Fri. Oct 18th, 2019

जलेश्वर में 522 वाँ तुलसी जयंती समारोह*


आज नेपाल के जलेश्वर में 522 मा तुलसी जयंती महोत्सव का आयोजन ज्येष्ठ नागरिक जिला संघ महोत्तरी द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री महेश्वर राय जी तथा प्रमुख अतिथि श्री राजेश्वर नेपाली जी,विशिष्ट अतिथि के रुपमे भारत से पधारे श्री भुवनेश्वर चौधरी जी जनकपुर से साहित्यकार श्री अयोध्यानाथ चौधरी जी, श्री चंद्रशेखर राय चमन जी, श्री राजकिशोर झा जी श्री नरेन्द्र चौधरी जी श्री बलराम शर्मा जी श्री रुद्रनारायण झा जी, श्री राम स्वार्थ ठाकुर जी लगायत के वक्ताओं की उपस्थिति रही तो दूसरी ओर भजन बधाई और सोहर समदावन की झाड़ियाँ श्री विश्वनाथ झा श्री शिवपूजन राय श्री संजीव राय जी के मधुर स्वरों से माहौल गुञ्जायमान हो उठा।

कार्यक्रम का उदघोषण श्री नरेन्द्र नारायण लाल कर्ण जी द्वारा किया गया। इस समारोह में 95% प्राज्ञ महानुभावो की उपस्थिति रही। तुलसी कृत ‘रामचरित्र मानस’ पर बिभिन्न वक्ताओं (श्री रुद्रनारायण झा तथा बलराम शर्मा जी) ने आद्योपान्त व्याख्या और विश्लेषण किया। इस ग्रन्थ को पंचम वेद कहा गया है। सारे ग्रंथो को सार संक्षेप इसमें समाहित है। सामाजिकता, आध्यात्मिकता, धार्मिकता, व्यावहारिकता, नैतिकता और सामाजवाद के अदभुत वर्णन किया गया है। परमात्मा को शब्द रुपमे धरती पर उतारने का भागीरथी प्रयास जो बाबा तुलसी ने किया है, वो कही और नहीं मिलता। प्रेम, सदभाव, सहिष्णुता और समझदारी का इसमे संगम मिलता है।
ज्ञानमार्ग तथा भक्ति मार्ग के द्वारा उन्होंने मुस्लिम शासकों का विरोध किया तथा लोगों में जोस भरा।(तुलसी मस्तक तब झुके धनुष वाण लेहूँ हाथ) भाई-भाई के बीच का स्नेह, पति-पत्नी बीच के समर्पण तथा पारिवारिक समन्वय का त्रिवेणी इस ग्रंथ के लोकप्रियता का महत्वपूर्ण कारक है। आज हिन्दुस्तान में श्रीराम बोलने पर प्रतिबन्ध लग रहा है। शासक लोग रावण, कंश और यवनों की तरह क्रूर होने लगे हैं। इस हालात में भी मानस हमें बल प्रदान करता है। श्री नरेन्द्र चौधरी जी का कहना था कि ( ग्रह भेसज जल पवन पट पाई कुजोग सुजोग।
होहिं कुवस्तु सुवस्तु जग लखहिं सुलक्षन लोग।)
ग्रह दवाई पानी हवा वस्त्र -ये सब कुसंगति और सुसंगति पाकर संसार में बुरे और अच्छे वस्तु हो जाते हैं।
ज्ञानी और समझदार लोग हीं इसे जान पाते हैं।
को न कुसंगति पाइ नसाई।रहइ न नीच मतें चतुराई।
खराब संगति से सभी नश्ट हो जाते हैं।
नीच लोगों के विचार के अनुसार चलने से चतुराई बुद्धि भ्रश्ट हो जाती हैं । यही स्थित आज हमारी हो गई है। हम भास्माशुर होने लगे हैं। वेद का ज्ञान प्राणी मात्रको समझने के लिए है। सभी भूतो में मैं ही हूँ। सब मेरा ही रूप है। (सियाराम मय सब जग जानी)
विज्ञान ने अब विश्व व्यापी ब्रह्म के तत्व को स्वीकार करने लगा है। सब कुछ यही है, बस, हमें पूर्ण रुपमे समझना पड़ेगा। यह विश्व स्वतःचालित अवस्था में है, जैसे हमारे शरीर के भीतर तीन लाख क्रियाकलाप हमेसा होता रहता है। परमात्मा तो सिर्फ द्रष्टा है। अतः हमें विकास और समरक्षण के लिए खुद ही आगे बढ़ना होगा। क्योंकि हम विश्वव्यापी सनातनी आज सिमटते जा रहे हैं। यह सिकुड़न विनास और मृत्यु का द्योतक है। इसी प्रकार भाषा साहित्य के अनुसंधाता श्री अयोध्यानाथ चौधरी जी ने मानस का ख़ाक छानते हुए इसमे समाहित मैथिली भाषा के 736 तथा नेपाली भाषा का 54 शब्दों का संकलन प्रस्तूत कर तुलसी दास के भाषाई समृद्धि तथा विराट ज्ञान को प्रस्तुत किया।
प्रस्तुती के क्रममे श्री भुवनेश्वर चौधरी जी ने रामायण शतकोटी अपारा कहते हुए निराकार और साकार राम, अभौतिक और भौतिक रूप को नर और नारायण के रूप में पुष्टि किया। धर्म संस्थापनार्थाय के कारण ही भगवान का अवतरण होता है।
दिनकर के रश्मि रथी को याद करते हुए,
जो था असाध्य साधने चला।
उल्टे हरिको बाँधने चला।।
इसका वर्णन करते हुए हरि शून्य सरीखे हैं। अतः हरिको पाने के लिए शून्य को साधना होगा। शून्य- अर्थात निराकार का ज्ञान होना। अहंकार के पास अहंकार के साथ जाने पर अहंकार बढ़ता है। यही कारण था कि धनुष को कोई नहीं तोड़ सका। राम सप्रेम, अहंकार शुन्य होकर जाते हैं। गुरु कहतें हैं ” उठहु राम भंजहु भव चापा। मेंटहु तात जनक परितापा।।” और राम सफल होतें हैं धनुष तोड़ने में। रामायण में लोकमत और वेदमत साथसाथ चलाया जा रहा है। गोश्वामी जी ने हमें पहले मनुष्य बनने की प्रेरणा दी है। अंग्रेजी के साहित्य में कहीं भी मात्री देवो भवः, पित्री देवो भवः , आचार्य देवो भवः नहिं लिखा है। यह हमारी सनातन साहित्य का विशेषता है कि जड़ चेतन सबको सम्मान करना सिखाता है। हम ऋषि कुल के होते हुए भी हमने अपनी संस्कृति और संस्कार को भूला दिया। तुलसी हमें निज धर्म पे चलना सिखाते हैं। कर्तव्य खोजना हो तो मानस में खोजो और अधिकार खोजना हो तो महाभारत में खोजो। जबतक हमारे मानस में राम के जैसा चरित्र नहीं आ जाता तबतक हम रामत्व को उपलब्ध नहीं कर सकतें। धर्म न दुसर सत्य   समाना, आगम निगम पुराण बखाना। और सत्य राम है। इसी क्रममे जनकपुर क्षेत्र के हिंदी अभियानी एक बुलंद व्यक्तित्व श्री राजेश्वर नेपाली जी ने महोत्तरी जिला के दिवंगत साहित्यकारों को नमन करते हुए तुलसी जयंती तथा मानस के एक श्लोक (परहित सरिस धरम नहीं भाई। पड़ पीड़ा सम नहीं अधमाई।।) कहकर सबको इसका पालन करने के लिए प्रेरणा दिया। कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षीय हैशियत से मंतव्य देते हुए श्री महेश्वर वावू ने सबको धन्यवाद, नमन और शुभकामना देते हुए, व्यक्तिगत सुधार पर जोड़ दिया। महिला को सम्मान और प्रतिष्ठा देना हमारा परम कर्तव्य है। हमें आत्म विकास के लिए अन्तर्मुखी होना है।
पत्रकार महासंघ के सभाकक्ष में हुए इस उत्सव में पत्रकार, शिक्षक, समाजसेवी, अधिवक्ता, अध्यात्मप्रेमियों का उमंग देखने लायक था।  अजय

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