण पराया धन मान कर करते है । भविष्य में उस के लिए अच्छे घर, वर के लिए बचपन से ही जुगाड करना शुरु कर देते हैं । बेटा, बेटी में भेदभाव करने वाले मां बाप कैसे सोच सकते हैं कि उनकी बेटी को अच्छा घर, वर मिलेगा । जहाँ खुद ही बेटा को कोर्डिगं स्कुूल और बेटी को सरकारी स्कूल में पढाते हैं । बेटा को दूध और मलाई और बेटी को सूखी रोटी खिला कर पालने वाले मां बाप कैसे अपनी बेटी के सुखद भविष्य की आशा कर सकते हैं । जब कि जग में ही खोट है तब उस में खडा होने वाला ईमारत मजबूत कैसे हो सकता है ? बेटी को उस के हरेक ईच्छा के तडपाने वाले मां, बाप उसकी शादी लडके वालो की ईच्छा के अनुसार दहेज दे कर उन की पैसे कि भूख को और बढा देते हैं ? जिस बेटी की शादी में लाखों खर्च करते हैं उसकी परवरिश और पढाई मे वहीं पैसा खर्च करते तो कम से कम उसका भविष्य बनता । वह समाज में मुहं उठा कर आत्म सम्मान के साथ जीती । पति नाम के दहेज के किसी भूखे भेडिए के भूख का शिकार तो नहीं होती । पर नहीं मां, बाप को अपनी बेटी का हात पीले करना है चाहे जैसे भी हो चाहे बेटी कि दहेज से पीलिया ग्रस्त हो जाए । दहेज तो लडके वाले मांगते हैं अपने कथित योग्य बेटे के लिए । पर क्या इस दहेज नाम के रोग से लडकी वाले अछूत हैं ? वह भी तो जब मौका आता है अपने बेटों की शादी में बढ, चढ कर दहेज लेते ही हैं ? वह भी अपनी बहुओं को दहेज या अन्य किसी बहाने से परेशान करते ही हैं । दहेज के लिए सिर्फ एक ही पक्ष कभी दोषी नहीं होता । अपनी बेटी को तो अच्छी शिक्षदिक्षा दे कर योग्य नहीं बनाते पर उसके लिए लडका एकदा योग्य खोजते हैं । वह भी डाक्टर, ईन्जिनियर या सिए पढा लिखा लडका । अब लडके वाले तो अपने बेटे को सब्जी या बकरी की तरह शादी के हाट में बेचने के लिए रखते ही हैं । उन का वश चले तो अपने कथित योग्य बेटे को शेयर बजार में सूचीवद्ध कर दें ताकि उसका बजार भाव न घटे बस बढता ही जाए । इन मां, बाप के लिए अपना पढालिखा सर्वगूण सम्पन्न बेटा करोडों रुपए का ब्लाइंड चेक है जिसे शादी के बाजार में भुनाने के लिए उत्तावले रहते हैं । बेटा भी शादी या दहेज के मामले में श्रवण कुमार बन जाता है । भले ही अन्य मामलों में मां, बाप के आज्ञा का उलघंन वह बडे ही शान से करता हो । क्यों कोई बेटी या उसके मां, बाप जब लडके वाले शादी के लिए दहेज की मांग करते है तब क्यों नहीं कहते कि आप का बेटा अपाहिज है क्या जो दूसरे की बेटी के साथ ही पैसे भी मागंते हो ? यदि आपको सच में दहेज में मन माफिक पैसे चाहिए तो हम पैसे देने के लिए तैयार हैं बस आप के बेटे का हात, पाँव काट कर दहेज के बदले में हमें दे दीजिए । जब अपना हाथ, पैर योग्यता होते हुए भी दूसरों को ही पैसे में ही जिदंगी बसर करनी है तो वह लकडी जैसा हाथ, पैर रख कर क्या फायदा ? उसको काट कर लडकी वालों को दे दो कम से कम वह यह कह कर अपने मन को समझाएगें कि लडका अपाहिज है । लडके के मातापिता कहते हैं कि हमने बेटे की पढाई में इतना पैसा खर्च किया था । अब दहेज के रुप में उसी का भूगतान चाहते हैं । तब किसने कहा था आप को अपने बेटों को पढा लिखा कर योग्य बनाने के लिए । क्या योग्यता के नाम पर उसको हाट में बिक्री करने और कसाई जैसा बनाने के लिए पढाया था । जब आप अपने ही बेटे का मोलतोल करते हैं तो आप ईंसान कहलाने लायक तो नहीं हैं ? इस से अच्छा होता आप बेटे को उस के बचपन में ही बेच देते ? दहेज नाम का जहर का वृक्ष समाज और देश में पनपने के लिए सिर्फ लडके वाले ही दोषी नहीं है । लडकी वालों की पुरातन सोच जो अपनी ही बेटी को पराया धन मान कर पालते है और कन्यादान कर के पूण्य कमाने कि सोच रखते है ? जब दहेज देकर ही बेटी की शादी करनी है तो क्नयादान या पूत्रीदान क्यों ? जिस घर में व्याह कर के जाने वाली है उन के ही बेटे को दहेज के नाम पर खरीद कर लडके के मां, बाप से अपने बेटे का पुत्रदान करने के लिए क्यों नही कहते ? कभी पुत्रदान कर के अपने बेटे को जिदंगी भर के लिए उसकी पत्नी के घर या ससुराल में रहना पडे तब पता चलेगा दूसरे की बेटी का दर्द । अभी भी अपवाद के रुप में घर जमाई रहते ही हैं । पर उसको हेय मान कर हंसी उडाते हैं। अब गभींर हो कर सोचने और पुत्रदान करने का वक्त आ गया है । तभी सभी की बेटियां सुरक्षित रहेगीं और दहेज नाम का राक्षस भी हमेशा के लिए मारा जाएगा । पति कि पिटाई से घायल हो कर मृत्यु वरण् करने वाली वीरगंज निवासी सुनिता यादव का डाक्टर पति जो एक तरह से डाकु ही था । अपनी पत्नी को मायके से पैसे लाने के लिए उसको मारता, पीटता था । क्या सिर्फ वही दोषी है ? सुनिता कें मां, बाप जिन्होने अपनी बेटी को पढा लिखा कर सक्षम नहीं बनाया पर बेटी के लिए दामाद ढूंढा वह भी डाक्टर । यदि सुनिता की शादी के लिए खर्च हुए पैसे उसकी शिक्षादिक्षा और भविष्य बनाने में खर्च करते आज सुनिता जिंदा होती और बेहतर जिदंगी जी रही होती । शादी को ही जिदंगी का मूलमंत्र मान कर चलने वाले मां, बाप और उनकी बेटी भी दोषी है सुनिता जैसे हालात के लिए । एक सुनिता तो चली गई पर हजारों सुनिता अभी भी जिदां है या जिंदा रहना चाहतीं है अपना सुनहरा भविष्य बना कर । इस के शादी का खयाल छोडिए और शिक्षा के श्रृगांर से अपनी जिदंगी को सुदंर बनाईए । क्यों कि शादी आत्म निर्भर हो कर बाद में भी करा जा सकता है । हमारे कल के सुदंर भविष्य के लिए स्वाभिकामनी और आत्म निर्भर बेटियों कि जरुरत है न कि श्रृगांर और गहने से लकदक हो कर दहेज की वलिवेदी पर चढने के लिए समिधा बनी किसी कमजोर बेटी की । ईसी लिए दहेज को नकारने के लिए बेटियों अपने पैरों पर खडा होना ही होगा ।

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