Sat. Oct 19th, 2019

मधेस में बाढ़ का प्रायोजित षडयंत्र : अजयकुमार झा

हिमालिनी  अंक अगस्त , अगस्त 2019 हाल ही में आए भयानक पीड़ादायी जल सैलाव के कारण महोत्तरी के सदरमुकाम जलेश्वर के इर्दगिर्द के सैकड़ो गाँव को दो हप्तो तक बाढ़ ने अपनी आगोश में दवोचे रखा । यही अवस्था मधेस के बीसों जिलों का है ।

मधेश के विभिन्न जिलो में हर साल आने वाली बाढ़ समस्या है या समस्या कुछ और है ? दरअसल बाढ़ का पानी अगर समस्या रही होती तो लोग हर साल बाढ़ में डूबने वाले इलाके को छोड़ कर सुरक्षित इलाकों में चले गए होते । जबकि लोग डटे हुए हैं । हरेक साल मानव सृजित आपदाओं को सहन करना यहाँ के नागरिको का प्रारब्ध बन गया है । फिर भी अपनी धर्म, संस्कृति, भूखण्ड और सभ्यता को संजोए रखने के लिए इतनी भीषण आपदाओं को भी हृदयंगम कर दीर्घकालीन विकास और निकास के प्रतीक्षा में आशान्मुख नागरिक नेपाल में किन्ही मोदी व्यक्तित्व के इंतजÞार में दिखाई देते हैं । मैंने दसकों से बाढ़ पीडि़त लोगों से इस समस्या के निदान हेतु गहन बात चीत की है । जिसमें नेपाल–भारत दोनों देश के नागरिक शामिल हैं । महोत्तरी पर्सा के विवेकानद ठाकुर का कहना था कि इस बाढ़ से हर वर्ष करोड़ो की क्षति होने के वावजूद भी कोई ठोस पहल नहीं दिखाई देता है । इसके परिणाम स्वरुप यहाँ के सभी व्यापारिक और औद्योगिक केंद्र धरासायी होने लगे हैं । सोनुखारा के रामलाला चौधरी ने सापÞm तौर पर उल्लेख किया कि जबतक चूरे पहाड़ का संरक्षण और संवर्धन तथा उत्पादन मूलक तरीके से नदी नियंत्रण नहीं होगा तबतक मधेस का कल्याण नहीं हो सकता । महोत्तरी के इन्द्रजीत पाण्डे से बात करने पर उन्होंने किसान के दुरावस्था और अन्धकारमय भविष्य के प्रति दुःख और चिन्ता जताते हुए बोले कि, ‘एक समय था जब यहाँ के किसान अपनी उत्पादन को भारत भेजते थे ।

परन्तु आज वही किसान भारत से खरीद कर जीवन यापन करने को मजबूर हैं । हमलोग सरकार की लापरवाही और षडयंत्र के शिकार होते जा रहे हैं । मरई के श्याम सुन्दर झा, रतबरा के देवेन्द्र राय, का कहना था कि, हर एक दो वर्ष के वाद ऐसी भयानक बाढ़ आती है, जो पिछले बाढ़ के रिकार्ड को तोड़ जाता है । इस साल भी यही हुआ है । अबतक का सबसे भयानक और विनाशकारी इस जल तांडव से इस क्षेत्र के एक व्यक्ति भी अछूता नही रह सका । घर घर पानी घुसा हुआ था । लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे । सामान, अनाज और पशुओं को देखने वाला भी कोई नहीं था । न खाने को अन्न और न पकाने को जलावन । लोग कई दिनोतक चूड़ा भूजा और अन्य खाद्य वस्तुओं पर निर्भर रहे । गैस इंधन का भयानक ब्लैक मार्केटिंग होने लगा । बच्चे और बूढ़े क्या खाएंगे, यह चिंता सता रही थी । हमलोग किंकर्तव्यबिमूढ़ थे । अतः सरकार, को चाहिए कि तटबंध को वैज्ञानिक ढंग दें या फिर हमें बिना तटबंध का ही जीने दें । हम खुद अपना समाधान खोज लेंगे । सरकार के अयोग्य निति तथा कर्मचारी के भ्रष्ट चरित्र के कारण हम अपनी संस्कृति और सभ्यता को नष्ट नहीं कर सकते । महोत्तरी के जलेश्वर से पश्चिम बखरी ग्राम के ९८ वर्षीय श्री रामेश्वर राय और महेश्वर राय जी से इस सम्बन्ध में बात करने पर पता चला कि महोत्तरी के रातो नदी का नियंत्रण आज से लगभग ५५ वर्ष पहले हुआ था । जिससे लोगों का जीवन सहज हुआ, खेती अच्छी होने लगी, सड़क से आवत जावत सुरक्षित हुआ, परन्तु आजतक नदी नियंत्रण के लिए कोई ठोस तथा वैज्ञानिक पहल नहीं हुआ । दीर्घकालीन सुरक्षा हेतु उपलब्धि मूलक कदम नहीं उठाया गया । जो की परम आवश्यक है । ५५ साल पहले और आज के समय में शिक्षा तथा प्रबिधि में १००प्रतिशत उन्नति हो चुका है। जिसे हमारे इंजिनियर लोग क्यों नहीं समझ पाते है ?

अरवों का बजट सिर्फ परंपरागत ढाचे की देख रेख में ही वर्वाद होता आया है । इससे तो बेहतर यही होगा कि जितना का बजेट बाँध के संरक्षण में लगाया जाता है वह सीधे जनता के खाते में डाल दिया जाय । जनता खुद अपना रास्ता निकाल लेगी । नदी से सिंचाई का काम पहले जनस्तर से ही होता था । लोग वर्षा और बाढ़ संभावित खतरों से निपटने के लिए पूर्व तैयारी करके रहते थे । जिससे अनाज और अन्य आवश्यक सामग्रियों का संरक्षण सहज रहता था । ग्रामीण स्तर से उद्धार हेतु लोग हरदम तत्पर रहते थे । भाईचारा और अपनत्व हमारे बीच होता था । भिठ्ठामोड़ बोर्डर से सटे बिहार के चोरौत( पुपरी जहाँ पानी महीनो तक जमा रहता है, के नागरिकों ( श्री भुवनेश्वर चौधरी, श्री मल्वर मिश्र, श्री राम निवास झा) का कहना है कि बाढ़ के कारण हम लोगो की हालत दिन प्रति दिन बदतर होती जा रही है । वहाँ के लोग चाहते हैं कि दोनों देश के आम नागरिक अपनी ही स्तर और आवश्यकता के हिसाव से नदी नियंत्रण करें । दोनों देशों की सरकार हमें नजरअंदाज करती आ रही हैं । परन्तु दो देश और सीमा के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है । वैसे दोनों देशों के नागरिक आपस में इस विषय पर विचार विमर्श करते रहते हैं । आपसी भाईचारा और मधुर सम्बन्ध को कायम रखे हुए हैं । कोई किसी का विनास नहीं सोचता । अन्य देशों के पड़ोसियों से कही ज्यादा यहाँ के लोग अपनत्व को बनाए हुए हैं ।

वैसे नदियों के पानी से सिंचाई को लेकर भारत–नेपाल सम्बन्धों की शुरुआत लगभग १९१० में हुई जब भारत की तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने शारदा नदी की धारा (शारदा, घाघरा की एक सहायक नदी है, जो कर्णाली का भारतीय भाग है ।) को नियंत्रित करने और तराई के इलाकों की सिंचाई के लिए भारत–नेपाल सीमा पर एक बैराज का प्रस्ताव किया । जिसका निर्माण १९२८ में पूरा हुआ । इस बराज के दाहिने किनारे से १४, ००० घनसेक क्षमता की एक नहर निकाली गई जिससे उत्तर प्रदेश में सिंचाई शुरू हुई । इसी क्रम में भारत–नेपाल सीमा पर अन्य बहुत सी छोटी बड़ी नदियों पर लोअर शारदा, गिरिजापुर, सरयू, लक्ष्मणपुर, बाणगंगा और डांडा में बराज बना कर भारत में सिंचाई की व्यवस्था हुई । जिसे नेपाल, भारत की एकतरफा लाभ मानता है और खुद का घाटा । नेपाल के प्रबुद्ध लोगों की मान्यता है कि इन्हीं संरचनाओं के निर्माण से दोनों देशों के रिश्तों में खटास आई है’ । ध्यान देने योग्य बात यह है कि नेपाली नेता और अधिकारियों ने जानबुझकर षडयंत्रपूर्वक ही भारत के साथ ऐसा समझौता किया था कि इसका सीधा लाभ मधेस के किसानो को न मिले । नेपाली नेता अधिकारी मधेस के प्रति द्वैध और वैमनष्यपूर्ण सोच से ग्रसित हैं । नदी नियंत्रण और नहर निर्माण से नेपाल में आखिर कौन लाभान्वित होता ? मधेसी समुदाय, जो उन्हें मंजूर नहीं था । अब भारत को गाली देकर मधेसियों को यह हमदर्दी दिखाना चाहता है कि हमें भारत ने लूटा है । भारत धोखेवाज है । परन्तु अब मधेस के लोग इस तथ्य से वाकिपÞm है कि हमारा असली मित्र और शत्रु कौन है । आज भी विभिन्न बहाने चूरे पहाड़ को नष्ट किया जा रहा है । इसका दूरगामी लक्ष्य मधेस को मरुभूमि बनाकर मधेसियो को कमजोर कर गुलामी की जिंदगी जीने को बाध्य करना या पलायन होने के लिए मजबूर करना है । नेपाली शासक के तराईबासी प्रति के इस षडयंत्र को भारत और मधेसियों को गंभीरता पूर्वक लेना चाहिए।

भारत–नेपाल के बीच हुई महाकाली सन्धि (१९९६) भी ऐसे ही सन्देह के दायरे में आती है । इस महाकाली संधि का अलम्बरदार ३१५ मीटर ऊँचा पंचेश्वर बांध है जिसके पीछे १२.३ अरब घनमीटर पानी संचित कर के रखा जा सकता है और इससे ६, ४८० मेगावाट पन–बिजली का उत्पादन संभव हो सकेगा । इस संधि के दायरे में शारदा बैराज, टनकपुर बैराज और प्रस्तावित पंचेश्वर परियोजना शामिल हैं । इस व्यवस्था के मुताबिक, नेपाल सूखे के मौसम (१६ अक्टूबर से १४ मई) के दौरान ४.२५ एमक्यूबरसेकेंड पानी और आर्द्र मौसम में (१५ मई से १५ अक्टूबर) २८.३४ एमक्यूबर सेकेंड पानी इस्तेमाल कर सकता है । टनकपुर में, इस संधि के मुताबिक नेपाल को पूर्वी एफ्लक्स बाँध से आर्द्र मौसम में २८.३ एमक्यूबरसेकेंड पानी और शुष्क मौसम में ८.५ एमक्यूबरसेकेंड लेने का अधिकार होगा । जब पंचेश्वर परियोजना अस्तित्व में आएगी और टनकपुर में शुष्क मौसम में पानी की उपलब्धता बढ़ने लगेगी तो नेपाल को अतिरिक्त पानी प्रदान किया जाएगा ।
१९९६ में जब दोनों देशों के बीच महाकाली संधि पर हस्ताक्षर किये गये तो पहले तो शुरू–शुरू में यह लगा कि बांध निर्माण संबंधी सारी आशंकाएँ अब सरकारी स्तर पर समाप्त हो गई हैं । लेकिन फिर से मधेस सुसंपन्न होने के खतरा (जो नेपाली शासकों के भीतर सदा से है) ने षडयंत्र का बीजारोपण कर नेपाल की राजनैतिक पार्टी एमाले को आगे बढ़ाकर अवरोध पैदा किया गया । जो अबतक जारी है ।
लक्ष्मणपुर बाँध के साथ ही कलकलवा तटबन्ध, भारत के धार्चुला जिला से महाकाली नदी में मिलानेवाली धौलीगङ्गा नदी का बाँध, दाङ के सीमा क्षेत्र में स्थित दाराखोला में बना कोइलाबास बाँध, कपिलवस्तु के महलीसागर बाँध, रुपन्देही के मर्चवार क्षेत्र नजदीक निर्मित रसियावाल खुर्दलोटन तटबन्ध के कारण हजारों लोग विस्थापित हो रहे हैं । इसीप्रकार, रौतहट जिला से भारत की ओर बहने बाली लालबकैया नदी में निर्मित तटबन्ध और रौतहट के ही बैरगनिया तटबन्ध ने नदी के प्राकृतिक बहाव को ही मोड दिया है । जिससे रौतहट के सदरमुकाम गौरसहित दर्जनौ गाँवों को जलमग्न करता आया है । ऐसे ही रौतहट के बैरगनिया चक्रबात से जुड़े बागमती तटबन्ध, धनुषा और सिरहा जिला के सीमा होते हुए भारत की ओर प्रवाहित कमला नदी के दोनों किनार में निर्मित तटबन्ध, सिरहा जिला के पास बना तटबन्ध, सप्तरी जिला के सदरमुकाम राजविराज से दक्षिण लालापट्टी नदी में निर्मित खाँडो बाँध, सप्तरी सीमावर्ती क्षेत्र में भारत द्वारा निर्मित कुनौली तटबन्ध, मोरङ जिल्ला के बक्राहा बाँध ने हजारों हेक्टर भूमि को डुबोते रहा है ।

 

दक्षिण एशिया में, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों का प्रवाह बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के बीच बँटता है । इन घाटियों में ऐसे करोड़ों लोगों का आवास हैं, जो स्थायी विकास के आर्थिक और सामाजिक दोनों संकेतकों के स्तर पर कमजोर हैं ।
चीन में ह्वांग हो नदी पर ऐतिहासिक रूप से दुनिया में सबसे पुराने तटबंध मौजूद हैं जिनका निर्माण ईसा से सात शताब्दी पहले शुरू किया गया था । इन्हें पूरा होने में कई शताब्दियां लगी थीं । वर्तमान की तरह मिट्टी से ही बांध बनाया गया था । वास्तव में पानी की अधिकता अकेले बाढ़ की समस्या का कारण नहीं होती और असली परेशानी बाढ़ के पानी के साथ आने वाली गाद (सिल्ट) से पैदा होती है । यह गाद नदी की पेंदी में बैठ जाती है और आने वाले वर्ष में जब नदी में फिर पानी आता है तो जलस्तर ऊपर उठ जाता है । और फिर बाँध को तोड़कर पानी नए रास्ते से निकल जाता है । नदियां इसी तरह से अपनी धारा परिवर्तित करती हैं, इसमें गाद का प्रमुख योगदान होता है । यहां की कोसी, वागमती, रातू, आक्सी, नदी इस तरह के परिवर्तन के लिए कुख्यात हंै ।

 

कोसी नदी पर प्रस्तावित तटबंधों के निर्माण हेतु भारतीय विशेषज्ञ १९५४ में मई से सितम्बर के बीच चीन भेजे गए थे । इन विशेषज्ञों की सलाह पर कि चीन में ह्वांग हो नदी के तटबंध दुरुस्त तरीके से काम कर रहे हैं । यह काम १९५५ में शुरू कर के १९६३ में पूरा कर लिया गया । जबकि अंग्रेज १०० वर्ष तक नदी नियंत्रण के विरोध में थे । अगस्त १९६३ में डलवा में पहली बार तटबंध टूटा था । फिर अक्तूबर १९६८ में दरभंगा के जमालपुर में और अगस्त १९७१ में सुपौल के भटनिया में तटबंध टूटे । सहरसा में तीन बार अगस्त १९८०, सितंबर १९८४ और अगस्त १९८७ में बांध टूटे । जुलाई १९९१ में भी नेपाल के जोगिनियां में कोसी का बांध टूट गया था । २००८ में फिर से कुसहा में बांध टूटा, जिसने भारी तबाही मचाई । इस बार अब तक दो जगहों पर कमला बलान तथा झंझारपुर में तटबंध टूटे हैं ।
बीजिंग विश्वविद्यालय में ह्वांग हो नदी के तटबंधों के टूटने का इतिहास उपलब्ध है जिसके अनुसार १०४७ से लेकर १९५४ के बीच ह्वांग हो के तटबंध १५०० से अधिक बार टूटे, २६ बार नदी की धारा बदली और नौ बार नदी की धारा को वापस तटबंधों के बीच वापस नहीं लाया जा सका । १९३३ की प्रलयंकारी बाढ़ में ये तटबंध ५० जगहों पर टूटे और १८, ००० लोगों की मृत्यु का कारण बने । १९३८ में जब जापानी सेना ने चीन पर आक्रमण किया तब तत्कालीन शासक च्यांग काई शेक ने ह्वांग हो नदी के तटबंध पर बम गिरा दिया जिससे पूरी जापानी सेना बह गयी पर चीन की खुद की ८, ९०, ००० आबादी को जान से हाथ धोने पड़े । १८५५ से लेकर १९५४ के बीच यह तटबंध दो सौ बार टूटे थे । लगभग यही स्थिति अमेरिका में मिसिसिप्पी नदी के तटबंधों की भी थी जहां उनका निर्माण सत्रहवीं शताब्दी से शुरू किया गया था । इस नदी के तटबंधों को १८३३ और १९२७ के बीच १६ फुट ऊंचा करना पड़ा । इसके बावजूद इन तटबंधों में दरारें पड़ना और नदी के पानी का तटबंधों के ऊपर से बहना जारी था । १९१२ की बाढ़ में इस नदी के तटबंधों में कम से कम ३०० स्थानों पर दरारें पड़ीं और नदी के कुल १६२० कि. मी । लम्बे तटबंधों में से ९६ कि. मी । लम्बे तटबंध साफ हो गए थे । अतः तटबन्ध टूटना कोई विशेष घटना नहीं है लेकिन इसको आधुनिकीकरण न करना दुर्घटना जरुर है ।
डा. सीके राउत ने कहा, ’ अगर आज मधेश की अपनी सेना होती, तो डुबते हुए मधेशियों को हेलिकोप्टर से भी उद्धार किया होता, मधेश में कब उद्धार टोली रबाना हो गई रहती, बाढ को ऐसा बिकराल रुप धारण करने की नौबत नहीं आती, विदेशी सहयोग भी घंटे भर में उद्धार और राहत के लिए आते, याद है न ! पहाड में महा भूकम्प के बाद किस तरह तुरन्त विदेशी हेलिकप्टर आ गए थे उद्धार करने, तो मधेश के लिए क्यों नहीं । मधेश की बाढ के विषय में तो लगता है विश्व को कोई जानकारी ही नहीं है । अविरल वर्षा प्राकृतिक है, पर मधेश की बाढ राजनैतिक है । नेपाल सरकार द्वारा जान बूझ कर मधेश को बाढ की चपेट में डालने की परिस्थिति बनाई जाती है, ताकि सभी मधेशी मधेश से बह जाए, विस्थापित हो जाए, और पूरा का पूरा मधेश नेपालियों के कब्जे में आ जाए । नहीं तो क्या बाढ़ पिछले साल नहीं आई थी ? तो नेपाल सरकार ने बाढ़ को रोकने के लिए कहाँ पर क्या किए, कितने तटबन्ध निर्माण किए, पानी निकास के कितने भौतिक और राजनैतिक रुकावट को हटाए ? मधेशियों को ‘काबू’ में रखने के लिए हरेक गांव–गांव में सशस्त्र पुलिस और जगह जगह पर सेना कैम्प विछाने वाले नेपाल सरकार, मधेशियों को गोली ठोकने के लिए हर वक्त तैनात ‘वीर गोरखाली सेना और पुलिस”, लोकतान्त्रिक निर्वाचन कराने के लिए गांव–गांव में टैंकर लेकर फिरने वाली नेपाली सेना मधेशियों को उद्धार की जरूरत पडने पर कहाँ गायब हो जाती है ? यही से द्वैध चरित्र सापÞm सापÞm झलकने लगता है ।”
मूल समस्या नेपाल सरकार के मधेसी प्रति के षडयंत्रयुक्त व्यवहार से है । मधेस के नेता चन्द पैसों में बिक जाते हैं । प्राविधिको का भी यही हाल है । सब के सब तराइ बासी को लूटने में व्यस्त हैं । खासकर मधेसी नेताओं को तराई से अधिक काठमांडू से लगाव है । वो मधेस को लूटकर राजधानी में सेट होना चाहते हैं । वैवाहिक सम्बन्ध भी वही स्थापित कर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं । इस हालत में मधेसियों का कल्याण संभव नहीं दिख रहा है । एक भी सामाजिक कार्यकर्ताओं में न समाज के प्रति आस्था है न देश के प्रति । नेपाल में एक भी ऐसा नेता नहीं जिसपर जनता को अपने सुन्दर और सुरक्षित भविष्य का भरोसा हो ।

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