Fri. Sep 20th, 2019

संगीत ही मेरा जीवन, पूजा और आराधना है : गुरुदेव कामत

शास्त्रीय और आधुनिक दोनों विधा में एक ही बार पुरस्कृत होनेवा व्यक्ति मैं ही हूँ । मधेशियों के लिए तो यह बहुत बड़ा इतिहास है । शायद मेरे लिए यह जीवन का ही सबसे बड़ा खुशी का क्षण है ।

गुरुदेव कामत, संगीतकार एवं गायक

हिमालिनी पत्रिका, अंक जुलाई 2019 । गुरुदेव कामत वरिष्ठ शास्त्रीय संगीतकार एवं गायक हैं । आप का जन्म जन्मः वि.सं. २०१२ साल भाद्र ५ गते सिरहा स्थित लक्ष्मीपुर पतारी वार्ड नं. २, पोखरभीण्डा में हुआ है । आप के पिता जी स्व. लक्ष्मण कामत और माता जी स्व. अग्रिदेवी कामत हैं । गुरुदेव कामत अपने चार भाईयों में से मंझले हैं । नेपाल के शास्त्रीय संगीत जगत में आप किसी पहचान के मुहताज नहीं हैं हम यह कह सकते हैं कि शास्त्रीय संगीत बनाम गुरुदेव कामत । आप शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता हैं, लगभग १४–१५ हजार की संख्या में आप के शिष्य हैं । सन् १९७७ में पटना (भारत) में हुए गजल प्रतियोगिता में आप प्रथम हुए थे । उसके बाद वि.सं. २०४९ साल में रेडियो नेपाल से आयोजित शास्त्रीय तथा आधुनिक गायन दोनों में आप पुरस्कृत हुए । शास्त्रीय गायन विधा में आप प्रथम हुए और आधुनिक गायन विधा में द्वितीय । नेपाल के सांगीतिक इतिहास में इसतरह एक ही बार दोनों विधा में पुरस्कृत होनेवाले आप प्रथम व्यक्ति हैं । वि.सं. २०६१ साल में केवट रत्न उपाधि, वि.सं. २०६४ साल में इमेज चैनल सम्मान, वि.सं. २०७२ साल में मिथिला विकास कोष की ओर से सल्हेश सांस्कृतिक सम्मान, वि.सं. २०७३ साल में मधेशरत्न उपाधि, वि.सं. २०७६ साल में राष्ट्रपति जनसेवाश्री पदक जैसे सैकड़ों सम्मान और पदक से आप विभूषित हैं । यूं कहें तो नेपाल के शास्त्रीय संगीत जगत में आप का महत्वपूर्ण योगदान है, कुछ कार्य ऐसे है, जिसने इतिहास निर्माण किया है । संगीत जगत के ऐतिहासिक व्यक्तित्व में से एक गुरुदेव कामत जी का ‘जीवन–सन्दर्भ आपके समक्ष प्रस्तुत है–

पारिवारिक पृष्ठभूमि
मैं साधारण किसान परिवार से हूँ । मेरे परिवार में सभी लोग किसान थे, किसान होते हुए भी संगीत से लगाव था । मेरे पिता लक्ष्मण कामत जी और दादा मंगल कामत जी भी गाते थे । संगीत के लिए मेरे प्रथम गुरु मेरे भाईसाहब जगदेव कामत हैं । अर्थात् मेरा पहला संगीत स्कूल अपना ही घर है और गुरु अपने ही भाई साहब । इसतरह मैंने घर से ही संगीत सीखना शुरु किया । बाद में कलकत्ता, पटना, दरभंगा जाकर सीखने का अवसर मिला ।

गांव के स्कूल में सिर्फ सात कक्षा तक की पढ़ाई होती थी । बचपन में मैंने वही से स्कूली शिक्षा शुरु की । लेकिन मुझे पढ़ने में रुचि नहीं थी, संगीत ही मेरे जीवन के लिए सब कुछ था । उस समय आज की तरह कलम और कॉपी नहीं होती थी, स्लेट में हम लोग पढ़ते थे । लेकिन मेरे लिए स्लेट, बेञ्च आदि संगीत सामग्री बन जाती थी, उसको बजा–बजा कर मैं गाता था ।
एक दिन की बात है । मैं २ क्लास में था, मेरी उम्र ५ साल की थी । हर दिन के तरह मैं स्लेट बजाकर गा रहा था, अन्य कुछ विद्यार्थी भी गा रहे थे, कुछ नाच रहे थे, जो शिक्षक ने देख लिया । उन्होंने बहुत पीटा । उनका नाम अभी मुझे याद नहीं है, लेकिन वह इण्डियन थे । पिटाई का दर्द सहन करना मुश्किल हो गया, मैं भागकर घर चला गया और बाबू जी को बता दिया । बाबू जी आक्रोशित होते हुए स्कूल पहुँच गए और टीचर को फटकारने लगे । टीचर ने कहा– ‘आप का बेटा सब को बिगाड़ देगा, यह तो बदमाश है । सब को गाना गवाता है, खुद भी गाता है ।’ बाबू जी ने मुझे समझाया, फिर स्कूल जाना शुरु किया । पारिवारिक दबाव से स्कूल तो जाता था लेकिन पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं था । ७ क्लास तक किसी तरह पढ़ लिया ।

सुनिये

एक दिन की बात है, मेरी मुलाकात एक भारतीय नागरिक (मुसलमान) से हो गई, उसका ससुराल हमारे गांव में था । लेकिन उनका नाम आज मुझे याद नहीं है, (सम्भवतः हासन मियां है) । उसको हम लोग ‘जीजा जी’ कहते थे । उस समय मेरी उम्र ११ साल की थी । मैंने ६ साल की उम्र से ही स्टेज प्रोग्राम किया था । उस समय तक स्थानीय स्तर में मुझे सब लोग पहचानते थे । वह भी मुझे जानते थे, वह भी संगीत के शौकीन थे । उन्होंने मुझसे कहा– ‘यहां रहकर क्या करोगे ! तुम संगीत सीखना चाहते हो तो हमारे साथ चलो ।’ मुझे लगा कि वास्तव मेंं जीजा जी ठीक कह रहे हैं । अपने ही भैया से मैंने दो–चार ‘राग’ सीख लिया था । लगा कि यही गांव में रहूंगा तो इससे ज्यादा नहीं सीख पाउंगा ।
ज्ञद्द बजे रात में ३र ५ो८Þ दिया

भादों का महीना था, १२ बजे रात में मैंने घर छोड़ने का निर्णय लिया । इसके बारे में मैंने किसी को भी नहीं कहा । बड़े भाई (स्व. अनिरुद्ध कामत) जी दिल्ली से आए थे । चुपके–चुपके मैंने उनकी जेब में हाथ घुसाया, दो सौ रुपया आईसी (भारतीय रुपैयां) था । वो दो सौ मैंने निकाल लिया । शाम होते ही कुछ कपड़े और वो दो सौ रुपया एक झोला में रख दिया । यूं कहें तो अपनी क्षमता और बुद्धि के अनुसार घर छोड़ने के लिए मैंने सारी व्यवस्था कर ली । जब घर के सभी सदस्य सो गए, तब मैं घर से निकल गया, पानी पड़ रहा था । जगह–जगह नदी में बाढ़ आ रही थी । तब भी मैं निकल गया । उस समय लगभग रात के १२ बज रहे थे ।

रास्ते में एक बूढ़ा व्यक्ति मिला जो शौच के लिए अपने घर से निकले थे मिल गए । छोटे–बच्चे को देखकर उन्होंने पूछा– ‘कौन हो तूम ?’ मैंने कहा– ‘बाबा ! हम पोखरभिण्डा के हैं, हमारा नाम गुरुदेव कामत हैं ।’ मेरा नाम सुनते ही उन्होंने पहचान लिया । फिर पूछा– ‘इतनी रात में कहां जा रहे हो ?’ मैंने कहा कि विशेष काम से बाहर जा रहा हूँ । उसके बाद मैं वहां से आगे बढ़ा ।

पिपराही (मधुवनी जिला) से मैंने बोर्डर क्रास किया, उस समय रात के ३ बज रहे थे । वहां से मुझे लौकाहा जाना था । गाड़ी नहीं थी, तीन घण्टा पैदल चल कर मैं लौकाहा पहुँच गया, सुबह हो चुकी थी । साढे ६ बज चुके थे, मैं वही मुसलमान (जीजा जी) के घर में पहुँच गया, जिन्होंने मुझे संगीत सिखाने का आश्वासन देकर बुलाया था । २–३ दिनों तक मैं उनके ही घर पर रहा । उसके बाद हम लोग दरभंगा गए । दरभंगा से ट्रेन पकड़ कर हम लोग कलकत्ता चले गए । कलकत्ता में उस मुसलमान का कपड़े की दूकान और टेलर था । इसीलिए वह मुझे कलकत्ता ले जा रहे थे । स्थानीय स्तर में उनको पहचाननेवाले लोग भी बहुत थे । जब मैं वहां पहुँचा तो वहां एक रामलीला हो रहा था ।

कलकत्ता में सांगीतिक यात्रा
एक दिन सुबह वह (मुसलमान) मुझे रामलीला में लेकर गए । उस वक्त वहाँ कलाकार प्रैक्टिश कर रहे थे । उन लोगों के साथ मुसलमान की अच्छी दोस्ती भी थी । कुछ देर के बाद मेरा भी परिचय हुआ । मैंने कहा कि मैं गीत भी गाता हूँ । मेरी बात सुनने के बाद उन लोगों ने मुझे एक गीत गाने के लिए कहा । मैंने मन्ना डे का गाया हुआ गाना सुनाया । बुहत तारीफ किए वे लोग और ताली बजाए । मुझे प्रोत्साहन मिला । उसके बाद लगातार मैंने ५–६ गाना गाया । तब उसमें से किसी ने पूछा– ‘बेटा ! तुम किस लिए आए हो ?’ मैंने कहा– मैं संगीत सीखने के लिए आया हूँ ।’ जबाव मिला– ‘एक गुरु हंै बगल में, हम लोग गुरु जी से तुमको मिलवा देते हैं, तब खुद बात करना और सीख लेना ।’ उन लोगों ने यह भी कहा कि यहां रात में कार्यक्रम होता है, तुम भी यही रहो । और आगे कहा– ‘खाने–पीने की व्यवस्था हम लोग ही कर देते हैं, कुछ पैसा भी मिलेगा । सुबह–सुबह गुरु के पास जाकर संगीत भी सीख लेना और रात में यहां प्रोग्राम भी करना ।’ बस इससे ज्यादा मुझे क्या चाहिए ! मैं खुशी–खुशी राजी हो गया ।
वहां मुझे मासिक २५ रुपया पारिश्रमिक मिलता था । रात में मैं गाता था, लोग प्रभावित होकर मुझे टिप्स भी देते थे । अधिकांश लोगों का कथन होता था– ‘छोटा–सा बच्चा गा रहा है तो कुछ तो देना ही होगा ।’ इस तरह टिप्स प्रायः हर दिन ४–५ रुपया तक हो जाता था, जो मेरे मासिक तलब से बहुत ही ज्यादा था । कुछ दिनों के बाद मुझे पंडित संजय चक्रवर्ती (स्व.) गुरु जी के पास ले जाया गया, जहां मुझे लगातार ३ साल तक संगीत सीखने का अवसर मिला । यह वि.सं. २०२१–२२ साल की बात है ।

परिवारजन के लिए मैं मर गया था
तीन साल की अवधि में मैंने घर में कोई भी सम्पर्क नहीं किया । घर वापस होने के बाद पता चला कि घर के लोग कई दिनों तक मुझे खोजते रहे थे । जब कहीं नहीं मिला तो परिवारजन ने मुझे मरा हुआ मान लिया । गांव वालों के लिए भी मैं मर चुका था । सबने मेरा इंतजार करना छोड़ दिया था । जब ३ साल के बाद मैं घर आया तो सब रोने लगे । रो–रो कर पूछने लगे कि इतने साल तक तुम कहां गए थे ? मैंने बताया कि मैं कलकता में था, संगीत सीख रहा । शुरु में तो किसी ने भी विश्वास नहीं किया । उसके बाद मैंने भैया जी को थोड़ा गाकर सुनाया, जो मैंने वहां सीखा था । उसके बाद विश्वास होने लगा । यह मेरी जीवन की सबसे दुःखद घटना है ।

उस समय मैं लगभग ७–८ हजार रुपैयां लेकर आया था । मैं जहां काम करता था, वहां खर्च नहीं होता था । दिन में २५ पैसा खर्च करता था तो सब चीज हो जाता था । कुछ दिनों के बाद घर के लोग कहने लगे कि अब तुम पुनः पढाई शुरु करों, बस्तीपुर में एडमिसन कर देते हैं, संगीत भी सीख लेना । लेकिन संगीत के अलावा मुझे अन्य विषयों की पढ़ाई से मतलब नहीं था । मैंने कहा कि अब मैं नहीं पढूंगा । इसतरह मेरी स्कूली शिक्षा ७ क्लास में ही खतम हो गई ।

 दरभंगा में ज्ञछ साल
कुछ समय के बाद संगीत सीखने के लिए ही मैं दरभंगा (बिहार) चला गया । वहां पंडित गणेशलाल ठाकुर जी थे । वह संगीत के गुरु हैं मैं उनके पास पहुँच गया । उनके साथ रहकर मैंने लगभग १५ साल संगीत सीखा । दरभंगा और मेरा गांव ज्यादा दूरी में नहीं है । ५–६ महीनों के अन्तराल में मैं घर आता रहता था । कुछ दिन रहकर पुनः दरभंगा ही जाता था । भारत में हो या नेपाल में, प्रायः स्टेज प्रोग्राम होता ही रहता था । प्रोग्राम के लिए हम लोग दूर–दूर तक जाते थे । सिर्फ गायन ही नहीं, उस समय मैंने ड्रामा, थियटर, नौटंकी सब किया । यूं कहें तो जवानी मेरी उधर ही समाप्त हो गई ।

उसके बाद जब घर पर आया तो मेरा गौना (द्विरागमन) हुआ, उस समय मैं २८–२९ साल का था । मेरी शादी १० साल में ही हुई थी, उस समय मेरी श्रीमती सगुरदेवी कामत ६ साल की थी । हम लोगों में उस जमाने में बचपन में ही शादी होती है । फिर जब दुल्हन बड़ी हो जाती है तो द्विरागमन होता है यानि दूसरी बार आगमन इसमें शादी की तरह विधियाँ नहीं होती बस लड़के को ससुराल जाकर अपनी दुल्हन को लाना होता है । गांव में तो यह परम्परा आज भी जीवित है । २८ वर्ष की उम्र में नेपाल आने के बाद प्रायः मैं इधर (नेपाल) ही रहने लगा, राजविराज एवं आसपास के जिलों में विभिन्न प्रोग्राम करता रहा । दरभंगा से वापस होने के बाद राजविराज स्थित पबी हाईस्कूल में मैंने ३ साल तक संगीत सिखाया । यह वि.सं. २०४२ से ०४४ साल की बात है ।

काठमाडौँ यात्रा
संगीतकार एवं गायक भरत लामा मेरे दोस्त हैं । हमारे घर के बगल में ही उनका भी घर है । एक दिन वह हमारे घर में आए और मेरी मां से कहने लगे– ‘काकी ! गुरुदेव को हमारे साथ काठमांडू जाने दो, वहां गीत–संगीत के लिए बहुत अवसर होता है ।’ मेरी मां फिर रोने लगी और कहने लगी– ‘नहीं, अब इसको मैं कई नहीं भेजूंगी । हमारा बेटा नेपाल नहीं जाएगा ।’ उस समय काठमांडू को ‘नेपाल’ कहा जाता था ।
भरत जी फिर बोले– ‘यहां रखकर क्या करेगे । नाटक–नौटंकी सब सीखा है इसने । अगर काठमांडू जाएगा तो किसी होटल में रख देंगे, वहां गाने का काम मिल सकता है, फिल्म में भी काम करने का अवसर प्राप्त हो सकता है । अगर ऐसा हुआ तो यह बहुत बड़ा कलाकार बनेगा ।’ मैं भी यही चाहता था । अन्त में हम लोग जीत गए । इसतरह भरत के कहने पर ही मैं वि.सं. २०४५ साल के अन्त में काठमांडू आया ।

एक साल तक मैं काठमांडू में रहा । वि.सं. २०४६ साल में राजनीतिक आन्दोलन शुरु हो गया । लगभग एक महीना तक तो काठमांडू पूर्ण बन्द रहा, कई दिनों तक कफ्र्यु लगा, जिसका असर मेरे ऊपर भी पड़ने लगा । क्योंकि मेरे पास पैसा नहीं था । घर से कम ही पैसा लाया था । वह खतम हो रहा था । मुझे लगा कि कब–तक मैं साथी के पास बोझ बन कर रहूं । इसीलिए मैंने भरत लामा के भैया से २५ रुपैयां माग लिया । २५ रुपैयां से मैंने बस का टिकट लिया और गांव (घर) वापस हो गया ।

वि.सं. २०४७ साल में राजनीतिक आन्दोलन खतम हो चुका था, देश में प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था शुरु हो चुकी थी । उसके बाद फिर भरत जी ने कहा– ‘अब देश शान्त हो गया है, फिर चलो काठमांडू ।’ उनके कहने पर ही मैं फिर आया काठमांडू ।

होमनाथ उपाध्याय और गोपाल योञ्जन जी के साथ मुलाकात
दूसरी बार काठमांडू आने के बाद इधर–उधर भटकना जारी था । इसी क्रम में मेरी भेट नेपाल के वरिष्ठ तबला बादक पण्डित होमनाथ उपाध्याय के साथ हो गई । भरत लामा ही मुझे उनके यहां ले गए थे । उपाध्याय जी मुझे ले गए– गायक गोपाल योञ्जन के पास । उपाध्याय और योञ्जन आज इस भौतिक जगत में नहीं हैं, दोनों स्वर्गीय हो चुके हैं । लेकिन मेरी सांगीतिक यात्रा उन लोगों से मिलने के बाद ही ‘यूटर्न’ होती है । होमनाथ जी ने मेरे बारे में योञ्जन जी से कहा– ‘यह गुरुदेव कामत, इण्डिया से सीखकर आए हैं, लेकिन इनका घर नेपाल में ही है ।’ उसके बाद योञ्जन जी भी मुझे गुरुजी ही कहने लगे । प्रथम भेंट में योञ्जन जी ने मेरा इन्टरव्यु लिया, गायन का टेस्ट लिया । मुझसे उन्होंने क्लासिकल, ठुमरी, भजन आदि गानों को सुना । खास प्रतिक्रिया तो नहीं दी, लेकिन खुश दिखाई दे रहे थे ।

योञ्जन जी का अपना ही एक रिकॉर्डिङ स्टूडियो था, वहां एक गाना का प्रक्टिस भी हो रहा था । बुद्ध संबंधी भजन था, भजन का शब्द और संगीत दोनों योञ्जन जी का ही था, जिसको हाईस्केल में गाना था । भजन का शब्द है– ‘सत्य हो संसार, दुःख मै छ, दुःख को कारण छ, दुःखको निवारण छ… ।’ लेकिन जितने भी वहां कलाकार (गायक) बैठे थे, वे लोग नहीं गा पा रहे थे, रेञ्ज नहीं पहुँच रहा था । ऐसी ही अवस्था में गोपाल योञ्जन जी बोले– ‘गुरु जी आप गा पाएंगे इस गाने को ?’ मैं खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर कहा– ‘गुरुजी अगर आप की कृपा हो तो मैं कोशिश करता हूं ।’ और यह भी कहा कि अगर आप सिखाएंगे तो मैं गा लूंगा ।

उन्होंने कहा– ‘चलिए मैं प्रैक्टिस कराता हूँ, आप को । उन्होंने ने दो–चार बार प्रैक्टिस भी कराया । कुछ देर के बाद मुझे लगा कि इस गाने को गा सकता हूं । मैंने योञ्जन जी से कहा– ‘मैं इसको गा सकता हूं ।’ योञ्जन जी ने एक बार फिर सुना । उसके बाद उन्होंने सब को छुट्टी देकर उक्त गाना मुझे ही गाने को दिया । अच्छी तरह से गीत रिकार्डङ हो गया ।

भोजन में सिर्फ दो सेल
मैं चाहता था कि दीर्घकालीन रूप में मुझे कोई काम मिल जाए, लेकिन नहीं मिल रहा था । कभी–कभार होनेवाले प्रोग्राम में गाने का अवसर मिलता था, कुछ पैसा भी आता था, उसी से मेरी गुजर हो रही थी । लामा जी का साथ भी छोड़ दिया था मैंने । घट्टेकुलो में किराए के कमरे में रहता था । कमरे का किराया मासिक ३ सौ रुपया था । लेकिन कुछ समय के बाद ऐसी नौबत आयी कि मेरे पास सिर्फ १० रुपया था । लगा कि इसी से मुझे जीना है । इसीलिए दिन में मैं सिर्फ २ सेल और आलू का अचार खाता था । १ सेल का २५ पैसा पड़ता था, २५ पैसा में आलू का आचार मिलता था । ७५ पैसा में मेरा भोजन हो जाता था । लगा कि रात में भी खाएंगे तो पैसा जल्द ही खतम हो जाएगा । इसीलिए रात में पानी पीकर सो जाता था । लगभग ४–५ दिने मैंने इसी तरह गुजार दिया ।

फिल्म में अभिनय करने का अवसर
उसके ५–७ दिनों के बाद होमनाथ जी को पता चला कि ‘लिटिल बुद्ध’ की सुटिङ चल रही है । वह मेरे पास आए और पूछे– ‘आप अभिनय भी कर सकते हैं ?’ मैंने कहा– ‘नाटक और थियटरों में काम किया हूँ । हां, कर सकता हूँ ।’ बुहत ही ठंड का समय था, शायद पौष का महीना था । सुटिङ भक्तपुर में हो रही थी । सुटिङ युनिट में मैं भी वहां गया । सुबह का समय था, मैं भूखा ही वहां पहुँचा था, रात में भी कुछ नहीं खाया था । जाते ही देखा कि वहां खाने के लिए सारी व्यवस्था है । चाय, ब्रेड, दूध सब कुछ था, जो चाहते थे, वह ले सकते थे । मुझे खयाल है– जाते ही मैं १५–१६ ब्रेड खा लिया, ३–४ ग्लास दूध पी लिया । उसके बाद तो मैं मस्त हो गया । शुटिङ शुरु हो गई । ४ दिन तक शुटिङ चली । मेरी भूमिका सामान्य थी । फिल्म में दरबार का दृश्य है, दरबार की गायक की तरह मुझे भी अपना भूमिका निर्वाह करना था, जो मैंने किया । काम खतम होने के बाद मुझे मिला– १६ हजार रुपैयाँ । मुझे लगा कि आज तक मैंने जीवन में कभी भी १६ हजार रुपया नहीं देखा है, अब तो मैं १६ जुनी तक काठमांडू में रह सकता हूँ । यह वि.सं. २०४८ साल की बात है ।

संगीत जगत में एक इतिहास
हर साल चैत्र २० गते रेडियो नेपाल का वार्षिकोत्सव होता है । इसी वार्षिकोत्सव के अवसर पर मैंने भी भाग लिया । उस समय (वि.सं. २०४९) शास्त्रीय संगीत और आधुनिक संगीत दो विधा में देशभर से प्रतिस्पर्धा हो रही थी । मैंने दोनों में भाग लिया । दोनों में मुझे पुरस्कार मिला । प्रथम पुरस्कार ६ हजार का था और द्वितीय पुरस्कार ३ हजार का । शास्त्रीय संगीत में मैं प्रथम हो गया था और आधुनिक संगीत में दूसरा । यह नेपाल का पहला इतिहास है । शास्त्रीय और आधुनिक दोनों विधा में एक ही बार पुरस्कृत होनेवा व्यक्ति मैं ही हूँ । मधेशियों के लिए तो यह बहुत बड़ा इतिहास है । शायद मेरे लिए यह जीवन का ही सबसे बड़ा खुशी का क्षण है ।

शिवरात्री और मेरा टर्न
शिवरात्री का समय (वि.सं. २०४९) था, मुजफ्रपुर (बिहार) से एक मारवाडी आए थे, उन्होंने पशुपति में एक सांगीतिक प्रोग्राम किया था, जहां नेपाल के बड़े–बड़े गायक और संगीतकार भजन गाने के लिए पहुँच रहे थे । काठमांडू में रहनेवाले सभी कलाकारों को आमन्त्रित किया गया था । आमन्त्रित कलाकारों की सूची में मेरा नाम नहीं था । मुझे लगा कि मैं नया–नया हूं, कम ही लोगों से जान–पहचान है, इसीलिए निमन्त्रण नहीं आया । फिर भी होमनाथ जी ने कुछ पहल किया और मेरा नाम रख दिया । प्रायः सभी प्रोग्राम में नये–नये व्यक्तियों को शुरु में ही बोलने के लिए एवं गाने के लिए दिया जाता है, यह परम्परा आज भी है । मुझे भी शुरु में ही गाने का अवसर मिला । अर्थात् एक व्यक्ति गा के चले जाने के बाद दूसरे नम्बर पर मेरा नाम था ।

उस समय में भारत के भजन सम्राट अनुप जलौटा का भजन भी नेपाल में खूब चलता था । उनका भजन मैं बिल्कुल उन्हीं की तरह गाता था । लेकिन जब मैं स्टेज पर चढ़ा तो कुछ लोग मुझे स्टेज से आउट करने के लिए हुटिङ करने लगे । मैं दुबला–पतला था, काला भी था । यहां के लोगों को लगा कि यह नहीं गा पाएगा । तब भी मैंने गाना शुरु किया, जब मैंने ‘चदरिया झिनी रे झी…’ भजन गाने के लिए अलाप शुरु किया तो ताली की गड़–गडाहट शुरु हो गई । जब यह गाना समाप्त हुआ तो ‘वान्स मोर’ की हुटिङ शुरु हो गई । जो निरन्तर जारी रहा, लगभग २ घण्टा मैंने अकेले ही गाया । इस अवधि में मेरे पीछे जो भी नये–नये कलाकार थे, वह सब निकल चुके थे । यूं कहें तो मेरी सांगीतिक यात्रा में यहां से मेरा दूसरा यू–टर्न हुआ ।

संयोग से इस प्रोग्राम में ‘कलानिधि इन्दिरा संगीत महाविद्यालय’ की अध्यक्ष इन्दिरा श्रेष्ठ भी आई थी । प्रोग्राम समाप्त होने के बाद वह मुझसे मिली और कहा– ‘मैं संगीत का स्कूल पुनः शुरु करने जा रही हूँ, आप का साथ चाहिए ।’ वह पहले से ही संगीत का स्कूल संचालन कर रही थी, लेकिन बीच में वह बंद था । उन्होंने कहा कि अगर मैं साथ देता हूं तो वह पुनः स्कूल संचालन करेगी । इस तरह उन्होंने मुझे कलानिधि इन्दिरा संगीत महाविद्यालय में एक संगीत गुरु के रूप में ले गई । उस समय मुझे मासिक ५ सौ रुपैयां पारिश्रमिक मिलता था । मैंने वहां २ साल तक संगीत सिखाया । उसके बाद मैंने कलानिधि इन्दिरा संगीत महाविद्यालय छोड़ दिया । यह वि.सं. २०५१ साल की बात है ।

न्यूज ब्रजाचार्य के साथ काम
बागबजार में ‘नेपाः इस्टिच्यूट’ नामक संगीत पाठशाला था । कलानिधि संगीत पाठशाला से छूटने के बाद होमनाथ जी ही मुझे वहां लेकर गए । मेरे जाने के बाद उस इस्टिच्यूट में संगीत सीखनेवालों की संख्या ३०–४० की संख्या में पहुँच चुकी थी । शायद वहां मुझे ४–५ महीने ही हुए थे, होमनाथ जी ही ३ महीना के लिए स्वीट्जरल्याण्ड जाने का प्रोग्राम लेकर आए । उनके ही पहल में हम लोग (टीम के साथ) स्वीट्जरल्याड चले गए । जब ३ महीना के बाद वहां से नेपाल वापस हुए तो नेपाः इस्टिच्यूट बंद हो चुका था । जिसके चलते मैं बेरोजगार हो गया !
लेकिन संयोग से मुझे ‘खेलौना’ (खिलौना) नामक फिल्म में गीत गाने का अवसर मिला । रेडियो नेपाल में उस गाने का रिकॉर्डिङ हो रहा था । गिटार में थे– न्यू बज्राचार्य । इसतरह मेरी मुलाकात वरिष्ठ संगीतकार बज्राचार्य से हो गई । गाना खतम होने के बाद बज्राचार्य जी ने मुझसे पूछा– ‘गुरुजी आप तो स्वीट्जरल्याण्ड से आए है, क्या कर रहे हैं ?’ मैने कहा– ‘स्वीट्जरल्याण्ड से तो आए हैं, लेकिन अभी मेरे पास कोई भी काम नहीं है, काम की तलाश है ।’
उन्होंने कहा– ‘अगर आप साथ दीजिएगा तो मैं एक स्कूल खोलूंगा ।’ मैंने कहा– ‘हां ठीक है, मैं साथ देता हूं ।’ उन्होंने ‘डोरेमी संगीत पाठशाला’ खोल लिया, जहां मैंने ११ साल तक संगीत गुरू के रूप में काम किया । इस अवधि में मुझे बहुत बार विदेश भ्रमण का अवसर मिला । संगीतकार एवं गायक के रूप में मैंने स्वीटजरल्याण्ड, जर्मन, फ्रान्स, आष्ट्रेलिया, दुबई, कतार, मलेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका आदि देशों का भ्रमण किया है । डोरेमी में ११ साल काम करने के बाद वि.सं. २०६१ साल में मैंने अपना ही संगीत पाठशाला शुरु किया । जिसका नाम है– गुरुकुल संगीत पाठशाला । उसके बाद मैं इसी संस्था में क्रियाशील हूँ ।

मेरे शिष्य
मैंने पूरा जीवन ही संगीत क्षेत्र में बिता दिया है, अनुमानित १४–१५ हजार की संख्या में मेरे शिष्य हैं । संगीत क्षेत्र में स्थापित शिष्य के बारे में आप ने तो पूछ दिया, लेकिन मैं विद्यार्थी के नाम से अपना नाम कमाना नहीं चाहता हूं । अगर कोई विद्यार्थी मेरा नाम लेते हैं तो वही मेरी कमाई है, उसी में मेरी खुशी है । तब भी आपने पूछ ही लिया है तो मैं मेरे प्रथम शिष्य का नाम लेता हूं । लोचन भट्टराई मेरी प्रथम शिष्या हैं, जो नेपाल की प्रसिद्ध गायिका है । भट्टराई संगीत सीखने के लिए मेरे घर पर आती थी ।

शास्त्रीय संगीत की अवस्था
विशेषतः मैं शास्त्रीय संगीत का विद्यार्थी हूँ, क्लासिकल गाता हूँ, क्लासिकल सिखाता हूँ । नेपाल की सांगीतिक पृष्ठभूमि हो या भारत की, दोनों देशों की पृष्ठभूमि एक ही है, केवल भाषा अलग है । पहले का भू–गोल भी एक ही था, न नेपाल था, न भारत । वेद–पुराणों में भी लिखा है कि भारत वर्षे उत्तराखण्डे, उस जमाने से है शास्त्रीय संगीत । जब संसार की सृष्टि हुई, तब से है शास्त्रीय संगीत । भाषा के कारण हम लोगों ने अन्तर किया है– भारतीय शास्त्रीय संगीत और नेपाली शास्त्रीय संगीत । लेकिन इन दोनों का इतिहास एक ही है ।
हां, पहले नेपाल में शास्त्रीय संगीत का प्रचार बहुत कम था । दो–चार गुरूजन थे, लेकिन वह सब दरबार में सीमित थे । बाहर उसका प्रचार–प्रसार नहीं होता था । वि.सं. २०५७–५८ के बाद कुछ माहौल बना । उस समय तक कई लोग बाहर से शास्त्रीय संगीत सीखकर आ चुके थे, यहाँ सीखनेवाले भी अपना–अपना स्कूल खोलने लगे, तब शास्त्रीय संगीत बाहर आने लगा । आज की अवस्था बहुत ही अच्छी है । मुझे लगता है कि आज १०० से भी ज्यादा शास्त्रीय संगीत सिखानेवाले स्कूल हैं और हर जगहों में विद्यार्थी भी है । इस हिसाब से आज शास्त्रीय संगीत का प्रचार–प्रसार हो रहा है । कोई व्यक्तिगत भी शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम करते हैं, उससे भी प्रचार–प्रसार होता है । मैं भी शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम करता आ रहा हूँ ।

सिल्भर–जुबली की तैयारी
विगत लम्बे समय से मैं शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम करता आ रहा हूँ । अपने व्यक्तिगत खर्च से शास्त्रीय संगीत का एकल साँझ होता आया है, जो इस साल २५वां वर्ष पूरा होने जा रहा है । आगामी फाल्गुन–चैत महीना में मेरा २५वां एकल साँझ होनेवाला है । अपने ही व्यक्तिगत खर्च और व्यवस्थापन में इसतरह शास्त्रीय संगीत का एकल साँझ करनेवाला व्यक्ति दूसरा कोई है, इसके बारे में मुझे ज्ञान नहीं है । मुझे तो लगता है कि अभी तक किसी ने भी वल्र्ड में ही इसतरह का कार्यक्रम नहीं किया होगा, जो मैं करने जा रहा हूँ । इसतरह भी शास्त्रीय संगीत का प्रचार–प्रसार होता आया है ।

अन्य क्षेत्र में रुचि नहीं है
गीत–संगीत के अलावा मेरी रुचि अन्य किसी भी क्षेत्र में नहीं है । सिर्फ, संगीत और संगीत ही है । अर्थात् संगीत मेरा जीवन है, संगीत मेरी पूजा है, आराधना है । संगीत के अलावा मैं अन्य कुछ नहीं देखता हूँ । अगर संगीत क्षेत्र में नहीं आया होता तों मैं आज खेती–किसानी कर रहा होता । क्योंकि मेरा जन्म किसान के घर में हुआ है । ज्यादा से ज्यादा थोड़ा–सा पढ़लिख कर कोई नौकरी करता । लेकिन बचपन में ही मेरी रुचि संगीत में थी । आज मैं दिन में १० घण्टा संगीत का क्लास करता हूँ । अर्थात् १० घण्टा विद्यार्थी को संगीत सिखाता हूँ । खुद के लिए १ घण्टा समय निकालता हूँ । सुबह लगभग साढे ३ बजे उठता हूँ । सुबह के नित्य कर्म के बाद आधा घण्टा व्यायाम (योग) में बीत जाता है । उसके बाद १ घण्टा संगीत का अभ्यास (साधना) करता हूँ । उसके बाद गौशाला से पुतलीसडक स्थित अपने ही सांगीतिक स्कूल ‘गुरुकुल संगीत पाठशाला’ तक आता हूँ । हर दिन वहाँ से पैदल चलकर ही यहां आता हूँ, जो एक प्रकार से व्यायाम भी है । सुबह ६ बजे से ही मेरा क्लास शुरु होता है, इसीलिए उससे पहले ही मैं यहाँ पहुँचता हूँ । यही मेरी दिनचर्या है ।

जवानी में मारपी६
हां, आज मेरे लिए संगीत ही सब कुछ बन गया है । लेकिन जवानी में मैं फुटबॉल, वॉलीवाल खूब खेलता था । इतना ही नहीं, कुस्ती भी खेलता था, मारपीट होती थी । क्रोध एवं आक्रोश में अगर किसी के साथ मारपीट हो जाता है तो अपने से कमजोर को बहुत पीटता था । कभी–कभार पिटाई भी खानी पड़ती थी । अगर कोई आदमी कहता है कि मेरा कोई भी दुश्मन नहीं है । मैं तो कहता हूँ कि वह गलत बोल रहा है । और कोई कहता है कि मेरा कोई मित्र नहीं, यह भी गलत है । हर व्यक्ति का दुश्मन और मित्र समान रूप में होते हैं । जैसे की मैं यहाँ हूँ, मेरा जो पेशा और पोजिशन है, उसको देखकर मुझे दुश्मन माननेवाले व्यक्ति भी तो हो सकते हैं । मेरे ही तरह जो संगीत पाठशाला खोलकर बैठे हैं, उन लोगों को लग सकता है कि मेरे पास बहुत विद्यार्थी आते हैं, नाम भी चर्चित है । इसी विषय को लेकर अगर कोई सोचते हैं तो उसके लिए मैं दुश्मन भी हो जाता हूँ । सभ्य भाषा में कहें तो प्रतिस्पर्धी बन जाता हूँ । लेकिन मैं मानता हूँ कि मेरा कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है । मैं सब का सम्मान करता हूँ ।

नई पी९िÞयों के लिए सन्देश
शास्त्रीय संगीत हो या आधुनिक संगीत, जो कोई इस क्षेत्र में आना चाहते हैं तो सबसे पहले शास्त्रीय संगीत सीखना जरुरी है । क्योंकि हर संगीत की जननी है– शास्त्रीय संगीत । उसके बिना आप अधूरे हैं । एक कोई गाना गाने से और उस गाने को रातों–रात ‘हिट’ होने से कोई भी गायक और संगीतकार नहीं हो सकता है । अगर वास्तव में संगीत का मर्म जानना है तो शास्त्रीय संगीत सीखना जरुरी है ।
मैं सभी अभिभावकों से अनुरोध करता हूं कि आप के बच्चों की रुचि किस चीज में हैं, उसकी पहचान जरुरी है । अगर संगीत में है तो बिना हिचक उसको संगीत के क्षेत्र में जाने दीजिए । किसी भी बच्चों के ऊपर कोई भी जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए । अगर आप अपने बच्चों के ऊपर डाक्टर–इन्जीनियर पढ़ने के लिए दबाव देते हैं तो उसका भविष्य खराब हो सकता है । हां, डाक्टर–इन्जीयिर के प्रति ही उसकी रुचि है तो उसको वही विषय पढ़ा सकते हैं । उसको संगीत में लाने की जरुरत भी नहीं है । नहीं, आपके बच्चे संगीत सीखना चाहते हैं और आप उसको रोकने की कोशिश में हैं तो आप गलत कर रहे हैं । यह मेरा निवेदन हैं । संगीत सीखने के लिए उत्सुक जितने भी नव प्रतिभाएं हैं, उन लोगों से मैं भी अनुरोध करुंगा कि आप संगीत सीखना चाहते हैं तो शास्त्रीय संगीत सीखें बिना आप संगीत क्षेत्र में अधूरे रहेंगे ।

गलती से ही सीखते हैं
हम लोग मनुष्य हैं । कोई स्वीकार करें या ना करें, हर एक व्यक्ति के जीवन में कोई ना कोई गलती जरुर करता है । मैं मनुष्य हूँ, मनुष्य से ही गलती होती है । उसी से हम लोग सीखते भी हैं । अगर कोई व्यक्ति गलती ही नहीं करेगा तो उससे सीखने का मौका भी नहीं मिलेगा, सुधारने का मौका भी नहीं होगा । मेरे बाबु जी भी गलती किए होंगे, जिसकी कोई गणना नहीं है ।
हां, पश्चतापजन्य गलती जानबूझकर मैंने नहीं की है । कई गलती हुई है, जो अनजाने में हुई है । मुझसे ऐसी गलती भी नहीं हुई है, जिसको लेकर मुझे किसी से माफी मांगनी पड़े । अगर मुझसे कोई गलती हुई है और उसको लेकर आपमें से कोई दुखी हैं तो मैं इसी सन्देश के द्वारा माफी मांगता हूँ ।
आध्यात्मिक हूं
हर मनुष्य, किसी ना किसी धर्म से आबद्ध है । जिसको हम लोग अध्यात्म भी कहते हैं । मैं भी अध्यात्म से जुड़ा हूँ, सनातन धर्म ही मेरा धर्म है । संसार का सबसे बड़ा और पुराना धर्म ही यही है । लेकिन जो जिस धर्म में है, उसके लिए वही धर्म ठीक है । मैं अपने धर्म को बहुत मानता हूँ । पूजापाठ भी करता हूँ । सुबह–शाम भगवान का नाम लेता हूँ, जाप करता हूँ । हिन्दू धर्म में जितने भी प्रमुख देवी–देवता हैं, उन सब का स्मरण करता हूँ । मेरे कुल देवता है घर पर, मैं उसका भी स्मरण करता हूँ । संगीत का साधक हूँ, इसीलिए विशेष रूप से सरस्वती को स्मरण करता हूँ । माता–पिता को स्मरण करता हूँ, वे भी हमारे लिए देवता के सामान हैं ।
चेतना ही मानव जीवन
मानव जीवन वही है, जो किसी के लिए बुराई ना सोचें, किसी के प्रति डाह, ईष्र्या ना करें, किसी की सहायता कीजिए, किसी को दुःख नहीं दीजिए । यही मानव जीवन है । मानव जीवन में इन्सान को हमेशा उस कठिनाई से बचना है, जहां आप को कोई आरोप ना लगाए, यही तो मानव जीवन है । नहीं तो जानवर और मानव में क्या अन्तर रहेगा ? जिसमें मानवीय चेतना नहीं है, वह मानव नहीं है । अर्थात् मानवी चेतना ही, मानव होने का प्रमाण है ।
और क्या चाहिए ?
मेरे तीन बेटे है, एक बेटी है । एक छोटे बेटे के अलावा सब की शादी हो गई है । हम सब लोग संयुक्त रूप में रहते हैं । शादी–शुदा बेटा–बहु, पोता–पोती सब एक ही जगह में रहते हैं । आज के जमाने में इसतरह रहनेवाले कम ही परिवार होते हैं । यूं कहे तो हमारा संयुक्त परिवार है । अपने सन्तान के ऊपर मेरा जो कर्तव्य था, वह मैंने निर्वाह किया । सब अपने–अपने जगहों में काम कर रहे हैं । मेरी मान्यता है कि उन सब का अपना–अपना भाग्य हैं ।
मेरी मान्यता है कि जो सुख के लिए कुछ करता है, वह सुखी नहीं हो सकता । जो कुछ अच्छा काम करके खुश होता है, वह सुखी रहता है । लेकिन खुशी प्राप्ति के लिए जो करते हैं, उससे खुशी मिलनेवाला नहीं है । जीवन में कभी भी मैं उदास नहीं रहा । संगीत में मैंने जो कुछ किया, इससे मुझे जितना मिलता हैं, मैं उसी में खुश हूँ । क्योंकि जो भगवान की कृपा है, वही मुझे प्राप्त होता है । मैंने अभी तक न बैंक बैलेन्स किया, न ही मेरा काठमांडू में घर है । यहां जमीन भी नहीं है । इस कमाई से गांव में घर–जमीन नहीं खरीदा है । बस अपना परिवार पाल रहा हूँ, तब भी मैं बहुत ही खुश हूँ ।
एक कहावत है–
साई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाएं !
आपु भूखा न रहूं, साधु ना भूंखा जाए ।
अर्थात् भगवान हम को उतना ही दो, जिसमें हम खुश हैं । जो दो–चार हमारे अतिथि आए, वह हमारे घर से भूखें ना जाएँ, बस ! और क्या चाहिए जीवन में ?

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