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पडोस में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग और हम:
र्सर्यनाथ उपाध्याय

 

दक्षिण एशिया में भ्रष्टाचार की व्यापकत की बात बार बार उठने वाला एक गम्भीर विषय है। कहते हैं कि ‘अति र्सवत्र वर्जयेत’ शायद यही कारण है कि पिछले कुछ महीनों से जिस तरह भारत में पहले २ जी स्पेक्ट्रम घोटाला, फिर काँमनवेल्थ खेलों में घोटाला, आदर्श अपार्टमेण्ट घोटाला, और ना जाने ऐसे कितने ही घोटाला का पर्दाफाश होने की वजह से भारत को हजारों करोड रुपैये का चूना लगा है। एक के बाद दूसरे घोटाला सामने आने से नाराज भारत की सिविल सोसायटी द्वारा उठाए गए भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने एक सशक्त रूप ले लिया जिस वजह से वहां की सरकार को भी आखिरकार आम जनर्समर्थन में हो रहे नागरिक समाज के आन्दोलन के आगे झुकना पडा। भारत में भ्रष्टाचार की गहर्राई किस कदर हावी है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वहां पर प्रतिबन्धित रक्तचंदन की सैकडों टन लगभग रोज ही सैकडों किमी का सफर तय कर नेपाल के रास्ते चीन तक पहुंचाया जाता है। नेपाल में तो फिर भी कभी कभार समाचार सुनने को मिल जाता है कि रक्तचंदन बरामद हुआ है लेकिन भारत में जहां कि सैकडों किमी के दौरान ना जाने कितने ही पुलिस पोष्ट और जांच चौकी होने के बावजूद आखिर किस तरह ट्रक के ट्रक रक्तचंदन नेपाल तक आसानी से आ जाता है। इससे साबित होता है कि भ्रष्टाचार और घुसखोरी भारत में पूरी तरह हावी है। ऐसे विकराल स्थिति में जनता का सडक पर उतरना स्वाभाविक है।
बांगलादेश में भी भ्रष्टाचार का मुद्दा पिछले चुनाव का प्रमुख मुद्दा बना था। इस भ्रष्टाचार में बांगलादेश की पर्ूव प्रधानमंत्री के ही खिलाफ जांच चल रही है। भ्रष्टाचार की जांच करने के लिए बांगलादेश में एक सशक्त आयोग का गठन भी हो गया है। पाकिस्तान की बात तो अलग ही है। वहां तो भ्रष्टाचार इस कदर हावी है कि शायद उसे निजात पाना अगले कुछ महीनों नहीं बल्कि सालों में भी नामुमकिन सा दिखता है।
इन सबको दरकिनार कर दिया जाए और नजर जब नेपाल पर पडती है तो मालुम चलता है कि नेपाल तो दक्षिण एशिया में शायद सबसे भ्रष्ट देश बन गया है। हमारे देश में पजेरो काण्ड, सांसद खरीेद फरोख्त काण्ड, त्रिभुवन विमानस्थल के कस्टम में तस्करों के लिए लाईन खुला करने सोने और ड्रग्स की तस्करी, डाँलर का अपचलन और ना जाने क्या क्या। ये तो विगत में हुए कुछ घोटालों का एक छोटा सा उदाहरण है। जिनको अब शायद हम भूल भी चुके है। इसके बाद जो नेपाल में सुदान घोटाला और हाल ही में मीडिया में आ रही स्पेक्ट्रम घोटाला जिसमें कि लाखों करोडÞ रूपये का घोटाला का उजागर होने की बात कही जा रही है। नेपाल जैसे गरीब मुल्क में जहां आधे से ज्यादा आबादी को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती ऐसे में नेपाल में ४० करोड की सामान खरीद पर ३२ करोडÞ रूपये का सिर्फघोटाला ही होता है। भारत में हो रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ लर्डाई का असर यहां भी देखने को मिले ताकि नेपाल में भी भ्रष्टाचारियों को सबक मिल सके।
प्रत्येक देश में भ्रष्टाचार विरुद्ध आन्दोलन की पृष्ठभूमि, उद्देश्य और गति वहां की राजनीतिक और सामाजिक परिवेश से निर्धारित होता है। लेकिन जिस किसी अवस्था में भी आन्दोलन आम जनता को केन्द्र में रख कर ही की जाती है। भारत में इस समय हर्ुइ भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन भविष्य में क्या रूप लेगा और इसका दूरगामी परिणाम क्या होगा यह तो भविष्य में ही मालूम चलेगा। लेकिन एक बात तो तय है कि यदि इस आन्दोलन में अमर्ूत, विवादास्पद और व्यापक आर्थिक, सामाजिक परिवर्तन की मांग बढती गई तो भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन धीरे धीरे स्वतः ही निर्रथक होता जाएगा। इस कारण इसके लक्ष्य प्राप्ति निश्चित, व्याहारिक और प्राप्य होने के तरफ लक्षित होना चाहिए। नेपाल का उदाहरण लिया जाए तो २०५८ साल में नेपाल में भी भ्रष्टाचार संबंधी बहस देश पर हावी हुआ। लेकिन यह हमेशा ही विषय केन्द्रित ही रहा। इसी के परिणामस्वरूप नयां कानून भी बना, आठ महीनों से रिक्त रहा आयुक्त का पद भी भरा जा सका संपत्ति जांचबूझ आयोग गठन भी हुआ और बहुतों पर कार्रवाही भी हर्ुइ। इसलिए भावना के बल पर अन्यत्र हुए आन्दोलन को माँडल मानकर  ऐसा हो जाए इस बात की कल्पना करने के बजाए आत्मविश्वास के साथ आगे बढÞने वाले को ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है। भारत में हो रहे लोकपाल स्थापना के आन्दोलन को देखा जाए तो इससे प्राप्त करने की चाह रखने वाले संस्था से भी अधिक सशक्त और प्रभावकारी हमारे देस्ह में अख्तियार दुरूपयोग अनुसंधान आयोग है। भविष्य में हमारे तरह का आयोग भारत में भी स्थापित होगा कह कर विश्वास नहीं किया जा सकता है।
भ्रष्टाचार नियंत्रण अभियान के सर्ंदर्भ में इतना कहने के बावजूद भी एक बात के प्रति नेपाली जनता को सचेत रहने की आवश्यकता है। ये आन्दोलन एक बार कुछ समय के लिए ही करने से र्प्याप्त नहीं होता है। ये लगातार होने वाली और जनता को इस प्रति सचेत रहने की अवस्था है। अभी हमारे यहां पर दो तरह की ऐसी प्रवृति हावी है और ऐसे काम सब जिसका अन्त होना आवश्यक है। अन्यथा भ्रष्टाचार के विरूद्ध के आंदोलन शिथिल होगा तो हमारा आन्दोलन आगे जाने की बजाय पीछे ही खिसकता चला जाएगा। पहला है अख्तियार के अधिकार में कटौती करना और दूसरा इसको प्रभावहीन बनाना। इन दोनों कामों को अपने अपने ढंग से अंजाम दिया जा रहा है। २०६३ साल के अन्तरिम संविधान से अख्तियार के कुछ अधिकारों को कटौती किया गया था। और विभिन्न प्रकार के र्सार्वजनिक पदाधिकारियों के हक में अलग अलग निकाय बनाने की व्यवस्था की गई। संवैधानिक निकाय जैसी उच्च हैसियत में रहे आयोग के विकल्प में सरकार के मातहत के और ऐन द्वारा खडा किया गया निकाय तुलनात्मक रूप से अख्तियार जैसे न तो स्वतंत्र हो सकती है और ना ही स्वायत्त ही। विशेषज्ञता के कारण से भी अख्तियार जैसी हैसियत उसकी नहीं हो सकती है। ऐसी वयवस्था कहने का मतलब अख्तियार से बचना और बचाने का प्रयत्न ही है।
इसी तरह का प्रावधान भावी संविधान में रहने के लिए संविधान सभा की संबंधित समिति ने प्रस्ताव किया है। प्रस्तावित मसौदे में चरम प्रतिगामी के रूप में अख्तियार के अधिकार की कटौती कर इसके हैसियत को मिट्टी में मिलाने की कोशिश की जा रही है। प्रस्तावित मसौदा से अख्तियार द्वारा अपने अनुसंधान और अभियोजन में स्वतंत्र नहीं रह सकता है। इससे महान्यायाधिवक्ता के मातहत में उसके निर्देशन अनुसार अनुसंधान किया जाना चाहिए और मुद्दा दर्ता भी उसी के आज्ञा अनुसार किया जाएगा।
वास्तव में उत्तरदायित्व लिए हुए लोगों को समझना चाहिए कि संसार गतिशील है। यह किसी का इंतजार नहीं करता है। इतिहास कभी कभी अकल्पनीय और हिंसात्मक मोड पर भी लेकर जाता है। और उस समय कौन कहां पहुंचेगा यह कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन नेपाल में अभी तक भ्रष्टाचार के विरूद्ध आन्दोलन कभी भी हिंसात्मक नहीं हुआ है ये अच्छी बात है और यह जनांदोलन का भी रूप नहीं ले पाया है। भ्रष्टाचार नियंत्रण में कुछ अच्छे काम की शुरूआत होने के बावजूद यह गति नहीं ले पाया है। जिस कारण से खराब प्रवृति हावी होती जा रही है। अति र्सवत्र वर्जयेत नेपाल के नेताओं को भी यह बात गांठ बना लेनी चाहिए।
-लेखक सर्वोच्च न्यायलय के पर्ूव प्रधानन्यायाधीश हैं ।)

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