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वर्तमान में नारी अधिकार क्यों मांगे ? : अंशु झा 

 
अंशु झा

काठमांडू । वर्तमान में नारी पुरुष के समकक्ष ही तो है । ऐसा कोई भी काम नहीं है जो नारी नहीं कर सकती है । किसी भी परीक्षा में सफलता हासिल करने से अन्तरिक्ष की उंचाई तक, घर की रसाई से लेकर ओलम्पिक में मैडल लाने तक प्रत्येक क्षेत्र में महिलाएं अव्वल है । फिर भी इस सफलता के आधुनिक युग जहां तकनीक और आधुनिकता का बोलबाला है वहीं दूसरी ओर महिला सशक्तिकरण या महिलाओं के अधिकारों के अलग अलग मन्चों की आवश्यक्ता पडना अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण ही तो है ।

इस प्राणी जगत में सबसे बुद्धिमान, विवेकशील प्राणी मनुष्य है । सृष्टि को विकास की ओर ले जाने का दायित्व इन मानव जाति को ही है जिसमें महिला और पुरुष दोनों बराबर के भागीदार हैं । बिना स्त्री संसार के सृजन का कल्पना भी असम्भव है । फिर क्यों आज भी नारी को अपनों के बीच अपनों से ही अपने लिये अधिकार मांगने पडते हैं । और कभी कभी तो अपने ही अधिकार मांगने के लिये अपनों से ही यातनाएं भी सहनी पडती है । प्रत्येक क्षेत्र में अपनी काबिलियत, शक्ति व बुद्धिमता को साबित करने के बाबजूद भी नारी को परिवार, समाज तथा अन्य विभिन्न क्षेत्रों में बराबरी का दर्जा नहीं मिलता और न ही सम्मान ।
बडे बडे राजनीतिक मन्चों से नारी की भूमिका को लेकर सक्रिय दिखने वाले नेतागण भी कभी कभी महिलाओं के लिये ऐसी भाषा का प्रयोग कर जाते हैं जो सही मायने में आपत्तिजनक होती है । तो क्या वे गलती से ऐसा बोल जाते हैं ? या उनकी मानसिकता ही ऐसी होती है ? अर्थात् बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और । दरअसल तो बात यह है कि वैसे बोलने वाले नारी को अलग ही दृष्टि से देखते हैं । हमारे समाज का ढांचा ही कुछ इस प्रकार है जहां पैदा होते ही लडका लडकी में भेदभाव शुरु हो जाता है । जिसमें पुरुष को सदैव ही उंचा दर्जा दिया जाता है और स्त्री को नीचे रखा जाता है । फिर चाहे स्त्री कितनी भी बुद्धिमान या काबिल क्यों न हो । उसे हमेशा किसी न किसी का संरक्षण दिया जाता है । पुरुष अगर स्त्री से उम्र में छोटा भी हो तो भी वह बडा ही समझा जाता है ।
हालांकि कई हस्तियां ऐसी भी है जो आसमान की उंचाईयों को छुकर पुरुषवादी सत्ता को चुनौती दी है । परन्तु उनकी संख्यां कम है । हम स्वयं को आधुनिक, सभ्य समाज का एक हिस्सा मानते हैं और यह सोचकर प्रफुल्लित भी होते हैं । परन्तु जब बेटे के चाह में बेटियों का अधिकार हनन किया जाता है तब ऐसा लगता है कि सही मायने में यह समाज अभी तक सभ्य नहीं हो पाया है । तमाम सख्त कानूनों के बाबजूद भी गर्भावस्था से ही लडकियों के साथ अत्याचार किया जा रहा है । यह सिलसिला सिर्फ गरीब परिवार में ही नहीं, पढा लिखा धनाढ्य परिवार भी इससे अछुता नहीं है । अभी भी महिला पर पारिवारिक, सामाजिक व मानसिक दबाव बना रहता है कि वह एक बेटे को ही जन्म दें । जब कि यह मानसिकता अत्यन्त ही घृणित है । इस मानसिकता को सबसे पहले हमें अपने परिवार से हंटाने का प्रयास करना चाहिये क्योंकि समाज का बदलाव तभी सम्भव है जब परिवार सभ्य और सुशिक्षित हो । परिवार से ही लडके और लडकी के बीच का अन्तर समाप्त करना होगा ।
समग्र में हम यह कह सकते हैं कि अब वर्तमान युग में महिलाएं ओलम्पिक मैडल से लेकर राजनीतिक क्षेत्र तक अपना दखल रखने लगी हैं तो महिलाओं को अब सिमित रखना निंदनीय ही होगी । अब महिलायें अपने रजस्वला में भी आराम करना नहीं चाहती हैं, उस अवस्था में भी पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर काम करना चाहती हैं । अर्थात अब महिलायें भी पुरुष से कम नहीं है । इसलिये अब सिर्फ जरुरत है कि वर्तमान में नारी बेखौफ जीवन जिए । उस पर किसी भी प्रकार का पाबंदी न हो । उसे अपने अधिकारों के लिये अदालतों का दरवाजा न खटखटाना पडे ।

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