आपत्तिकाल से निपटने के लिए धन का संग्रह और धन की रक्षा करनी चाहिए :चाणक्य
चाणक्य तक्षशिला विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के आचार्य थे। उन्हें कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से जाना जाता है। चाणक्य ने अर्थशास्त्र के साथ ही उन्होंने चाणक्य नीति नाम के ग्रंथ की रचना की थी। इस ग्रंथ में जीवन को सुखी और सफल बनाने की कई नीतियां बताई गई हैं। अगर इन नीतियों का पालन किया जाता है तो हम कई परेशानियों से बच सकते हैं। यहां जानिए ऐसी ही एक नीति…
चाणक्य कहते हैं कि
आपदर्थे धनु रक्षेद् दारान् रक्षद्धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि।।
> ये चाणक्य नीति के पहले अध्याय का छठा श्लोक है। इस श्लोक में आचार्य कहते हैं कि समझदार व्यक्ति को आपत्तिकाल से निपटने के लिए धन का संग्रह और धन की रक्षा करनी चाहिए। बुरे समय में धन ही सबसे बड़ा मददगार बन सकता है। अगर हमारे धन नहीं होगा तो परेशानियां और अधिक बढ़ जाएंगी।
> व्यक्ति को धन से भी ज्यादा अपने जीवन साथी की रक्षा करनी चाहिए। जीवन साथी ही हर पल साथ निभाता है। साथी की मदद से बड़ी-बड़ी परेशानियां भी दूर हो सकती हैं।
> चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति को धन और जीवन साथी से भी ज्यादा खुद की रक्षा करनी चाहिए। अगर हमें कुछ हो गया तो धन किसी काम नहीं आ आएगा। जीवन साथी के लिए भी संकट खड़ा हो सकता है।
चंद्र गुप्त को बनाया अखंड भारत का सम्राट
चाणक्य के काल में भारत खंड-खंड में बंटा हुआ था। उस समय चाणक्य ने अपनी योजनाओं से अखंड भारत का निर्माण किया और चंद्रगुप्त मौर्य को सम्राट बनाया। चाणक्य मौर्य साम्राज्य में महामंत्री थे, लेकिन वे नगर के बाहर एक झोपड़ी में रहते थे।

