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अनुच्छेद ३७० की समाप्ति, एक सार्थक पहल : श्वेता दीप्ति

डॉ. श्वेता दीप्ति, हिमालिनी  अंक अगस्त 2019 |‘मैं सोने जा रहा हूं । कल सुबह अगर तुम्हें श्रीनगर में भारतीय सैनिक विमानों की आवाज सुनाई न दे, तो मुझे नींद में ही गोली मार देना.’ यह बात, २६ अक्टूबर १९४७ की रात जम्मू–कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने अपने अंगरक्षक कप्तान दीवान सिंह से कही थी । इससे कुछ देर पहले ही उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय का फैसला लिया था और ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर कर दिए थे । कश्मीर को लेकर दुनिया के सबसे ज्यादा उलझे हुए विवादों में एक की जड़ में जो विलय संधि है, वह ऐतिहासिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण है, पर देखने में निहायत ही मामूली लगती है ।

साल १९४७ में जिस विलय संधि के आधार पर जम्मू कश्मीर की रियासत भारत का हिस्सा बन गई, उसमें महज दो पेज थे और इसे खास तौर पर तैयार भी नहीं किया गया था । उस समय पांच सौ से ज्यादा रियासतें थीं । भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के मुताबिक, रियासतों के शासकों पर निर्भर था कि वे भारत या पाकिस्तान, किसमें अपने राज्य का विलय करते हैं । दिल्ली के गृह मंत्रालय ने एक फार्म तैयार किया था । इसमें खाली जगह छोड़ी गई थी, जिनमें रियासतों के नाम, उनके शासकों के नाम और तारीख भरे जाने थे । कई बार यह कहा जाता है कि कश्मीर के महाराजा ने विलय संधि पर दस्तखत नहीं किया था । यह सच नहीं है । इस पर रहस्य बना हुआ है कि उन्होंने उस कागज पर अपना नाम कब डाला था, जिसके तहत उनका राज्य भारतीय शासन के अधीन आ गया था । कश्मीर में भारतीय सैनिक की तैनाती के पहले उन्होंने उस कागज पर दस्तखत कर दिया था या उसके बाद किया था, यह अभी भी रहस्य है ।

जम्मू–कश्मीर उन चंद रियासतों में एक था, जो भारत और पाकिस्तान के बीच स्थित था और असली फैसला वहीं लिया जाना था । अंग्रेजाें ने यह मान लिया था कि जम्मू–कश्मीर पाकिस्तान में मिलेगा । कुल मिला कर बंटवारे का तर्क यह था कि आस पास के मुस्लिम बहुल इलाके पाकिस्तान का हिस्सा बन जाएंगे और इस रियासत की लगभग तीन चौथाई आबादी मुसलमानों की थी । परिवहन, भाषा और व्यापार के रिश्ते भी पाकिस्तान की ओर ही इशारा करते थे । लेकिन महाराजा हिंदू थे । बंटवारे और आजादी के साथ बढ़े हुए सांप्रदायिक तनाव की वजह से उनके लिए अपने राज्य को स्पष्ट रूप से मुस्लिम राज्य का हिस्सा बनाना मुश्किल था ।

उस समय की प्रमुख राजनीतिक हस्ती शेख अब्दुल्ला ने भी भारत में विलय का समर्थन किया था, हालांकि बाद में उनका झुकाव आजादी की ओर हो गया था । किस नए राज्य में शामिल हुआ जाए, इस पर फैसला करने में हरि सिंह काफी समय ले रहे थे । १५ अगस्त १९४७ को जब ब्रिटिश राज का अंत हुआ, ब्रिटिश और भारतीय अधिकारियों की काफी कोशिशों के बावजूद, हरि सिंह किसी फैसले पर नहीं पंहुच सके थे । आने वाले हफ्ताें में इसके संकेत मिले थे कि महाराजा भारत में विलय की तैयारी कर रहे थे । पाकिस्तान से आने वाले कबायली लड़ाकों के आक्रमण करने पर उन्होंने विलय का फैसला कर लिया ।

उसके बाद, महाराजा ने उस कागज पर दस्तखत कर दिया, जिसने उनकी रियासत को भारत का हिस्सा बना दिया । आधिकारिक रूप से यह कहा जाता है कि भारत के गृह मंत्रालय के उस समय के सचिव वीपी मेनन २६ अक्टूबर १९४७ को जम्मू गए और विलय के कागजात पर महाराजा से दस्तखत करवा लिया । इस तरह कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया । अब बात करें धारा ३७० की जो भारत की आजादी के ७३ साल बाद भी कश्मीर को पूरी तरह से भारत का नहीं होने दे रहा था ।

आखिर क्या था ३७०
कुछ दिनों पहले तक जम्मू तथा कश्मीर भारतीय संघ में एकमात्र ऐसा राज्य था, जिसका अपना अलग राज्य संविधान था । ब्रिटिश प्रभुत्व की समाप्ति के साथ ही जम्मू और कश्मीर राज्य १५ अगस्त, १९४७ को स्वतंत्र हुआ था ।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद १ के अंतर्गत, जम्मू तथा कश्मीर राज्य भारतीय संघ का संवैधानिक राज्य था तथा इसकी सीमाएं भारतीय सीमाओं का एक भाग था । दूसरी तरफ संविधान के भाग २१ के अनुच्छेद ३७० में इसे एक विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था । जिसके अनुसार, भारतीय संविधान के सभी उपबंध इस पर लागू नहीं होते थे ।

२० अक्तूबर, १९४७ को पाकिस्तान समर्थित आजाद कश्मीर सेना ने राज्य के अग्रभाग पर आक्रमण किया । इस असामान्य स्थिति में, राज्य के शासक ने राज्य को भारत में विलय करने का निर्णय लिया । इसके अनुसार, २६ अक्तूबर, १९४७ को पं । जवाहरलाल नेहरु तथा महाराजा हरिसिंह द्वारा ‘जम्मू और कश्मीर के भारत में विलय–पत्र’ पर हस्ताक्षर किए गए । इसके अंतर्गत, राज्य ने केवल तीन विषयों यानी रक्षा, विदेशी मामले तथा संचार पर ही अपना अधिकार छोड़ा । जिसके तहत भारत के संविधान में अनुच्छेद ३७० सम्मिलित किया गया । इसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि जम्मू तथा कश्मीर से सम्बंधित राज्य उपबंध केवल अस्थायी हैं, स्थाई नहीं ।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३७० राज्य को विशेष दर्जा देता था । इस अनुच्छेद के तहत यह घोषित किया गया था कि संसद को जम्मू–कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित कानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन लेना पड़ेगा । यह भी उल्लेखित था कि राष्ट्रपति, राज्य की संविधान सभा की सिफारिश के साथ सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा, यह घोषणा कर सकते हैं कि यह अनुच्छेद संचालन समाप्त हो जाएगा या उनके द्वारा निर्दिष्ट संशोधनों और अपवादों के अनुसार परिचालित होगा ।

१९७४ में हस्ताक्षर किए गए इंदिरा–शेख समझौते के तहत राज्य की शक्तियों की ताकतें और परिभाषित की गई थीं ।
क्या था भारत का वह कानून जो सिर्फ जम्मू और कश्मीर पर ही लागू होता था ?
३७० के समाप्त होने से पहले तक जम्मू–कश्मीर राज्य का अपना ही अलग संविधान था जिसे भारतीय क्षेत्र के भीतर एक विशेष दर्जा दिया गया था । कानून के कुछ पहलुओं पर यह शेष भारत से भिन्न था । यहाँ भारतीय संविधान की धारा ३५६ लागू नहीं होती थी ।
विशेष दर्जा के कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं था । इसे राष्ट्रपति शासन (-presidents Rule_ ) भी कहा जाता है ।

संपत्ति का अधिकार
अब तक कश्मीर के लोगों के लिए यह एक मौलिक अधिकार था, जबकि यह भारत के बाकी लोगों के लिए ऐसा नहीं है । १९७६ का शहरी भूमि कानून जम्मू–कश्मीर पर लागू नहीं होता था । धारा ३७० के तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि खरीदने का अधिकार है । यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू–कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते थे । इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि वे भारतीय नागरिक जो अन्य राज्यों और महिलाओं, जम्मू–कश्मीर के अलावा किसी भी राज्य के पुरुषों से शादी करते हैं उन्हें भूमि खरीदने या राज्य के भीतर कोई संपत्ति रखने की अनुमति नहीं थी ।
धारा ३७० की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते थे इसी धारा की वजह से कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता मिल जाती थी । इसके अलावा, राज्य नीति के मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्यों और निर्देशक सिद्धांत राज्य के लिए लागू नहीं होते थे ।

आपातकालीन प्रावधान
केंद्र जम्मू–कश्मीर में वित्तीय आपातकाल घोषित नहीं किया जा सकता था । आंतरिक अशांति या होने वाले खतरे के आधार पर आपातकाल घोषित करने के लिए, राज्य सरकार द्वारा किए गए अनुरोध के बाद राष्ट्रपति के द्वारा ही किया जा सकता था । भारतीय संविधान की धारा ३६० यानी देश में वित्तीय आपातकाल लगाने वाला प्रावधान जम्मू–कश्मीर पर लागू नहीं होता था ।

भारतीय दंड संहिता
जम्मू–कश्मीर राज्य में रणबीर दंड संहिता Ranbir Penal Code या  RPC  एक लागू आपराधिक कोड था । भारत के संविधान के अनुच्छेद ३७० के तहत यहां पर भारतीय दंड संहिता लागू नहीं होती थी । ब्रिटिश काल से ही इस राज्य में रणबीर दंड संहिता लागू थी । दरअसल, भारत के आजाद होने से पहले जम्मू–कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत था और उस समय वहाँ डोगरा राजवंश का शासन था । महाराजा रणबीर सिंह वहां के शासक थे, इसलिए १९३२ में महाराजा के नाम पर रणबीर दंड संहिता लागू की गई थी ।

जम्मू और कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट १९७८
इस अधिनियम को १९७८ में प्रशासनिक हिरासत (  administrative detention) के लिए जम्मू–कश्मीर में पहली बार पेश किया गया था । मूल रूप से, यह अधिनियम सरकार को दो साल की अवधि के लिए परीक्षण के बिना १६ वर्ष से ऊपर के किसी भी व्यक्ति को सजा देनी की अनुमति देता है ।

२०११ में किए गए संशोधनों में १६ से १८ साल व्यक्ति की न्यूनतम आयु को बढ़ा दिया गया । इसके तहत सार्वजनिक विकार के मामले में अधिकतम हिरासत अवधि एक साल से तीन महीने तक कम हो गई और राज्यों की सुरक्षा में शामिल होने वाले मामलों में दो साल से छह महीने तक ।

हालांकि संशोधन के लिए एक प्रावधान है और हिरासत के लिए अवधि क्रमशः एक वर्ष और दो साल तक बढ़ाई जा सकती है । पुलिस आरोपी के खिलाफ एक केस फाइल तैयार करती और इसे डिप्टी कमिश्नर को जमा करती है, जिसमें यह बताया जाता है कि इस अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति को क्यों हिरासत में लिया जाना चाहिए. फिर एक्ब् के तहत हिरासत आदेश जिला मजिस्ट्रेट ÷ डिप्टी कमिश्नर द्वारा जारी किया जाता है ।

इस अधिनियम को २४ घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित होने के लिए आरोपी के अधिकार, जनता में उचित परीक्षण, वकील तक पहुंच, रिश्तेदारों से मिलने की क्षमता, गवाहों की परीक्षा उत्तीर्ण करने, दृढ़ विश्वास के खिलाफ अपील आदि के प्रावधानों के रूप में अन्यायपूर्ण माना गया ।

आतंकवादी और असुरक्षित गतिविधियां अधिनियम १९९०
PSA की तरह, इस अधिनियम ने भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता और अखंडता को भंग करने और भविष्य में ऐसे कृत्यों को करने के संदेह पर १ साल तक की अवधि के लिए हिरासत की अनुमति दी है । इस अधिनियम में बल, गिरफ्तारी और हिरासत के उपयोग में सुरक्षा बलों को विशेष शक्तियां दी थीं और इसे कश्मीर में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था. ऐसा कहा जाता है कि कश्मीर ने TADA के तहत लगभग १९, ०६० लोगों को गिरफ्तार किया था । इस अधिनियम को कई अवसरों पर काले कानून के रूप में जाना जाता है ।

जम्मू और कश्मीर की सीमाओं में वृद्धि या कमी नहीं हो सकती है ः
यह अनुच्छेद ३७० के कारण भारतीय संसद राज्य की सीमाओं को बढ़ा या कम नहीं कर सकती थी इसी के कारण भारत Aski Chin से संबंधित मामला सुलझाने में सक्षम नहीं था, क्योंकि यह जम्मू–कश्मीर का क्षेत्र है, इसे विधेयक का समर्थन है और असेंबली के निचले सदन में पारित कर दिया गया है ।

जम्मू–कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती थी । जम्मू–कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग था । अब तक यहां की विधानसभा का कार्यकाल ६ वर्षों का होता था जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल ५ वर्ष का होता है । जम्मु–कश्मीर में भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं माना जाता था । यहां भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश मान्य नहीं होते थे । भारत की संसद जम्मू–कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यन्त सीमित क्षेत्र में कानून बना सकती थी । कश्मीर में पंचायत के पास कोई अधिकार नहीं था । कश्मीर में अल्पसंख्यक हिन्दूओं और सिखों को १६ प्रतिशत आरक्षण नहीं मिलता था ।

यदि जम्मू कश्मीर की कोई महिला भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जाती थी । इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू–कश्मीर की नागरिकता मिल जाती थी । कश्मीर में महिलाओं पर शरियत कानून लागू होता है । धारा ३७० की वजह से कश्मीर में RTI लागू नहीं था, CAG लागू नहीं होता था, भारत का कोई भी कानून लागू नहीं होता था ।

अनुसूचित जनजातियों का राजनीतिक आरक्षण ः
ST को जम्मू–कश्मीर में कोई आरक्षण नहीं दिया गया था, हालांकि राज्य में ११.९ प्रतिशत ST हैं ।
सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून
सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून (AFSPA) की जरूरत उपद्रवग्रस्त पूर्वोत्तर में सेना को कार्यवाही में मदद के लिए ११ सितंबर १९५८ को पारित किया गया था. जब १९८९ के आस पास जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद बढ़ने लगा तो १९९० में इसे वहां भी लागू कर दिया गया था ।
AFSPA कब लागू किया जाता है ?
किसी क्षेत्र विशेष में AFSPA तब लागू किया जाता है जब राज्य या केंद्र सरकार उस क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र कानून’ अर्थात डिस्टर्बड एरिया एक्ट (Disturbed Area Act) घोषित कर देती है । १९९० में जम्मू–कश्मीर में हिंसक अलगाववाद का सामना करने के लिये सेना को विशेष अधिकार देने की प्रक्रिया के चलते यह कानून लाया गया, जिसे ५ जुलाई, १९९० को पूरे राज्य में लागू कर दिया गया । तब से आज तक जम्मू–कश्मीर में यह कानून लागू है, लेकिन राज्य का लेह–लद्दाख क्षेत्र इस कानून के अंतर्गत नहीं आता ।
AFSPA कानून में सशस्त्र बलों के अधिकारी यह शक्तियां मिलती हैं ः किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है, सशस्त्र बल बिना किसी वारंट के किसी भी घर की तलाशी ले सकते हैं और इसके लिए जरूरी बल का इस्तेमाल किया जा सकता है, इस कानून के तहत सेना के जवानों को कानून तोड़ने वाले व्यक्ति पर गोली चलाने का भी अधिकार है, यदि इस दौरान उस व्यक्ति की मौत भी हो जाती है तो उसकी जवाबदेही गोली चलाने या ऐसा आदेश देने वाले अधिकारी पर नहीं होगी, किसी वाहन को रोककर गैरकानूनी ढंग से हथियार ले जाने का संदेह होने पर उसकी तलाशी ली जा सकती है, सशस्त्र बलों द्वारा गलत कार्यवाही करने की दशा में भी, उनके ऊपर कानूनी कार्यवाही नही की जाती है, सैन्य अधिकारी परिवार के किसी व्यक्ति, संपत्ति, हथियार या गोला बारूद को बरामद करने के लिये बिना वारंट के घर के अंदर जा कर तलाशी ले सकता है और इसके लिये बल प्रयोग कर सकता है ।
ये सारी व्यवस्था जम्मू और कश्मीर में ही लागू होते हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है कि अनुच्छेद ३७० का उद्देश्य जम्मू–कश्मीर को अस्थायी विशेष दर्जा देना था और इसके परिणामस्वरूप शेष देश के साथ राज्य को शामिल किया गया और इस क्षेत्र में सामंजस्य बनाए रखा गया किन्तु यही ३७० भारत के बाकी हिस्सों के लोगों के साथ अलगाव का एक निश्चित स्तर बन गया था । जिसके समाप्त होने की उम्मीद ३७० के समाप्त होने के साथ ही जनमन के दिलों में जगने लगी है ।

मोदी सरकार का ऐतिहासिक फैसला
बहरहाल आज का सच यह है कि भारत के केंद्र सरकार ने जम्मू–कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाला अनुच्छेद ३७०, जिसे आम भाषा में धारा ३७० भी कहा जाता है, खत्म कर दिया है । इसके साथ ही केंद्र ने इस राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने का फैसला किया है । भारत की सरकार ने अपने इस कदम को ऐतिहासिक बताया है तो विपक्ष ने इसे संविधान के साथ मखौल करार दिया है । जो भी हो, इसमें कोई दो राय नहीं कि जम्मू–कश्मीर के इतिहास में यह एक अहम मोड़ है ।

भारतीय जनता पार्टी ने इस बार भारत की राजनीति में धमाकेदार प्रवेश किया था और तभी से जनमानस में यह भावना घर करने लगी थी कि अब भारतीय इतिहास के कई मसलों पर कोई ऐतिहासिक निर्णय जरुर लिया जाएगा । जिसकी पहली कामयाबी तीन तलाक पर सरकार को मिली और दूसरी ३७० की समाप्ति पर और अब नजरें टिकी हैं राम जन्मभूमि मसले पर जिसकी सुनवाई भी जारी है । कश्मीर के लेकर जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को वहाँ एक नई सुबह का इंतजfर है । वहीं घाटी में या विपक्ष में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जिन्हें सरकार का यह फैसला नई सुबह नहीं बल्कि काली रात लग रही है ।

बदलते परिवेश में सवाल यह है कि कौन जीतेगा ? उम्मीद या नाउम्मीदी । इस रहस्य से पर्दा जल्दी नहीं उठने वाला, पर उठेगा जरूर । पर्दा उठने का इंतजार केवल जम्मू–कश्मीर के लोगों को ही नहीं बल्कि पूरे भारत और विश्व को है । दो तरह के भाव भारत की फिजा में तैर रहे हैं । एक तरफ भारत के ज्यादातर हिस्सों में राहत, खुशी, सुखद आश्चर्य और दशकों पुरानी साध पूरा होने का भाव है । उन्हें लगता है कि देश के साथ जम्मू–कश्मीर के एकीकरण का अधूरा एजेंडा पूरा हो गया है जो एक कमी थी जो पूरी हो गई ।
दूसरी तरफ घाटी में ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है उनकी सबसे अमूल्य चीज चली गई है । इस वर्ग के साथ खड़े होने वाले भी भारत में मौजूद हैं । कुछ स्वयं को बुद्धिजीवी कहलाने वाले वर्ग हैं जो घोषित रूप से मोदी विरोधी हैं और जिन्हें सरकार के इस फैसले पर किसी बहुत बड़े खतरे का आभास हो रहा है । जो मानते हैं कि मोदी और भाजपा कुछ अच्छा कर ही नहीं सकते । अनुच्छेद ३७० को खत्म किए जाने के बाद जम्मू कश्मीर में बेचैनी भरी शांति छायी हुई है । ३७० की समाप्ति की घोषणा के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के नाम संदेश दिया जिसमें उन्होंने कश्मीर की जनता के मन से भय और आशंका निकालने की कोशिश की ।
उन्होंने कहा कि जम्मू–कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाला संविधान का अनुच्छेद खत्म हो गया है । यह एक वास्तविकता है । उन्होंने जो नहीं कहा वह यह कि सबके हित में होगा कि इस वास्तविकता को स्वीकार कर लें । सत्तर साल से जिन्हें लगता था कि भारतीय संविधान का यही प्रावधान उनका सबसे बड़ा कवच है, वे इस वास्तविकता को स्वीकार करेंगे ? प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश को लेकर तरह तरह की अटकलें थीं । एक वर्ग को उम्मीद थी कि वह शायद अपनी पार्टी की विचारधारा और उसके मुख्य मुद्दे की बात करेंगे । लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने दलगत राजनीति से परे जाकर बात की । इसके बावजूद वे एक राजनीतिक संदेश देना नहीं भूले । उन्होंने कहा कि अनुच्छेद ३७० के खत्म होने के साथ ही अलगाववाद, परिवारवाद, आतंकवाद और भ्रष्टाचार की छुट्टी होगी ।
उन्होंने जम्मू–कश्मीर के युवाओं को सीधे संबोधित करते हुए नई राजनीतिक व्यवस्था की बात की । मोदी ने कहा कि परिवारवाद ने नये लोगों, युवाओं को आगे नहीं आने दिया। मोदी का इशारा था कि पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव ने ऐसे युवाओं के लिए संभावना का द्वार खोला है । उन्होंने अपने संबोधन में जम्मू–कश्मीर के पूरे सामाजिक ताने बाने को ध्यान में रखकर बात की ।
एक तबके को यह उम्मीद थी कि मोदी अपने भाषण में पाकिस्तान पर जरुर बरसेंगे पर अपने अड़तीस मिनट के संबोधन में पाकिस्तान की सिर्फ एक बार चर्चा की वह भी यह कहते हुए कि पाकिस्तान जम्मू–कश्मीर के विशेष दर्जे का इस्तेमाल भावनाएं भड़काने के लिए हथियार के रूप में करता रहा है । मोदी ने एक–एक करके ऐसे मुद्दे गिनाए जिनके रास्ते में यह विशेष दर्जा रोड़ा बना हुआ था ।
३७० को समाप्त किया जाना इतना सहज नहीं था और आगे भी इसकी राह सरल नहीं है । सरकार जानती है कि विरोधी जमकर इस कदम का विरोध करेंगे क्योंकि कश्मीर मुद्दा उनकी राजनीतिक रोटियों को सेकने का एक सशक्त माध्यम था । परंतु भाजपा सरकार इसके लिए तैयार है । राजनीतिक विरोध से अधिक आतंकवादी और हिंसात्मक कार्यवाही से सरकार का डरना लाजिमी है क्योंकि भारत का पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान सरकार के इस कदम से बौखलाया हुआ है और रोज एक नई धमकी दे रहा है । जबकि देखा जाय तो खुलकर सामने आने की उनकी हिम्मत नहीं है परन्तु आतंक के साए में कायरतापूर्ण कदम उठाने का डर अवश्य है । फिलहाल तो वैश्विक स्तर पर भी उसकी कश्मीर समबन्धी माँग को नकारा जा चुका है और वह अलग–थलग पड़ गया है ।

भारत के प्रधानमंत्री मोदी एक वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था को उभरते हुए देखना चाहते हैं । इसीलिए उनकी नीति में राजनीतिक विमर्श से ज्यादा सामाजिक और विकास के विमर्श पर जाेर देना है । कश्मीर के हालात आने वाले दिनों में क्या रुख अख्तियार करेंगे किसी को पता नहीं है । सरकार और प्रधानमंत्री की उम्मीद इस बात पर टिकी है कि सूबे के युवा और आम कश्मीरी सरकार के इस कदम में अपना हित देखेगा । यही वजह थी कि अपने राष्ट्र के नाम संदेश में उन्होंने ज्यादा जोर जम्मू–कश्मीर और लद्दाख के विकास के विजन पर दिया ।
प्रत्येक परिवर्तन अपने साथ अनिश्चितता और असुरक्षा लाता है । बदलाव जितना बड़ा होता है अनिश्चितता और असुरक्षा भी उतनी ही बड़ी । कश्मीर घाटी आज इसी अनिश्चितता और असुरक्षा के दौर से गुजर रही है । राज्य का राजनीतिक नेतृत्व अपनी विश्वसनीयता खो चुका है । कश्मीर घाटी में आने वाले दिनों में क्या होगा यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि घाटी के अवाम को प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन पर कितना भरोसा है । वैसे देखा जाय तो कश्मीर की अवाम पंचायत और स्थानीय चुनाव के समय प्रधानमंत्री मोदी पर अपना यकीन जता चुके हैं । चुनाव बहिष्कार के बावजूद भारी पैमाने पर मतदान हुआ । अलगाववादी नेता फिलहाल जेल में हैं । जब जेल से आजाद होंगे तो सम्भवतः उन्हें भ्रष्टाचार सहित कई तरह के मामलों का सामना करना पड़ सकता है ।
पाकिस्तान के साथ जुड़ी उनकी गर्भनाल एनआईए ने काट दी है । घाटी में आतंकवादी नेटवर्क की कमर टूट चुकी है । पत्थरबाजी उद्योग बंद हो चुका है ।

सवाल है कि अनुच्छेद ३७० का विरोध करने वाले देखें तो किसकी तरफ । घाटी से बाहर उन्हें समर्थन मिलेगा । पर वह उनके कितने काम का होगा कहना कठिन है । कल क्या होगा यह भविष्य निर्धारित करेगा किंतु वर्तमान में मोदी सरकार ने अनुच्छेद ३७० को हटाकर भारतीय नागरिकों का मन जरुर जीत लिया है । आजादी के ७३वें साल में स्वतंत्रता दिवस के चंद रोज पहले मोदी सरकार ने एक इतिहास रचा है जो अविस्मरणीय रहेगा ।

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