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दिलीपदर्श

दिलीपदर्श की तीन गज़लें

कत्ल होता चौक पे सच के सिपाही का।

उधर गाता राग कातिल बेगुनाही का।

 

शब्द कल मारा गया, अब क्या करोगे भी

मौन लेकर चश्मदीदों की गवाही का ?

 

चल उगाता सिर्फ जंगल, पूछ मत कोई

पर्यावरण किसने बिगाड़ा लोकशाही का।

 

कोशिशें तो कीं बहुत, पर आँकड़ों में था

हो न पाया तर्जुमा उनकी तबाही का।

 

देख लेना सरहदों पे गांव या खाली मकां

आएगा मतलब समझ में बेपनाही का।

 

सिर्फछोटीमछलियाँहीआफंसेंइसमें

जाल ऐसा ही लगा रहता उगाही का।

 

मर नहीं जाएं कहीं वे ख्वाब प्यासे ही

दर्श अब पानी पिला अपने सुराही का।

                      2:

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फर्क जो मालूम था क्या आग – पानी में ।

काम आया जिंदगी की बागवानी में ।

 

हर तरफ वो ही हकीक़त एक ही तो थी,

देखते तुम थे जमीनी – आसमानी में ।

 

पात्रता से बेदखल हो रह न पाया जब,

पात्र बनकर जी लिया झूठी कहानी में।

 

सो रहा मुर्दे पलों की ढेर पर ऐसे,

जी न पाया चार पल भी जिंदगानी में।

 

अब न भाता है उन्हें सूखा चना अपना,

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चोंच अब जो मारते चुपड़ी विरानी  में।

 

राह सूनी थी पड़ी, राही न कोई था,

मील का पत्थर अकेला था रवानी में।

 

दर्श तुझको ग़ज़ल कहनी आ गयी शायद

आ गई है अदब, तेरी बदजुबानी में ।

             3:

कल वो जो मुझसे फिर जुदा होगा ।

दूर मुझसे मेरा खुदा होगा ।

 

मैं अगर मिट गया जहां से तो

नाम दीवार पे खुदा होगा ।

 

वक्त बच्चा बड़ा हठीला था

रोकने से वो क्या रुका होगा !

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रोशनी कम,  धुआँ ही ज्यादा था,

खुद में घुट – घुट, दिया बुझा होगा।

 

ये अंधेरा अभी मुझे दे दो

अब तो कंधा तेरा दुखा होगा ।

 

सर झुकाके किए बहुत सिज्दे

सर झुकाने से सर गिरा होगा ?

 

दर्श मुझपे नहीं गिरा पानी

जख्म वरना मेरा हरा होगा।

 पणजी,  गोवा– ४०३००१

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