3 जून को होगी वटवृक्ष की पूजा
माला मिश्रा बिराटनगर । व्रत पर्व और त्योहारों का प्रचलन हमारे प्राचीन ज्ञान विज्ञान संम्पन्न रिसी महर्षि तथा पूर्वज विद्वानों के द्वारा चला आरहा है।जेष्ठ मास की कृष्ण पक्ष अमावश्या तिथि जो वट सावित्री व्रत के नाम से जाने जाते हैं।यह व्रत सभीसौभाग्यवती स्त्रियों के लिए है। यह व्रत हिंदू धर्म के संपूर्ण भारत की स्त्रियां पूरे विधि विधान एवं निष्ठा के मनाती है। इस व्रत का पूजन एवं विधि विधान पर प्रकाश डालते हुए आचार्य पंडित धर्मेंद्र नाथ मिश्र ने बताया किइस व्रत में वटवृक्ष की पूजा की जाती है।जो अखंड सौभाग्य को प्रदान करता है। यह व्रत महान पतिव्रता स्त्री सावत्री द्वार अपने पति सत्यवान को पुनः जीवित करने की स्मृति के रुप में किया जाता है।वटवृक्ष को शास्त्रानुसार वटवृक्ष को देव वृक्ष भी माना जाता है।क्योंकि वटवृक्ष के जड़ में ब्रह्माजी,तने में भगवान विष्णु, शाखाओं एवं पत्तियों में भगवान शिव साथ मां सावित्री भी वटवृक्ष में निवास करती हैं। अक्षय वृक्ष के पत्ते पर भी भगवान श्री कृष्ण प्रलय काल में मार्कंडेय ऋषि को दर्शन दिए थे यह अक्षर वृक्ष प्रयाग में गंगा तट पर बेनी माधव के निकट स्थित है। इस दिन सभी व्रती महिलाओं को प्रातः स्नानादि कर बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें और दूसरी टोकरी में सत्यवान एवं सावित्री की मूर्तियों का स्थापना करके बरगद के पेड़ का पूजन एवं व्रत करने से सभी विवाहित स्त्रियों को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान प्राप्त होते हैं।पूजन सामग्री में:-गंगाजल,अक्षत, रक्षासूत्र, चना, फूल, सिन्दूर, धूप एवं कच्चासूत वटवृक्ष के पेड़ में पांच से सातवार लपेट कर पूजन करने से पूजन को सफल माना जाता है।साथ ही इस दिनय थासंभव ब्रह्मण भोजन एवं दान दक्षिणा देने का विधान है। आज भी सावित्री के चरित्र से प्रभावित होकर पवित्र धर्म का पालन करने भारती नारियां पूरी आस्था के वटसावित्री व्रत का पालन करती हैं।इस पूजन से महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।नोट-पूजन में दूसरा अर्धप्रहरा वर्जित रहेगा।यानि पूजन का मुहूर्त सुबह के 8:30 बजे से लेकर दोपहर के 3:39 तक ही वटसावित्री पूजन का शुभ मुहूर्त है। इस वर्ष की वट सावित्री 9 वर्ष के बाद विशेष संयोग से रोहिणी नक्षत्र एवं सोमवती अमावस्या सर्वार्थ सिद्ध योग एक ही दिन मिलने से होगी अति विशिष्ट फलदायीः-रोहिणी नक्षत्र के संयोग से एक ही दिन वटसावित्री एवं बेर की सोमवारी व्रत होने से महिलाओं के लिए विशेष फलदायी एवं सिद्धि दायक होगी।


