Wed. Feb 26th, 2020

आखिर पुलिस की गोली की निशाना में मधेसियों के शिर पर ही क्यों ? : बिनोद पासवान

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पुलिस-प्रशासन द्वारा बार बार मधेसियों की हत्या पर सवाल

जून ५, बिनोद पासवान । घटना है जून ३० का रविवार का, सर्लाही, ईस्वरपुर में सरकारी लापरवाही के कारण बांके पुल की निर्माण के क्रम में बनाये गए ३० फिट के पीट के अंदर डूबकर एक १२ साल के बच्चे की मौत हो गई। इसके कारण स्थानीय निकाय को दबाव देने तथा छतिपूर्ति के लिए स्थानीय वाशियों ने पूर्ब-पश्चिम राजमार्ग पर अवरोध किया। पुलिस ने वहां लोगों को सहानुभूति देने के बजाय अवरोध नियंत्रण के नामपर निशाना साधकर गोली दाग दी, और वो गोली जाकर निहत्थे सरोज महतो के शिर पर लगी जिससे उनकी घटनास्थल पर ही मौत हो गयी।

इस घटना को लेकर सामाजिक संजाल पर पुलिस-प्रशासन की थू-थू हो रही है। पुलिस की मानसिकता पर लोग सवाल उठा रहे हैं, आखिर कबतक मधेसी शिकार होते रहेंगे ? क्या पुलिस की ट्रेनिंग में मधेशियों को शिर पर गोली मारने की तालीम दी जाती है ? आखिर मधेशी देखकर पुलिस क्यों बौखला जाती है ? और, क्यों शिकारी की तरह हिंसक हो जाती है ?
इस घटना को लेकर मानव अधिकार कर्मी भी आवाज उठा रहे हैं। मानव अधिकारकर्मी चरण प्रसाई ने कहा कि ” पिछले सालों से मधेश मे पुलिस प्रशासन द्वारा अत्याधिक बल प्रयोग की घटना बढ़ रही है। सामान्य प्रकृति कि घटना मे भी पुलिस द्वारा मारे गए लोगों की शिर मे ही चोट लगी है, इससे पता चलता है कि पुलिस या तो नियतवश शिरपर गोली मार रही है या नेपाल सरकार द्वारा असक्षम  पुलिस को ही भर्ती किया जाता है”

इसी तरह मानव अधिकारकर्मी गौरी प्रधान का कहना है कि “ऐसी घटनाओं से मधेश मे पुलिस-प्रशासन पर असन्तुस्टि बढ़ रही है, इस मामले में प्रशासन द्वारा न्यायिक जांच कर प्रमाणित करना होगा कि क्या सच मे भीड़ नियंत्रण से बाहर चली गयी थी ?”
वहीँ पुलिस हमेशा की तरह अपना बचाव कर रही है। प्रदेश २ के DIG प्रध्युमन कार्की का कहना है कि पुलिस ने भीड़ नियंत्रण के लिए १५ राउंड हवाई फायर किये थे। लेकिन गोली कैसे शिरपर जा लगी ? ये नहीं बोल रहे ।

सर्लाही के प्रमुख जिल्ला अधिकारी कृष्ण बहादुर राउत ने फिल्ड ऑफिसर से पूछा है कि किनके आदेश पर वहां गोली चलायी गयी ? उनहोंने इस घटना कि न्यायिक छानबीन करने का वादा किया है।

आपको ये भी बतादें की हाल में ही आये एक मानवाधिकारवादी संगठन ‘एडवोकेसी फोरम’ ने अपने रिपोर्ट में लिखा है कि “तराई-मधेश के समुदाय, बिशेष रूपसे मधेसी-थारू को पुलिस हिरासत में दिए जानेवाले यातना और हिंसा का दर अत्याधिक है”
इसीतरह ‘ह्यूमन राइट्स वाच’ के अनुसार “सन २०१५ में चले लम्बे मधेश आंदोलन के दौरान ४० से अधिक मधेसी की जान चली गयी थी, जिसमे १५ लोग पुलिस की गोली से मारे गए थे”
अब आगे देखना है, इस मामले में क्या नतीजा निकलता है।

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