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विश्वभर में कुल २२ देश ऐसे हैं जहां तीन तलाक पर रोक लग चुकी है

 
उच्चतम न्यायालय द्वारा तीन तलाक को गैरकानूनी ठहराये जाने के बाद भारत सरकार द्वारा इसे लेकर कानून बनाने की प्रक्रिया तेज हो गयी है. विश्वभर में कुल 22 देश ऐसे हैं, जहां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर तीन तलाक की प्रथा पर रोक लग चुकी है. तुर्की, साइप्रस, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, मलयेशिया, जॉर्डन, मिस्र, ईरान, इराक, ब्रूनेई, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, लीबिया, सूडान, लेबनान, सऊदी अरब, मोरक्को, कुवैत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका उन देशों में शामिल हैं, जहां तीन तलाक पर रोक है.
 
तीन तलाक पर क्या कहा उच्चतम न्यायालय ने
अगस्त 22, 2017 को उच्चतम न्यायालय ने मुस्लिम समाज में प्रचलित तीन तलाक के चलन को 3:2 से गैरकानूनी घोषित कर दिया था.
इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन है, क्योंकि इसमें सुलह का मौका दिये बिना शादी खत्म की जाती है. अपना फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश राेहिंगटन नरिमन, उदय ललित और जोसेफ कुरियन ने तीन तलाक को अवैधानिक माना था. न्यायाधीश जोसेफ ने कहा था कि तीन तलाक को कुरान में मान्यता नहीं दी गयी है, इसलिए इस चलन को धार्मिक अधिकार के तहत संरक्षित नहीं किया जा सकता है.
वहीं न्यायाधीश अब्दुल नजीर और मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने तीन तलाक की प्रथा को सही ठहराया था. मुख्य न्यायाधीश खेहर ने तो मुस्लिम समुदाय में विवाह और तलाक के नियमन के लिए सरकार से छह महीने के भीतर कानून बनाने को कहा था.
उन्होंने यह भी कहा था कि तलाक-ए-बिद्दत सुन्नी समुदाय का अभिन्न अंग है और उस समुदाय में यह प्रथा एक हजार साल से चली आ रही है. बहरहाल, इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को गैरकानूनी करार दिया है.
बीएमएमए समेत कई संगठन सक्रिय
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) पिछले कुछ वर्षों से तलाकशुदा महिलाओं के पक्ष में आवाज मुखर कर रहा है. संस्था की संस्थापक सदस्य जाकिया सोमन के मुताबिक अल्लाह द्वारा दिये गये अधिकारों को छीनने का हक किसी भी लॉ बोर्ड को नहीं है. संस्था 2007 से एक बार में तीन तलाक और बहु विवाह से पीड़ित महिलाओं पर रिपोर्ट तैयार कर रही है.
दिसंबर, 2012 में देशभर से इकट्ठा होकर महिलाओं ने प्रधानमंत्री, कानून मंंत्री, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और महिला एवं बाल विकास मंत्री को पत्र लिखा और 50,000 हस्ताक्षर भेज कर तीन तलाक पर पाबंदी की मांग की. सर्वोच्च न्यायालय में सायरा बानो की अर्जी दाखिल करने के बाद बीएमएमए ने अर्जी दाखिल कर इस प्रथा पर कानूनी पाबंदी की मांग की थी.
तीन तलाक के समर्थन में दलील
तीन तलाक के मुद्दे पर उठाये गये सवालों पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि यह विषय न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता. अत: याचिकाएं खारिज की जानी चाहिए. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत पर्सनल लॉ को संरक्षण मिला हुआ है.
तीन तलाक और प्रमुख अदालती घटनाक्रम
5 फरवरी, 2016 : तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह के चलन की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी. सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले पर तत्कालीन अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी से राय मांगी थी. इसके एक माह बाद न्यायालय ने केंद्र सरकार से ‘महिला और कानून : पारिवारिक कानूनों के आकलन, विवाह, तलाक, हिरासत, उत्तराधिकार आदि पर आधारित’ रिपोर्ट की कॉपी मांगी थी.




7 अक्तूबर, 2016 : केंद्र सरकार ने पहली बार सर्वोच्च न्यायालय में तीन तलाक प्रथा का विरोध किया. केंद्र ने कहा कि इस प्रथा पर लैंगिक समानता और धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांतों के तहत पुनर्विचार करना चाहिए.
16 फरवरी, 2017 : तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह प्रथा की चुनौतियों पर सुनवाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने पांच जजों की संवैधानिक पीठ के गठन की घोषणा की.
27 मार्च, 2017 : ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय में बताया कि तीन तलाक का मामला न्यायिक क्षेत्र में नहीं आता.
11 अप्रैल, 2017 : केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि यह प्रथा संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है.
21 अप्रैल, 2017 : मुस्लिम पुरुष से शादी करनेवाली एक हिंदू महिला द्वारा तीन तलाक को खत्म करने के लिए दाखिल याचिका को दिल्ली हाइकोर्ट ने खारिज कर दिया.
3 मई, 2017 : तीन तलाक के चलन की संवैधानिकता पर जारी सुनवाई के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद को अमीकश क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त किया गया.
11-17 मई, 2017 : मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली संवैधानिक खंडपीठ ने तीन तलाक पर सुनवाई शुरू की.
22 अगस्त, 2017 : तीन तलाक को अवैध करार दिया गया.

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