मोदी–ट्रंप का साथ – चिन्ता में चीन, असमंजस में नेपाल : अजयकुमार झा
‘बेल्ट एंड रोड फोरम’ को अपने गर्भ में समाते हुए ‘इंडो पैसिफिक स्ट्रेटजी’
हिमालिनी अंक जुन २०१९ |हमने पुराणों में पढ़ा है कि ऋषि अगस्त समुद्र को चुल्लु में भरकर पी गया था । यह एक प्रतीकात्मक और काव्यात्मक वक्तव्य है । वास्तव में वो सामुद्रिक संजाल और परिघटनाओं से पूरी तरह भिज्ञ थे । समुद्री लुटेरों के सभी मार्गो और षडयंत्रों के पूर्ण जानकर थे । और यही कारण था कि मरुदगन आदि के हमलावरों से भारत को वर्षों तक सुरक्षित रखे हुए थे ।
आज समय और स्वरूप जरुर बदल गया है, लेकिन समस्या आज भी सागर और हिमालय के रास्ते से यथावत है । नदी, पहाड़ और वायु मार्ग से विभिन्न रूपों में आज भी आक्रमण जारी है । आज भारत पुनः ऋषि अगस्त की भाँति मोदी की अध्यक्षता में हर षडयंत्र का मुहतोड़ जबाब देने में सक्षम है । जबकि इससे पहले चीन और अमेरिका के आगे घुटने टेकने पड़ते थे ।
चीनी राष्ट्रपति ‘शी’ ने ‘बेल्ट एंड रोड फोरम (बीआरएफ)’ की दूसरी बैठक में अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि चीन “मुक्त, हरित और स्वच्छ सहयोग” के आधार पर अपनी अरबों डॉलर की बेल्ट एवं रोड पहल (बीआरआई) का निर्माण करना चाहता है । इस बैठक में ३७ देशों के प्रमुख के अलावा १५० देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अधिकारियों ने हिस्सा लिया ।
जबकि भारत ने बीआरआई की सीपीईसी परियोजना को लेकर फोरम की बैठक का बहिष्कार किया । दरअसल, ६० अरब डॉलर से तैयार होने वाला चीन(पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरेगा । जो भारत के लिए व्यापारिक, आर्थिक और सामरिक रूप से चीन के दूरगामी षडयंत्र में फसने का संकेत है, जिसका भारत विरोध कर रहा है ।
भारत तो इससे निकल जाएगा लेकिन नेपाल, भूटान, पाकिस्तान जैसे छोटे छोटे देशों को एतिहासिक रूप से तिब्बत की तरह परतंत्र होना पड़ेगा क्योंकि चीन अपने ‘वन बेल्ट वन रोड’ पहल के माध्यम से विश्व की महाशक्ति के रूप में अपने को बदलने के लिये दुनिया के विभिन्न देशों में इंपÞm्रास्ट्रक्चर तथा कनेक्टिविटी पर भारी निवेश कर रहा है । उसकी इस पहल का उद्देश्य इंडो–पैसिफिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व भी स्थापित करना है । अमेरिका की यही इन्डो पैसिफिक योजना चीन के गले नहीं उतर रहा है ।
बीआरआई की इस प्रमुख परियोजना को लेकर अमेरिकी सरकार काफी गंभीर है और उसका मानना है कि चीन बेल्ट एंड रोड मुहिम के जरिये छोटे देशों को ‘ऋण के जाल’ में फंसा रहा है । इसके प्रतिउत्तर में जिनपिंग ने कहा कि ‘बेल्ट एंड रोड पहल ने संयुक्त निर्माण के तहत विश्व की आर्थिक वृद्धि के लिए नए द्वार खोले हैं और इस पहल ने अंतराष्ट्रीय व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए नया मंच भी तैयार किया है’।
याद रहे ! चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने २०१३ में सत्ता में आने के बाद बीआरआई परियोजना को शुरू किया था । यह परियोजना दक्षिण–पूर्व एशिया, मध्य एशिया, खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और यूरोप को सड़क एवं समुद्र मार्ग से जोड़ेगी ।
चीन और अमेरिका के बीच दिख रहे व्यापारिक और सामरिक ध्रुवीकरण में भारत अपना महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिष्ठा के साथ ही संरक्षण और संवर्धन दोनों का मार्ग प्रशस्त करने में सफल दिख रहा है । साथ ही (इन्डो पैसिफिक रणनीति) के महाजाल में चीन के वेल्ट एंड रोड रणनीति को चकनाचूर कर दिया है ।
हिंद महासागर (क्ष्लमष्बल इअभबल) और प्रशांत (एबअषष्अ) यानी प्रशांत महासागर के कुछ भागों को मिलाकर जो समुद्र का एक हिस्सा बनता है, उसे हिंद प्रशांत क्षेत्र (क्ष्लमय(एबअषष्अ ब्चभब) कहते हैं । विशाल हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के सीधे जलग्रहण क्षेत्र में पड़ने वाले देशों को ‘इंडो पैसिफिक देश’ कहा जा सकता है ।
इस्टर्न अफ्रीकन कोस्ट, इंडियन ओशन तथा वेस्टर्न एवं सेंट्रल पैसिफिक ओशन मिलकर इंडो–पैसिफिक क्षेत्र बनाते हैं। इसके अंतर्गत एक महत्वपूर्ण क्षेत्र दक्षिण चीन सागर आता है जो वर्तमान में वैश्विक विवाद का कारण बना हुआ है । वास्तव में यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे अमेरिका अपनी वैश्विक स्थिति को पुनर्जीवित करने के लिये इसे अपनी भव्य रणनीति का एक हिस्सा मानता है, जिसे चीन द्वारा चुनौती दी जा रही है ।
ट्रंप द्वारा उपयोग किये जाने वाले ‘एशिया–प्रशांत रणनीति’ क्ष्लमय(एबअषष्अक्तचबतभनथ) का अर्थ है कि भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य प्रमुख एशियाई देशों, विशेष रूप से जापान और ऑस्ट्रेलिया, चीन के साथ मनमुटाव ‘शीत युद्ध’ के बढ़ते प्रभाव के नए ढाँचे में चीन को रोकने में शामिल होंगे।
वर्तमान में इंडो–पैसिफिक क्षेत्र में ३८ देश शामिल हैं, जो विश्व के सतह क्षेत्र का ४४ प्रतिशत, विश्व की कुल आबादी का ६५ प्रतिशत, विश्व की कुल न्म्ए का ६२ प्रतिशत तथा विश्व के माल व्यापार का ४६ प्रतिशत योगदान देता है ।
अतः इसमें उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाने वाले क्षेत्रीय व्यापार और निवेश के अवसर पैदा करने हेतु सभी आवश्यक पहलू भी मौजूद हैं । यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज वैश्विक सुरक्षा और नई विश्व व्यवस्था की कुंजी हिंद–प्रशांत क्षेत्र में अवस्थित है ।
इसके अंतर्गत एक महत्वपूर्ण क्षेत्र दक्षिण चीन सागर है जहाँ आसियान के देश तथा चीन के बीच लगातार संघर्ष होता रहता है ।
दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है– मलक्का का जलडमरूमध्य, गुआन आइलैंड, मार्शल आइलैंड, इसके अतिरिक्त लाल सागर, गल्फ ऑपÞm अदेन, पर्शियन गल्फ ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ से भारत का तेल व्यापार होता है । यहाँ पर हाइड्रोकार्बन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं । सेशेल्स और मालदीव भी इसी क्षेत्र में आते हैं ।
इसप्रकार यह क्षेत्र रणनीतिक तथा व्यापारिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है ।
अब अमेरिका अपने दीर्घकालिक हितों तथा चीन के बढ़ते कदम को रोकने के लिये भारत को हृदयंगम कर रहा है । इसीलिए हिंदप्रशांत क्षेत्र को ‘मुक्त एवं स्वतंत्र’ क्षेत्र बनाने के लिये ट्रंप प्रशासन भारत–जापान संबंधों के महत्व को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुका है क्योंकि अमेरिका तेजÞी के साथ विश्व महाशक्ति के रूप में उभर रहे चीन को काउंटर करना चाहता है ।
एक अनुमान के अनुसार चीन २०२७ तक अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा । जो कि अमेरिका को कतई वर्दास्त नहीं होगा । अतः वह इंडो–पैसिफिक क्षेत्र में भारत को एक मजबूत सहयोगी के रूप में लाना चाहता है । इससे भारत को विश्व में शक्ति संतुलन के रूप में तथा जन्मजात शक्तिशाली शत्रु चीन के कदम को रोकने में भी बल मिलेगा । भारत पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापार, आर्थिक विकास तथा समुद्री सुरक्षा में अहम् भूमिका अदा कर सकता है । अतः वह इंडो–पैसिफिक रीजन में स्थित देशों को प्रभावित करने के लिये अमेरिका की मदद चाहता है ।
साथ ही विश्व महाशक्ति की ओर बढ़ रहे चीन को चारो ओर से घेरकर घुटने टेकने पर बाध्य करना चाहता है ।
इधर चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का प्रमुख उपभोक्ता है । हाल ही में चीन ने श्रीलंका सरकार से हंबनटोटा पोर्ट को खरीद लिया है । बांग्लादेश का चिटगाँव पोर्ट भी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बंदरगाह है जहाँ चीन की उपस्थिति मौजूद है । म्याँमार की सितवे परियोजना भी चीन की मोतियों की माला नीति का हिस्सा है । जिबूती में तैयार चीन के पहले विदेशी नौसैनिक अड्डे और मालदीव के कई निर्जन द्वीपों पर उसके काबिज होने के बाद हिंद महासागर बीजिंग का भू–सामरिक अखाड़ा बनता जा रहा है । चीन, दक्षिण चीन सागर में कई कृत्रिम द्वीप बनाकर उनका सैन्यीकरण करने में सफल रहा है । इस प्रकार चीन मोतियों की माला नीति के तहत हिंद महासागर क्षेत्र को चारों तरफ से घेर रहा है तथा अपना प्रभुत्व कायम करने में लगा है । इसकारण भारत को अमेरिका से दोस्ती कर चीन को दबाव में लाने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिलेगा । वैसे १२ वर्ष पहले सन २००७ में ‘क्वाड’ त्तगबमचष्बितभचब िक्भअगचष्तथ म्ष्बयिनगभ (त्तक्म्) के नाम से भी जाना जाता है, को ‘स्वतंत्र, खुले और समृद्ध’ हिंद–प्रशांत क्षेत्र को सुरक्षित करने के लिए भारत, अमेरिका, जापान तथा आस्ट्रेलिया की संयुक्त रूप से अनौपचारिक रणनीतिक वार्ता को अब ‘हिंद–प्रशांत क्षेत्र को स्वतंत्र, समृद्ध और मुक्त कर बेल्ट रोड पहल के माध्यम से हिंद–प्रशांत क्षेत्र में चीनी दबदबे को नियंत्रित करना हीं लक्ष्य बनाया गया है । इस प्रकार मोदी के नेतृत्व में भारत महाशक्ति की ओर मजबूती से कदम बढाते हुए दिखाई दे रहा है ।
परन्तु चीन अपनी इद्यइच् के माध्यम से हिंद–प्रशांत सहित अन्य छोटे–छोटे देशों पर आक्रामकता और ऋण जाल (म्भदत त्चबउ) कूटनीति, जो संप्रभुता को प्रभावित करती है,के जरिए अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करना चाहता है ।
चीन का दावा है कि उसका दक्षिण चीन सागर के लगभग संपूर्ण क्षेत्र पर ऐतिहासिक स्वामित्व है, जो उसे द्वीपों के निर्माण का अधिकार देता है ।
दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा अवैध कृत्रिम द्वीपों का निर्माण व ओबामा द्वारा चीन को चेतावनी देना महाशक्तियों के हस्तक्षेप को ही प्रदर्शित करता है ।
उल्लेखनीय है कि १२ जुलाई, २०१६ को हेग स्थित संयुक्त राष्ट्र न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर पर चीन के एकाधिकार के दावे को खारिज कर दिया ।
पाँच सदस्यीय न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि चीन के पास ‘नाइन डैश लाइन’ के भीतर पड़ने वाले समुद्री इलाकों पर ऐतिहासिक अधिकार जताने का कोई कानूनी आधार नहीं है ।
इधर नेपाल, अन्य देशो से व्यापार के लिए भारत पर निर्भरता को खारिज करते हुए उत्तरी मित्र चीन के साथ समझौता पर हस्ताक्षर कर चुका है । हाल ही में नेपाल की राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी के चीन भ्रमण के क्रम में नेपाल और चीन के बीच सन् २०१६ में पारवहन सन्धि के प्रोटोकल में हस्ताक्षर किया गया । इस हस्ताक्षर के साथ ही नेपाल अब अन्य देशों के साथ व्यापार के लिए चीन के चार सामुद्रिक तथा तीन सूखा बन्दरगाह का प्रयोग कर सकेगा ।
नेपाल के इस कदम को रोकने के लिए दक्षिणी और पश्चिमी शक्तियों से दबाव आना शुरू हो गया है । कुछ दिनों से अमेरिकी सेना तथा अमेरिकी सेना के इन्डो पैसिफिक कमांड की सक्रियता भी नेपाल में बढ़ने लगी है ।
पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका को यह पसंद नहीं है । इसके लिए नेपाल को अमेरिका दबाव देता आ रहा है । अमेरिका तो जबसे नेपाल बीआरआई में
सहभागी हुआ है, तब से ही नेपाल को रोकने का प्रयास कर रहा है ।
चीन अपने बीआरआई परियोजना के जरिए नेपाल में निवेश विस्तार करने के पीछे नेपाल जैसे गरीब(अविकसित देश को ऋण के चपेटे में डालकर नेपाली स्वाभिमान और स्वतंत्रता दोनों को एक ही बार में निगलने की गुरु योजना में है । इसकी गंभीरता को जानकार ही भारत पहले से ही विरोध करता आ रहा है ।
दक्षिण एसिया में सामरिक महत्व रखने वाला देश नेपाल फिलहाल अमेरिकी इन्डो प्यासिफिक रणनीति का प्रत्यक्ष हिस्सा तो नहीं बना है, लेकिन नेपाल के प्रति अमेरिका और भारतीय उत्सुकता कम नहीं हुई है । आखिरकार थकहार कर नेपाल को इसका हिस्सा बनना होगा ।
अमेरिकी विदेशमन्त्री माइक पोम्पिओ द्वारा नेपाली परराष्ट्रमन्त्री ज्ञवाली के अमेरिका भ्रमण के क्रम में वासिङ्टन में भव्य स्वागत करना और सुरक्षा साझेदारीसहित के विषय में विचार विमर्श कर इन्डो प्यासिफिक क्षेत्र के सम्बन्ध में नेपाल के केन्द्रीय भूमिका के बारे में चर्चा करना, यह साबित करता है कि नेपाल को न चाहते हुए भी चीन से मुख मोड़ना ही पड़ेगा और भारत अमेरिकी रणनीति में शामिल होना ही पड़ेगा । वैसे यह कदम चीनी गठजोड़ के वनिस्पत शुभ और जीवनदायी ही साबित होगा ।
नेपाल सरकार अपने ही देश के खस जातियों के अलावा अन्य सभी जातियों के साथ विदेशियों की तरह व्यवहार करता आया है । संविधान निर्माण के क्रम में आन्दोलन हुए नागरिकों की जानें गईं शासक और प्रशासन ने छल किया । यही एक मौलिक कारण है कि नेपाल सरकार तानाशाही देश चीन के समर्थन में हमेशा अपनी सुरक्षा देखता है, जबकि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करता है । वास्तव में खस भावना से भावित नेपाल सरकार के मधेसियों के प्रति की नकारात्मकता और राजतंत्रीय अनुवांशिकी गुण ही भारत के प्रति शत्रुता का भाव पैदा कर रहा है । नेपाल के तानाशाह के विरुद्ध और लोकतंत्र के समर्थन में भारत के अलावा आजतक चीन ने एक शब्द भी प्रकट नहीं किया । राजतन्त्र के विरुद्ध के आन्दोलन की सफलता का मूल कारण भारतीय दबाव ही था । जबकि चीन राजा के पक्ष में था । तो सवाल यह खड़ा होता है कि अब हमारी नैतिकता क्या कहती है । भारत से दूरी और चीन से मित्रता ! जो सरकार अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत तथा इतिहास को भूलना चाहता है, नजर अंदाज करना चाहता है तो, उसका सर्वनाश सुनिश्चित है । आज नेपाल के हिन्दू नेतागण भी इसाई मिसिनरी के आगे घुटने टेक रही है । आशीष लेने जाते हैं । धिक्कार है ! देश के इन अग्रपंक्तियों के नायको पर! बिना मांगे ही इसाईयों के हाथो अपने अस्तित्व को बेचकर नेपाल को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर दिए हमारे दूरदर्शी नेताओं ने । क्या गजब का सेकुलर हम लोग हो गए हैं ।
चीन के साथ झुककर किए जा रहे सन्धि के परिणाम में नेपालियों के आत्म सम्मान को बेचना पड़ेगा । भारत को जिस प्रकार सहज में विरोध कर बैठते हैं, ऐसा चीन के साथ प्रदर्शन करने की हिम्मत भी कोई नहीं दिखा पाएगा । न भाषा मिले न संस्कृति, फिर भी चाइना से है प्रीति !!
अब समझना यह है कि भारत में फिर से मोदी सरकार पूर्ण बहुमत से उपस्थित है । मोदी को हराने के लिए चीन, पाक और कुछ नेपालियो ने एड़ी चोटी एक कर दिया था परन्तु मोदीवाद के आगे माओवाद, लेलिनवाद, मार्क्सवाद, समाजवाद और साम्यवाद सभी बौना पड़ गया । सारे सिद्धांत को मोदी ने नपुंसक बना दिया । नेपाल के अधिकांश नागरिक जिस माओवाद के सिद्धांत के लिए प्राण दाँव पर लगाए हुए हैं, वह तो मोदी के सामने प्राणहीन दिखाई पड़ रहे हैं । अतः मोदी मन्त्र अब नेपाली तंत्र का निर्देशक बननेवाला है ।
– सबका साथ ! सबका विकास और सबका विश्वास!! यह है मोदीवाद !!!
परन्तु नेपाल में है, खस का साथ ! मधेसी का विनाश और चाइना पे विश्वास !!!

